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WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-17 (3.43, 4.1-9)
Total questions: 25
Worksheet time: 2hrs 15mins
बद्धजीव के परम शत्रु कौन हैं? (3.43)
प्रकृति पर प्रभुत्व पाने की इच्छा
इन्द्रियतृप्ति की इच्छाएँ
कृष्णभावनामृत की शक्ति
परम भगवान् श्रीकृष्ण
भगवद्गीता के तृतीय अध्याय से निष्कर्षतः मनुष्य का क्या चरम लक्ष्य निर्देशित होता है? (3.43)
निर्विशेष
शून्यवाद
स्वयं को भगवान् का शाश्वत सेवक समझना
कृष्णभावनामृत में प्रवृत्त होना
कैसे मनुष्य सांसारिक जीवन की अपरिपक्व अवस्था में इन्द्रियों, मन तथा बुद्धि पर नियन्त्रण रखकर दिव्य स्थिति को प्राप्त कर सकता है? (3.43)
दार्शनिक चिन्तन
अपने शुद्ध स्वरूप के प्रति लक्षित स्थिर बुद्धि से
श्रेष्ठ बुद्धि द्वारा कृष्णभावनामृत में प्रशिक्षित होकर
यौगिक आसनों के अभ्यास से
इन्द्रियों को वश में करने के कृत्रिम प्रयासों से
किस युग के आदि में सूर्यदेव विवस्वान् ने भगवद्गीता का उपदेश अपने पुत्र वैवस्वत मनु को दिया? (4.1)
सत्य
त्रेता
द्वापर
कलि
भगवान् श्रीराम के पूर्वज इक्ष्वाकु को किसने भगवद्गीता का ज्ञान दिया? (4.1)
मनुष्यों के जनक मनु के पिता ने
सूर्यदेव विवस्वान् ने
मनुष्यों के पिता मनु ने
भगवान् श्रीकृष्ण ने
भगवान् श्रीकृष्ण ने इस अमर योगविद्या, भगवद्गीता का उपदेश सभी लोकों के राजा, सूर्यदेव विवस्वान् को ही क्यों दिया? (4.1)
राजा विशेष रूप से निवासियों की रक्षा के निमित्त होते हैं
जिससे वे नागरिकों (प्रजा) पर शासन कर सकें
जिससे वे प्रजा को काम-रूपी भवबन्धन से बचा सकें
शासनाध्यक्ष कृष्णभावनामृत का प्रचार करने के लिए होते हैं
शिक्षा, संस्कृति तथा भक्ति द्वारा नागरिकों को पढ़ाएं
लगभग कितने वर्ष पूर्व मनु ने अपने शिष्य तथा पुत्र इक्ष्वाकु से जो इस पृथ्वी के राजा थे, श्रीमद्भगवद्गीता कही? (4.1)
4 लाख
8 लाख
12 लाख
20 लाख
वेदों के ही समान, श्रीभगवान् द्वारा कहे गए इस अपौरुषेय ज्ञान, भगवद्गीता को किस रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए? (4.1)
अपनी-अपनी संसारी तार्किक विधि से
बिना किसी मानवीय विवेचना के
गुरु-परम्परा से यथारूप में
कोई काल्पनिक भाष्य मानते हुए
विभिन्न लौकिक विद्वानों के अगणित गीता भाष्यों को पढ़ना क्यों केवल समय का अपव्यय मात्र है?(4.2)
प्रायः सभी श्रीकृष्ण को भगवान् स्वीकार नहीं करते और प्रामाणिक शिष्य-परंपरा का अनुगमन भी नहीं करते
असुरभाव के कारण वे श्रीभगवान् की संपत्ति का उपभोग तो करते हैं, पर उनमें विश्वास नहीं करते
भगवद्गीता को यथारूप में अंगीकार न करके मनोधर्ममय रचना मानते हैं
भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा वही प्राचीन योग, यानी परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध का विज्ञान, अर्जुन को ही कहे जाने का क्या कारण है? (4.3)
क्योंकि वह उनका भक्त तथा मित्र था
इस विज्ञान के दिव्य रहस्य को समझ सकता है
असुर के लिए इस परम गुह्यविद्या को समझ पाना सम्भव नहीं
भगवद्गीता पर भक्तों की टीकाएँ और असुरों की टीकाओं में क्या अंतर है? (4.3)
भक्त श्रीकृष्ण को भगवान् के रूप में मानता है
भक्त का भाष्य इस परमविद्या के पक्ष में वास्तविक सेवा है
असुर भगवान् कृष्ण को भगवान् नहीं मानते
असुर कृष्ण के विषय में मनगढंत बातें करते हैं
असुर कृष्ण के उपदेश-मार्ग से जनता को गुमराह करते हैं
असुरों के लिए भगवान् श्रीकृष्ण को या उनके सन्देश को समझना कठिन क्यों है? (4.4)
उन्हें यह विचार पसन्द है कि कृष्ण परम भगवान् हैं क्योंकि वे भगवान् में विश्वास करते हैं और कृष्ण को सामान्य व्यक्ति नहीं मानते हैं
यह समझ पाना अत्यन्त कठिन है कि कृष्ण किस प्रकार शाश्र्वत आदिपुरुष के रूप में बने रहे और देवकी के पुत्र रूप में भी अवतीर्ण हुए
असुर तथा उनके अनुयायी तोड़-मरोड़ करके उन्हें प्रस्तुत करते रहे हैं क्योंकि वे अपने ही दृष्टिकोण से कृष्ण का अध्ययन करते हैं
भगवान् का नित्य संगी, मुक्त पुरुष, परन्तप अर्जुन तथा कृष्ण दोनों ही शाश्र्वत स्वभाव के हैं फिर भी वह भगवान् के तुल्य क्यों नहीं है? (4.5)
बद्धजीव निकृष्ट अवस्था में है, परन्तु मुक्त जीव और भगवान् सभी तरह से एकसमान होते हैं
भगवान् अच्युत हैं जिसका अर्थ है कि वे भौतिक सम्पर्क में रहते हुए भी अपने को नहीं भूलते, पर शरीर-परिवर्तन के साथ-साथ जीवात्मा सब कुछ भूल जाता है
भगवान् को अद्वैत कहने का क्या अर्थ है? (4.5)
उनके शरीर तो होता है पर आत्मा नहीं होती
उनके शरीर नहीं होता, केवल आत्मा होती है
उनके शरीर तथा उनकी आत्मा में कोई अन्तर नहीं है
उनके न तो शरीर है न आत्मा है
वैदूर्यमणि के समान असंख्य रंगों व रूपों में प्रकट होने वाले भगवान् को कैसे जाना जा सकता है? (4.5)
केवल वेदों के अध्ययन से
केवल विशुद्ध निष्काम भक्ति के द्वारा
क्या प्रमाण है कि भौतिक जगत में भगवान् अन्य जीवों की तरह भौतिक शरीर स्वीकार नहीं करते बल्कि अपने शाश्वत आदि शरीर में ही प्रकट होते हैं? (4.6)
वे सामान्य जीव की भाँति शरीर-परिवर्तन नहीं करते
उन्हें अनेकानेक “पूर्वजन्मों” की पूर्ण स्मृति रहती है
वे कभी भी हमारे समान वृद्ध नहीं होते
भगवान् निरन्तर वही परमसत्य रूप हैं
उनके गुण तथा शरीर में कोई अन्तर नहीं होता
भगवान् कार्यक्रम अनुसार अर्थात् ब्रह्मा के एक दिन में ____ वें मनु के ____ वें युग में _______ के अन्त में प्रकट होते हैं, किन्तु वे इस समय का पालन करने के लिए बाध्य नहीं हैं, क्योंकि वे स्वेच्छा से कर्म करने के लिए स्वतन्त्र हैं |(4.7)
5, 14, सतयुग
7, 28, द्वापर
9, 42, त्रेता
11, 56, कलि
इस श्लोक में प्रयुक्त "सृजामि" शब्द का क्या अर्थ है? (4.7)
भगवान् अपने रूप की सृष्टि करते हैं (बनाते हैं)
भगवान् स्वयं यथारूप प्रकट होते हैं
इनमें से क्या गलत है? (4.7)
धर्म के नियम भगवान् के प्रत्यक्ष आदेश हैं
वैदिक नियम जीव को पूर्ण शरणागति की ओर ले जाने वाले हैं
बुद्ध कृष्ण के अवतार हैं
केवल भारत की धरती में भगवान् अवतरित होते हैं
भगवान् प्रत्येक अवतार में एक-जैसे सिद्धान्तों की शिक्षा देते हैं, जो परिस्थितियों के अनुसार उच्च या निम्न प्रतीत होता हैं
किसे साधु समझना चाहिए? (4.8)
अधार्मिक व्यक्ति, दुष्कृताम् या उपद्रवी, मुर्ख
सांसारिक शिक्षा से विभूषित
जो पूर्ण कृष्णचेतना में हो
विद्वान् या सुसंस्कृत
इनमें से कौन सी अवतारों की सही श्रेणी नहीं है? (4.8)
पुरुषावतार, गुणावतार
महावतार, दरिद्रावतार
लीलावतार, शक्त्यावेश अवतार
मन्वन्तर अवतार तथा युगावतार
कलियुग के अवतार के विषय में क्या सही है? (4.8)
कलियुग के अवतार भगवान् चैतन्य महाप्रभु हैं जिन्होंने संकीर्तन आन्दोलन के द्वारा कृष्णपूजा का प्रसार किया
भगवान् चैतन्य को गुप्त रूप में उपनिषदों, महाभारत तथा भागवत जैसे शास्त्रों के गुह्य अंशों में वर्णित किया गया है
भगवान् का यह अवतार दुष्टों का विनाश नहीं करता, अपितु अपनी अहैतुकी कृपा से उनका उद्धार करता है
जो भगवान् श्रीकृष्ण के अविर्भाव तथा कर्मों की दिव्य प्रकृति को जानता है, उसका क्या परिणाम होता है? (4.9)
त्यक्त्वा देहं - देह त्यागना पड़ता है
पुनर्जन्म - फिर से जन्म लेना पड़ता है
नैति - कुछ प्रभाव नहीं होता
मामेति - भगवान् के सनातन धाम को प्राप्त करता है
अभिमानी संसारी विद्वान को मोक्ष के लिए भगवद्भक्त की अहैतुकी कृपा की प्रतीक्षा क्यों करनी पड़ती है? (4.9)
वह श्रीकृष्ण को श्रीभगवान् के रूप में नहीं मानता
वह अवश्य ही तमोगुणी है
मधुपात्र को केवल बाहर से चाट रहा है
कृष्णभावनामृत का अनुशीलन नहीं करता
अभी तक के गीता-अध्ययन से आप आध्यात्मिक दृष्टि से अपने अंदर क्या सकारात्मक परिवर्तन अनुभव कर रहे हैं?
