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WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-20 (4.30-39)
Total questions: 20
Worksheet time: 2hrs 50mins
भौतिक अस्तित्व का मूल कारण क्या है, जिससे ऊपर उठे बिना सच्चिदानन्द के नित्य धरातल तक उठ पाना सम्भव नहीं है? (4.30)
इन्द्रियों का निग्रह
इन्द्रियों का दमन
इन्द्रियतृप्ति
इन्द्रियविषय
विभिन्न प्रकार के सभी यज्ञों में क्या कार्य समान है? (4.30)
इन्द्रियों का निग्रह
शाश्वत भगवद्धाम की प्राप्ति
संसारी पापकर्मों में वृद्धि
दुखी और ऐश्वर्यहीन जीवन
इनमें से क्या सही नहीं है? (4.31)
अज्ञान ही पापपूर्ण जीवन का कारण है
पापपूर्ण जीवन ही इस भौतिक अस्तित्व का कारण है
मनुष्य जीवन रूपी द्वार ही बन्धन से निकाल सकता है
मुक्त जीवन की तो पूर्णता परमेश्वर बनने में है
यज्ञ करने का क्या लाभ प्राप्त होता है? (4.31)
अनेक प्रकार के यज्ञ हमारी आर्थिक समस्याओं को स्वतः हल कर देते हैं
यज्ञ सम्पन्न करने से हमें प्रचुर भोजन, प्रचुर दूध इत्यादि मिलता रहता है
जो लोग यज्ञ करने में लगे हैं उनके लिए तो सर्वत्र परम सुख मिलता है
वेदों में विभिन्न प्रकार के यज्ञों का उल्लेख क्यों है? (4.32)
कर्ताभेद के अनुसार
चूँकि लोग देहात्मबुद्धि में लीन हैं
देह से मुक्त होने के लिए
यज्ञकर्ता की श्रद्धा दिव्यज्ञान के स्तर तक पहुँचना क्यों आवश्यक है? (4.33)
जिससे वह भौतिक कष्टों से छूटकर अन्त में परमेश्वर की दिव्य सेवा करे
क्योंकि ज्ञान के बिना यज्ञ भौतिक स्तर पर रह जाते हैं और इनसे कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं हो पाता
यथार्थ ज्ञान का अंत कृष्णभावनामृत में होता है जो दिव्यज्ञान की सर्वोच्च अवस्था है
श्लोक के चारों भागों को सही क्रम से लगाएं | (4.34)
ABCD
CABD
BDCA
ACBD
आध्यात्मिक जीवन में प्रगति कैसे संभव है? (4.34)
मनोधर्म या शुष्क तर्क से ही सही पद प्राप्त हो सकता है
ज्ञानग्रंथों के स्वतन्त्र अध्ययन से ही कोई आध्यात्मिक जीवन में उन्नति कर सकता है
स्वरुपसिद्ध गुरु की प्रसन्नता ही आध्यात्मिक जीवन की प्रगति का रहस्य है
ज्ञान-प्राप्ति के लिए प्रामाणिक गुरु की शरण में जाने की क्या विधि है? (4.34)
प्रणिपातेन - गुरु को पूर्ण समर्पण करके ही स्वीकार करना चाहिए
परिप्रश्नेन - विनीत भाव से जिज्ञासा करे
सेवया - अहंकाररहित होकर दास की भाँति गुरु की सेवा करनी चाहिए
अन्धानुगमन तथा निरर्थक जिज्ञासा-इन दोनों में से क्या सही है? (4.34)
अन्धानुगमन
निरर्थक जिज्ञासा
दोनों ही सही है
दोनों की भर्त्सना की गई है
स्वरुपसिद्ध व्यक्ति या प्रामाणिक गुरु कौन बन सकता है? (4.34)
गुरु-परम्परा का ही व्यक्ति अपने शिष्य को भगवान् का सन्देश प्रदान कर सकता है
कोई अपनी निजी विधि का निर्माण करके स्वरुपसिद्ध बन सकता है
माया का क्या अर्थ सही नहीं है? (4.35)
कृष्ण से पृथक् अस्तित्व का भाव माया कहलाती है
जीवों का शारीरिक अन्तर माया है व वास्तविक सत्य नहीं है
कृष्ण से अपने को विलग मानना ही माया कहलाती है
कृष्ण का अपना निजी पृथक् अस्तित्व माया है
परम का गणित क्या है? (4.35)
एक और एक मिलकर दो होता है और एक में से एक घटाने पर कुछ भी नहीं बचता है
एक और एक मिलकर एक ही होता है और एक में से एक घटाने पर भी एक बचता है
भौतिक जगत के दुख-सागर में चलने वाले जीवन-संघर्ष को पार करने में कौन समर्थ है? (4.36)
कुशल तैराक
कृष्णभावनामृत की नाव
आत्मा तथा परमात्मा सम्बन्धी पूर्णज्ञान तथा उनके सम्बन्ध की तुलना किस से की गई है? (4.37)
प्रज्ज्वलित अग्नि
भौतिक कर्मों के समस्त फल
ईंधन
कर्मफल की कौन कौन सी अवस्थाएँ हैं? (4.37)
प्रारब्ध
संचित
बीज
कूट
जीव को अपने कृष्णदास के स्वरूप का ज्ञान होने पर कौन से कर्मफल भस्मीभूत हो जाते हैं? (4.37)
पाप
पुण्य
पाप & पुण्य दोनों
कोई नहीं
इनमें से क्या सही है? (4.38)
ज्ञान ही हमारे बन्धन का कारण है
अज्ञान ही हमारी मुक्ति का कारण है
ज्ञान भक्ति का परिपक्व फल है
कृष्णभावनामृत में ज्ञान तथा शान्ति का कोई स्थान नहीं है
कौन शीघ्र ही कृष्णभावनामृत के ज्ञान में पूर्णता प्राप्त करता है और आध्यात्मिक शान्ति प्राप्त करता है? (4.39)
जो इन्द्रियों को संयमित रखता है
जो व्यक्ति कृष्ण के प्रति श्रद्धावान् है
हरे कृष्ण के जप द्वारा जिसके हृदय की सारी भौतिक मलिनता दूर हो चुकी है
आध्यात्मिक गुरु की शरण स्वीकार करना किस प्रकार आपके आध्यात्मिक जीवन में सहायक हो सकता है?
