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WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-10 (2.45-54)
Total questions: 18
Worksheet time: 1hrs 29mins
श्लोक पहचानें - हे अर्जुन! जय अथवा पराजय की समस्त आसक्ति त्याग कर समभाव से अपना कर्म करो | ऐसी समता योग कहलाती है |
त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन |
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् || 2.45 ||
कर्मण्यवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन |
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि || 2.47 ||
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय |
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते || 2.48 ||
दुरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः || 2.49 ||
वेदों में मुख्यतया प्रकृति के ____ गुणों का वर्णन हुआ है | (2.45)
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भौतिक गुणों की क्रियाएँ-प्रतिक्रियाएँ: सुख-दुख या शीत-ग्रीष्म कब तक रहने वाले हैं? (2.45)
जब तक भौतिक शरीर का अस्तित्व है
जब तक आध्यात्मिक गुरु न स्वीकार कर लिया जाए
द्वैतताओं को सहन करके हानि तथा लाभ की चिन्ता से कैसे मुक्त हुआ जाय? (2.45)
कृष्ण की इच्छा पर पूर्णतया आश्रित रह कर
शून्य पर ध्यान से
नेटफ्लिक्स सब्सक्रिप्शन से
हठयोग व प्राणायाम की विधियों द्वारा
वेदों के कर्मकाण्ड विभाग में वर्णित अनुष्ठानों एवं यज्ञों का ध्येय क्या है? (2.46)
इन्द्रियतृप्ति की प्रामाणिक सुविधाएं प्रदान करना
आत्म-साक्षात्कार के क्रमिक विकास को प्रोत्साहित करना
भौतिक प्रकृति का भरपूर आनंद लेना
नारकीय जीवन से बचाकर स्वर्गिक सुख उपलब्ध कराना
भगवान् के पवित्र नाम का जप व कीर्तन करने वाले की श्रेष्ठता का क्या प्रमाण है? (2.46)
श्रीमद्भागवत (3.33.7) - अहो बात श्र्वपचोऽतो गरीयान् - भगवन्नाम जपने वाला भले ही चाण्डाल जैसे निम्न परिवार में क्यों न हुआ हो, किन्तु वह सर्वोच्च पद पर स्थित है
भगवान् चैतन्य ने प्रकाशानंद सरस्वती को बताया - वेदान्त दर्शन के परम उद्देश्य की पूर्ति भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करने से हो जाती है
तीन प्रकार के कर्मों को उनके ठीक अर्थ के अनुसार चुनें | (2.47)
कर्म = प्रकृति के गुणों के रूप में प्राप्त आदेश, स्वधर्म
विकर्म = अपने कर्मों को न करना
अकर्म = अधिकारी की सम्मति के बिना किये गये कर्म
भगवान् ने अर्जुन को कैसे कर्म के रूप में युद्ध करने की आज्ञा दी? (2.47)
इच्छित कर्म - फल की इच्छा से बंधनकारी कर्म
आपात्कालीन कर्म - बिना किसी निर्देशों का पालन किए
नित्यकर्म - फल की इच्छा के बिना, शास्त्रों के निर्देशानुसार, सतोगण में रहकर
योग का क्या अर्थ है, जिसमें स्थित होकर भगवान् अर्जुन को कर्म करने के लिए कह रहे हैं? (2.48)
सदैव चंचल रहने वाली इन्द्रियों को वश में रखना
परमतत्त्व में मन को एकाग्र करना
कृष्ण के निर्देश का पालन ही वास्तविक योग है
कृष्णभावनामृत के माध्यम से स्वामित्व भाव का परित्याग
वर्णाश्रम-धर्म और सांसारिक नियम में क्या अंतर है? (2.48)
सांसारिक नियम है कि लोग पहले अपनी तुष्टि करते हैं
वर्णाश्रम-धर्म का एकमात्र उद्देश्य विष्णु को प्रसन्न करना है
सांसारिक नियम है विष्णु को प्रसन्न करना
वर्णाश्रम-धर्म का एकमात्र उद्देश्य है कि पहले अपनी तुष्टि
कृपण कौन हैं और उनके कर्मों का क्या परिणाम होता है? (2.49)
जो भगवान् के दास रूप में अपने स्वरूप को समझ लेता है
जो व्यक्ति अपने सकाम कर्म-फलों को भोगना चाहते हैं
इससे कर्त्ता जन्म-मृत्यु के चक्र में लगातार फँसा रहता है
सारी शक्ति कृष्णभावनामृत अर्जित करने में लगाता है
भगवद्गीता कर्म के विषय में क्या उपदेश देती है? (2.50)
इस जीवन में ही अच्छे तथा बुरे कार्यों से मुक्त होना
पूर्ण रूप में भगवान् श्रीकृष्ण की शरण में जाना
अपने स्वरुप को जानना और वैसे ही कार्य करना
जन्म-जन्मान्तरों के कर्मफलों को शुद्ध करना
मुकुंद शब्द का क्या अर्थ है? (2.51)
मुक्ति के दाता
मूक रहने वाले
मुख पर कुंद पुष्प धारण करने वाले
मुचुकुन्द का चित चुराने वाले
अज्ञानवश अल्पज्ञानी पुरुष भौतिक जगत के विषय में क्या नहीं समझ पाता? (2.51)
ऐसा दुखमय स्थान है जहाँ पद-पद पर संकट हैं
संसार में कहीं भी कोई शरीर दुखों से रहित नहीं है
सर्वत्र जन्म, मृत्यु, जरा तथा व्याधि विद्यमान हैं
यहां न ही काल का प्रभाव तथा न मृत्यु है
पूर्णतया कृष्णभावनाभावित के लिए वैदिक कर्मकाण्डों की अनिवार्यता क्यों नहीं है? (2.52)
त्रिकाल संध्या, प्रातःकालीन स्नान, पितृ-तर्पण आदि नवदीक्षितों के लिए अनिवार्य हैं
जब कोई कृष्णभक्ति में लगा हो, तो वह विधि-विधानों के प्रति उदासीन हो जाता है, क्योंकि उसे पहले ही सिद्धि प्राप्त हो चुकी होती है
जो नहीं समझता कि वेदों का उद्देश्य कृष्ण है और स्वयं को अनुष्ठानादि में व्यस्त रखता है, वह केवल अपना समय नष्ट करता है
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति या भगवान् के एकनिष्ट भक्त को सर्वोच्च सिद्धि के लिए क्या करना चाहिए? (2.53)
वेदों की अलंकारमयी वाणी से विचलित होना चाहिए
स्वर्ग जाने के लिए सकाम कर्मों में प्रवृत्त होना चाहिए
यह जान लेना चाहिए कि कृष्ण मनुष्य का शाश्वत दास है
कृष्ण व उनके प्रतिनिधि, गुरु की आज्ञाओं का पालन मात्र करना होगा
अर्जुन ने अध्यात्म में लीन चेतना वाले व्यक्ति (स्थितप्रज्ञ) के विषय में क्या प्रश्न पूछे? (2.54)
वह कैसे बोलता है
उसकी भाषा क्या है
वह किस तरह बैठता है
वह किस तरह चलता है
वह कैसे हँसता है
आप किसी कर्मकाण्डी स्वजन को कैसे समझायेंगे कि कृष्ण भक्ति स्वीकार करने के बाद अब अन्य किसी वैदिक रिवाजों की अनिवार्यता नहीं है?
