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WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-21 (4.40-42, 5.1-7)
Total questions: 18
Worksheet time: 2hrs 40mins
कौन कौन लोग सदैव संशयग्रस्त रहते हैं, तनिक भी आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर पाते और नीचे गिरते हैं व न तो इस लोक में, न ही परलोक में कोई सुख प्राप्त कर पाते हैं? (4.40)
जो लोग पशुतुल्य हैं उनमें न तो प्रामाणिक शास्त्रों के प्रति कोई श्रद्धा है और न उनका ज्ञान होता है
कुछ लोगों को शास्त्रों का ज्ञान होता है और उनमें से उद्धरण देते रहते हैं, किन्तु उनमें वास्तविक विश्वास नहीं करते
कुछ लोगों को भगवद्गीता जैसे शास्त्रों में श्रद्धा होती है फिर भी न तो भगवान् कृष्ण में विश्वास करते हैं, न उनकी पूजा करते हैं
मनुष्य को संशयग्रस्त बनने से बचने और आध्यात्मिक उत्थान में सफलता प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए? (4.40)
श्रद्धाभाव से शास्त्रों के सिद्धान्तों का पालन करे और ज्ञान प्राप्त करे
दिव्य ज्ञान द्वारा आध्यात्मिक अनुभूति के दिव्य पद तक पहुँचे
परम्परा से चले आ रहे महान आचार्यों के पदचिन्हों का अनुसरण करे
कौन कर्मों के बन्धन से नहीं बँधता? (4.41)
जो व्यक्ति अपने कर्मफलों का भोग करने के लिए कर्म करता है
जो दिव्यज्ञान में अश्रद्धा के कारण संशयग्रस्त रहता है
पूर्णतः कृष्णभावनाभावित होने के कारण जिसे श्रीभगवान् के अंश रूप में अपने स्वरूप का ज्ञान है
भगवान् अर्जुन के हृदय में उठे संशयों को किससे काटने को कहते हैं? (4.42)
असङ्गशस्त्रेण - विरक्ति के शस्त्र से
अनुध्यासिना - अपने स्मरण की तलवार से
ज्ञानासिना - ज्ञानरूपी शस्त्र से
सनातन योग में कौन से यज्ञकर्म किये जाते हैं? (4.42)
द्रव्य-यज्ञ जिसमें भौतिक द्रव्यों का त्याग किया जाता है
आत्म-बोध वाला ज्ञान यज्ञ जो विशुद्ध आध्यात्मिक कर्म है
तलाक यज्ञ - सम्बन्ध विच्छेद के लिए
पुत्रेष्टि यज्ञ - पुत्र प्राप्ति के लिए
जो भगवान् द्वारा उपदेश देने पर भी भगवान् के सच्चिदानन्द स्वरूप को नहीं समझ पाता और गीता के उपदेशों को नहीं समझता, उसके विषय में क्या समझना चाहिए? (4.42)
वह श्रद्धाविहीन है
वह निपट मूर्ख है
वह नीचे गिर जाता है
उसके कार्यकलाप दिव्य हैं
वह भगवद्गीता का अध्ययन शुरू करते ही मुक्त होता है
चतुर्थ अध्याय में भगवान् ने अर्जुन को क्या बताया है? (5.1)
आत्मा तथा उसके शरीर बन्धन का सामान्य ज्ञान
बुद्धियोग द्वारा इस भौतिक बन्धन से निकलना
ज्ञानी को कोई कार्य नहीं करने पड़ते
सारे यज्ञों का पर्यवसान ज्ञान में होता है
वह पूर्णज्ञान से युक्त होकर, उठ करके युद्ध करे
अर्जुन अपनी दुविधा में भगवान् से क्या पूछ रहा है? (5.1)
वह सब प्रकार से कर्म त्याग दे या पूर्णज्ञान से युक्त होकर कर्म करे?
वह कौरवों द्वारा द्रौपदी के अपमान को भूल जाए या प्रतिशोध ले?
भगवान् ने अर्जुन की दुविधा के लिए क्या उत्तर दिया? (5.2)
कर्म के परित्याग से भक्तियुक्त कर्म श्रेष्ठ है
भक्तियुक्त कर्म से कर्म का परित्याग श्रेष्ठ है
इनमें से क्या सही है? (5.2)
इन्द्रियतृप्ति के लिए कर्म करना श्रेयस्कर है
वासुदेव की भक्ति के प्रति प्रेम उत्पन्न करना चाहिए
कृष्णभावनाभावित कर्म करना सकाम कर्म ही है
जो समझता है सारी सम्पत्ति कृष्ण की है, वह नित्य संन्यासी है
कृष्णभावनामृत से रहित संन्यास अपूर्ण है
भगवद्गीता के शब्दों में किसे नित्य संन्यासी जाना जाता है? (5.3)
जो न कर्मफलों से घृणा करता है
जो न कर्मफल की इच्छा करता है
जो समस्त द्वन्द्वों से रहित है
जो भवबन्धन को पार कर पूर्णतया मुक्त हो जाता है
जो हमेशा केसरिया वस्त्रों में रहता है
भगवान् की दिव्य प्रेमभक्ति के परायण होकर पूर्णज्ञानी का सही दिव्यज्ञान क्या है? (5.3)
कृष्ण-तादात्मय की भावना ही सत्य है
अंश अंशी के तुल्य होता है
एकता गुणों की है और गुणों की मात्रा की भी
कृष्ण पूर्ण (अंशी) है और वह स्वयं अंशमात्र है
भौतिक जगत् के विश्लेषात्मक अध्ययन (सांख्य) और भक्तिमय कर्मयोग में किस प्रकार से समानता है? (5.4)
सांख्यदर्शन का छात्र जगत् के मूल अर्थात् विष्णु को ढूँढता है
भगवान् की भक्ति का अर्थ परमात्मा की सेवा है
एक विधि से वृक्ष की जड़ खोजी जाती है
दूसरी विधि से वृक्ष की जड़ को सींचा जाता है
दोनों का उद्देश्य विष्णु की प्राप्ति है
इनमें से सही वाक्य चुनिए | (5.5)
सांख्य विधि में मनुष्य को पदार्थ में आसक्त होना होता है
भक्तियोग में उसे कृष्णभावनाभावित कर्म से विरक्त होना पड़ता है
जो पदार्थ से विरक्ति और कृष्ण में आसक्ति को एक ही तरह देखता है, वही वस्तुओं को यथारूप में देखता है
इनमें से क्या सही नहीं है? (5.6)
भक्ति में लगे बिना केवल समस्त कर्मों का परित्याग करने से कोई सुखी नहीं बन सकता
भागवत सम्प्रदाय के छात्र शंकराचार्य द्वारा प्रणीत शारीरिक भाष्य व सांख्यदर्शन के अध्ययन में लगे रहते हैं
मायावादी संन्यासी पांचरात्रिकी विधि से भगवान् की भक्ति व वेदान्त सूत्रों के यथार्थ भाष्य भागवत-दर्शन के अध्ययन में लगे रहते हैं
मायावादी संन्यासियों का शुष्क चिन्तन तथा कृत्रिम साधनों से निर्विशेष विवेचना उनके लिए क्यों व्यर्थ होती है? (5.6)
वे भगवान् की दिव्य भक्ति का आनन्द नहीं उठा पाते
उनका अध्ययन अत्यन्त जटिल होता है
वे ब्रह्मचिन्तन से ऊब कर भागवत की शरण ग्रहण करते हैं
कभी-कभी आत्म-साक्षात्कार के पथ से नीचे गिर जाते हैं
फिर से समाजसेवा-परोपकार जैसे भौतिक कर्म में प्रवृत्त होते हैं
जो कृष्णभावनाभावित व्यक्ति कर्म करता हुआ भी कभी नहीं बँधता, उसके क्या लक्षण होते हैं? (5.7)
भक्तिभाव में कर्म करता है
कृष्णकथा के अतिरिक्त और कुछ सुनना नहीं चाहता
कृष्ण को अर्पित किए भोजन के अतिरिक्त कुछ नहीं खाता
किसी के प्रति अपराध नहीं करता
सबों को प्रिय होता है और सभी लोग उसे प्रिय होते हैं
आप कैसे अपने दिनभर के कार्यों और मन के विचारों को कृष्णभावनभावित बना कर मुक्ति के पथ पर अग्रसर हो सकते हैं?
