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Bhagavad Gita As It Is DAY-48 (12.3-12)

Total questions: 19

Worksheet time: 2hrs 45mins

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1.

भगवान् किस श्लोक में बताते हैं कि निराकार स्वरूप के प्रति आसक्त लोगों के लिए प्रगति कर पाना अत्यन्त कष्टप्रद है?

a)

क्ल‍ेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम् ।

अव्यक्ता हि गतिर्दु:खं देहवद्भ‍िरवाप्यते ॥ 12.5 ॥

b)

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परा: ।

अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ 12.6 ॥

c)

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।

भवामि न चिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ 12.7 ॥

d)

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।

निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशय: ॥ 12.8 ॥

2.

भगवान् कृष्ण की प्रत्यक्ष पूजा न करके, अप्रत्यक्ष विधि से निराकार के उपासक भी अंततः श्रीकृष्ण को प्राप्त होते हैं, फिर समस्या क्या है? (12.3-4)

a)

जब ऐसे मनुष्य को अनेक जन्मों के बाद पूर्ण ज्ञान होता है, तो वह कृष्ण की शरण ग्रहण करता है, अन्यथापूर्ण साक्षात्कार नहीं हो पाता

b)

प्रायः भगवान् की शरण में जाने के पूर्व पर्याप्त तपस्या करनी होती है; इन्द्रियनिग्रह, प्रत्येक प्राणी की सेवा और कल्याण-कार्य में रत होना होता है

3.

ज्ञानयोगी और उसकी विधि के विषय में क्या सही है? (12.5)

a)

अध्यात्मवादियों का समूह, जो परमेश्वर के अचिन्त्य, अव्यक्त, निराकार स्वरूप के पथ का अनुसरण करता है

b)

जो व्यक्ति भगवान् की भक्ति में रत रहकर पूर्ण कृष्णभावनामृत में रहता है

c)

भगवान् की प्रत्यक्ष सेवा होने के कारण सुगम है, और देहधारी के लिए स्वाभाविक भी है

4.

ज्ञानयोगी भौतिक गुणों द्वारा प्रदर्शित सगुण मूर्तिपूजा का खंडन करते हैं, इसमें क्या गलत है? (12.5)

a)

अनादिकाल से देहधारी बद्धजीव के लिए यह समझ पाना अत्यन्त कठिन है कि वह शरीर नहीं है

b)

भक्ति-योगी कृष्ण के विग्रह को पूज्य मानता है, क्योंकि उसके मन में कोई शारीरिक बोध रहता है

c)

मन्दिर में परमेश्वर के स्वरूप की पूजा मूर्तिपूजा नहीं है, यह अर्चा-विग्रह भगवान् का अवतार है

d)

अर्चा-विग्रह के द्वारा वे भक्त की सेवाएँ स्वीकार करते हैं, जिससे बद्ध जीवन वाले मनुष्य को सुविधा हो

5.

भगवान् पत्थर, लकड़ी या तैलचित्र जैसे भौतिक गुणों द्वारा अभिव्यक्त अर्चा-विग्रह के माध्यम से सेवा स्वीकार करते हैं - इसके लिए क्या उदाहरण दिया गया है? (12.5)

a)

डाकघर द्वारा स्वीकृत पत्रपेटिका

b)

सड़क के किनारे रखा कोई भी लाल डब्बा

c)

अर्चा विग्रह तो पत्थर की मूर्ति है, भगवान् नहीं

d)

धनी के बजाय दरिद्र लोग नारायण के प्रतिनिधि हैं

6.

आध्यात्मिक साक्षात्कार के लिए निराकार विधि का अनुसरण करने वाले को किन दुर्गम विधियों से गुजरना होता है? (12.5)

a)

उपनिषदों से अव्यक्त स्वरूप को समझना होता है

b)

भाषा सीखनी होती है

c)

इन्द्रियातीत अनुभूतियों को समझना होता है

d)

फिर भी अन्तिम फल अनिश्चित रहता है

7.

कृष्णभावनामृत में भक्तिरत सगुणवादी मनुष्य किस प्रकार सरलता से बिना किसी संकट, कष्ट या कठिनाई के भगवान् के पास पहुँच जाते हैं? (12.5)

a)

मात्र गुरु के पथप्रदर्शन द्वारा

b)

मात्र अर्चाविग्रह को नियमित नमस्कार द्वारा

c)

मात्र भगवान् की महिमा के श्रवण द्वारा

d)

मात्र भगवान् पर चढ़ाये गये उच्छिष्ट भोजन को खाने से

8.

ज्ञानयोगी आध्यात्मवादी की निराकार विधि को इस युग में प्रोत्साहन क्यों नहीं मिलना चाहिए? (12.5)

a)

निराकारवाद का दीर्घ अभ्यास कष्ट का कारण बन जाता है, क्योंकि वह उस विचार को त्याग नहीं पाता

b)

अव्यक्त अनुभूति उसके आध्यात्मिक आनन्दमय आत्म (स्व) की प्रकृति के विरुद्ध है

c)

यदि कोई भक्ति की उपेक्षा करना चाहता है, तो नास्तिक होने का संकट रहता है

9.

मनुष्य क्या करें कि भगवान् उनका इस भवसागर से तुरन्त ही उद्धार कर दें? (12.6-7)

a)

माया की सेवा करनी होगी

b)

पूर्ण रूप से भोगी बनें

c)

कृष्ण के लिए ही कर्म करें

d)

जीवन का उद्देश्य मन-इन्द्रियों को प्रसन्न करना है

10.

आत्मा को वैकुण्ठलोक में ले जाने के लिए भक्त को क्या करने की आवश्यकता होती है? (12.6-7)

a)

अनुभवी बनने के लिए प्रतीक्षा

b)

योगाभ्यास

c)

अष्टांगयोग साधना

d)

स्वयं भगवान् ही उसे ले जाते हैं

11.

भगवान् अपने अनुग्रहवश स्वयं ही अपने पक्षीवाहन गरुड़ पर सवार होकर तुरन्त भक्त को भवसागर से उबार लेते हैं, पर अन्य योग विधियों, चिन्तन, अनुष्ठानों, यज्ञों, दानपुण्यों आदि से प्राप्त होने वाले लाभ भी मिलेंगे इसका क्या प्रमाण है? (12.6-7)

a)

(वराह पुराण) नयामि परमं स्थानमर्चिरादिगतिं विना | गरुडस्कन्धमारोप्य यथेच्छमनिवारितः ||

b)

(नारायणीय) या वै साधनसम्पत्तिः पुरुषार्थचतुष्टये | तया विना तदाप्नोति नरो नारायणाश्रयः ||

12.

भक्तियोगी के विषय में क्या सही है? (12.8)

a)

भक्त का परमेश्वर के साथ अप्रत्यक्ष सम्बन्ध है

b)

भक्त कभी भौतिक धरातल पर नहीं रहता

c)

भगवान् का पवित्र नाम तथा भगवान् भिन्न हैं

d)

बहिरंगा शक्ति भक्त की जिह्वा पर नाचती रहती है

e)

कृष्ण भक्त के भोग को ग्रहण नहीं करते

13.

संसार में इस समय सारी इन्द्रियाँ सदा अशुद्ध हैं, क्योंकि वे ________ (12.9)

a)

इन्द्रियतृप्ति में लगी हुई हैं

b)

कृष्ण की सेवा में लगी हैं

c)

अनब्रांडेड वस्तुओं के प्रति आसक्त हैं

d)

निम्न-माध्यम आयवर्गीय शरीर में फंसी हैं

14.

जिसने अभी भगवान् कृष्ण के प्रति आसक्ति उत्पन्न नहीं की है, उसे सुविज्ञ गुरु के मार्गदर्शन में किन कतिपय नियमों का पालन करना होता है? (12.9)

a)

ब्रह्ममुहूर्त के बाद जागना, स्नान न करना

b)

मन्दिर में प्रार्थना करना एवं हरे कृष्ण कीर्तन करना

c)

विग्रह के लिए भोजन बनाना, प्रसाद ग्रहण करना

d)

शुद्ध भक्तों से नियमित रूप से भगवद्गीता सुनना

15.

किसी भी व्यापार में व कृष्णसेवा के लिए भी किनकी आवश्यकता होती है? (12.10)

a)

भूमि

b)

पूँजी

c)

संगठन

d)

श्रम

e)

धोखाधड़ी

16.

जिसने अभी भगवान् के प्रति आसक्ति विकसित नहीं की है और भक्तियोग के विधि-विधानों का प्रत्यक्ष रूप से अभ्यास भी नहीं कर सकता, उसे भगवत्प्रेम की अवस्था को प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए? (12.10)

a)

प्रचार कार्य में सहायता देने का प्रयत्न करना चाहिए

b)

कृष्ण की तुष्टि के लिए कार्य करना चाहिए

c)

अपने कर्मों के फल का कुछ % प्रचारसेवा में लगाए

d)

कृष्णभावनामृत की दिशा में स्वेच्छा से सेवा करे

17.

(1) व्यक्ति की कृष्ण में आसक्ति नहीं हुई है, (2) भक्ति के विधि-विधानों का पालन नहीं कर पा रहा, (3) कृष्णभावनामृत के प्रचार में भी सहायता या कर्मफल अर्पित नहीं कर पा रहा, तो ऐसे व्यक्ति के लिए भी कुछ विकल्प है क्या? (12.11)

a)

ना, अब कुछ नहीं हो सकता, भूल जाओ कृष्ण प्रेम

b)

क्रमिक शुद्धिकरण के लिए अपने कर्मफल का परित्याग करने का प्रयत्न करे

18.

भगवान् तक पहुँचने के लिए कृष्णभावनामृत में भक्ति की प्रत्यक्ष विधि स्वीकार न करने की स्थिति में सभी अप्रत्यक्ष विधियों में क्या करना आवश्यक है? (12.12)

a)

कर्मफल को त्यागकर किसी अच्छे कार्य में लगाना

b)

कर्मफल को केवल अपने भोग व इन्द्रियतुष्टि के लिए प्रयोग करना

19.

आप भगवत्प्रेम प्राप्त करने की कौनसी विधि का पालन करना पसंद करेंगे और कर्मफल के उपयोग के विषय में आपका क्या विचार है?

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