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WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-43 (11.8-17)
Total questions: 14
Worksheet time: 1hrs 20mins
कृष्ण के साथ दिव्य सम्बन्ध से बँधे भक्त किससे आकृष्ट होते हैं? (11.8)
कृष्ण के ऐश्वर्यों के ईश्वरविहीन प्रदर्शन से
कृष्ण के प्रेममय स्वरूपों से
शुद्ध भक्तों का कृष्ण के प्रति क्या भाव रहता है? (11.8)
कृष्ण के शुद्ध भक्त यह कभी नहीं चाहते कि कृष्ण उन्हें अपने ऐश्वर्यों का प्रदर्शन कराएँ
वे तो शुद्ध प्रेम में इतने निमग्न रहते हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि कृष्ण भगवान् हैं
वे प्रेम के आदान-प्रदान में इतने विभोर रहते हैं कि वे भूल जाते हैं कि श्रीकृष्ण परमेश्वर हैं
भक्त को भगवान् के विराट रूप का दर्शन करने के लिए क्या बदलने की आवश्यकता है? (11.8)
दृष्टि
मन
परम भगवान् श्रीकृष्ण को "महायोगेश्वरो हरिः" कहकर किसने सम्बोधित किया? (11.9)
संजय
अर्जुन
धृतराष्ट्र
दुर्योधन
अर्जुन ने भगवान् के आश्चर्यमय, तेजमय, असीम तथा सर्वत्र व्याप्त विश्वरूप में असंख्य मुख, असंख्य नेत्र तथा असंख्य आश्चर्यमय दृश्य सहित क्या-क्या दिव्य देखा? (11.10-11)
अनेकदिव्याभरणं - आभूषण
दिव्यानेकोद्यतायुधम् - उठे हुए हथियार
दिव्यमाल्याम्बरधरं - मालाएं तथा वस्त्र
दिव्यगन्धानुलेपनम् - सुगंधियाँ
व्यासदेव के अनुग्रह से सारी घटनाओं को देखने वाले संजय के अनुसार विश्वरूप का तेज कितने सूर्यों के बराबर था? (11.12)
10
100
1000
1000 से अधिक
अर्जुन ने भगवान् कृष्ण के शरीर में मिट्टी, सोने, रत्नों से बने कितने लोकों को देखा? (11.13)
3
14
33
हजारों
युद्धभूमि में कृष्ण-अर्जुन के अतिरिक्त कौन-कौन इस विराटरूप को देख पा रहा था? (11.13)
प्रत्येक व्यक्ति
कोई नहीं
शास्त्रों में कितने प्रकार के संबंधों का उल्लेख है जो सब कृष्ण में निहित हैं? (11.14)
3
5
7
12
विराटरूप का दिव्य दर्शन करते ही अर्जुन का मैत्री भाव किस रूप में परिवर्तित हो गया? (11.14)
माधुर्य
वात्सल्य
रौद्र
आश्चर्य
अर्जुन भगवान् के शरीर में किन-किन को देख पा रहा था? (11.15)
कमल पर आसीन ब्रह्मा
शिवजी
समस्त ऋषियों को
दिव्य सर्पों को (वासुकि)
भगवान् के शरीर में सर्वत्र फैले अनेकानेक हाथ, पेट, मुँह तथा आँखें देखते हुए अर्जुन उन्हें किस नाम से सम्बोधित करता है? (11.16)
विश्वेश्वर
विश्वरूप
विश्वकर्मा
विश्वम्भर
विश्वक्सेन
अर्जुन भगवान् के रूप के विषय में क्या-क्या वर्णन करते हैं? (11.17)
चकाचौंध के कारण इसे देख पाना कठिन है
अनेक मुकुटों, गदाओं तथा चक्रों से विभूषित है
मैं इस तेजोमय रूप को सर्वत्र देख रहा हूँ
यह सूर्य के अपार प्रकाश की भाँति चारों ओर फैल रहा है
क्या आप भगवान् का विराट रूप देखना चाहते हैं? क्यों या क्यों नहीं?
