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WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-45 (11.28-37)
Total questions: 20
Worksheet time: 2hrs 50mins
समस्त महान योद्धा भगवान् के विराटरूप के प्रज्जवलित मुखों में किस प्रकार प्रवेश कर रहे हैं? (11.28)
जिस प्रकार नदियों की अनेक तरंगें समुद्र में प्रवेश करती हैं
जिस प्रकार दिल्ली के राजीव चौक पर यात्री मेट्रो में प्रवेश करते हैं
जिस प्रकार किसी हरे कृष्ण उत्सव में आगंतुक प्रसादम की पंक्ति में प्रवेश करते हैं
अर्जुन किस प्रकार से समस्त लोगों को पूर्ण वेग से विराटरूप के मुख में प्रविष्ट होते देख रहा है? (11.29)
जिस प्रकार पतिंगे अपने विनाश के लिए प्रज्जवलित अग्नि में कूद पड़ते हैं
जिस प्रकार एक क्रिकेटर रन आउट से बचने के लिए अपनी क्रीज़ की ओर भागता है
जिस प्रकार बच्चे छुट्टी की घंटी सुनकर मुख्य द्वार की ओर दौड़ते हैं
अर्जुन भगवान् कृष्ण के विराटरूप को किस नाम से सम्बोधित कर रहा है जो अपने प्रज्जवलित मुखों से सभी दिशाओं के लोगों को निगल रहे हैं? (11.30)
कृष्ण
विष्णु
गोपीनाथ
द्वारिकाधीश
देववर कहते हुए अर्जुन ने विराटरूप में भगवान् से क्या कहा? (11.31)
इतने उग्ररूप में आप कौन हैं
आप आदि-भगवान् हैं
आपका प्रयोजन क्या है
कृपा करके मुझ पर प्रसन्न हों
मैं आपको नमस्कार करता हूँ
अर्जुन के प्रश्नों का उत्तर देते हुए विराटरूप में श्रीभगवान् ने क्या कहा? (11.32)
समस्त जगतों को विनष्ट करने वाला काल मैं हूँ
मैं समस्त लोगों का विनाश करने के लिए आया हूँ
पाण्डवों के सिवा दोनों पक्षों के सारे योद्धा मारे जाएँगे
किसी भी प्रकार की निराशा से बचने के लिए अर्जुन लड़ने के पक्ष में नहीं था, इस पर विराटरूप के माध्यम से भगवान् कृष्ण ने क्या उत्तर दिया? (11.32)
यदि वह नहीं लड़ता, तो भी सारे लोग उनके ग्रास बनते, क्योंकि यही भगवान् कृष्ण की इच्छा है
मृत्यु रोकी नहीं जा सकती, चाहे वह लड़े या नहीं, यदि अर्जुन नहीं लड़ता, तो वे सब अन्य विधि से मरते
वे पहले से मृत हैं, काल विनाश है और परमेश्वर की इच्छानुसार सारे संसार को विनष्ट होना है
विराटरूप में भगवान् किस श्लोक में अर्जुन से कहते हैं - तनिक भी विचलित न होओ, केवल युद्ध करो?
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्त: ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिता: प्रत्यनीकेषु योधा: ॥ (11.32)
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुंक्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहता: पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥ (11.33)
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥ (11.34)
सव्यसाची का क्या अर्थ है? (11.33)
जो युद्धभूमि में अत्यन्त कौशल के साथ तीर छोड़ सके
जो सभी से सदा ही केवल सच बोलता है
अल्पज्ञ पुरुष क्या सोचते हैं? (11.33)
संसार भगवान् की इच्छानुसार गतिमान है
प्रकृति बिना किसी योजना के गतिशील है
सारी सृष्टि आकस्मिक है
प्रकृति द्वारा विशेष योजना संचालित की जा रही है
प्रकृति का संचालन कृष्ण की किस इच्छानुसार किया जा रहा है जिसको समझकर अनुशीलन करने वाला बुद्धिमान व्यक्ति ही वास्तव में सुखी हो सकता है? (11.33)
प्रकृति के ऊपर प्रभुत्व स्थापित करने की प्रवृत्ति में लगे रहो और बद्ध बने रहो
इस विराट जगत में भोग प्रवृत्ति को त्यागो, कृष्णभावनामृत का अनुशीलन करो और भगवान् के धाम वापस जाने के सुअवसर का लाभ लो
अर्जुन को भगवान् ने युद्ध सम्बन्धी क्या निर्देश दिया? (11.33)
युद्धकौशल और बाहुबल से अपने शत्रुओं को जीतो
युद्ध में केवल निमित्तमात्र बन जाओ
द्रोण, भीष्म व कर्ण के अतिरिक्त भगवान् किस का नाम लेकर कहते हैं कि वे सब पहले ही मारे जा चुके हैं? (11.34)
दुःशासन
जयद्रथ
दुर्योधन
अभिमन्यु
घटोत्कच
भगवान् की इच्छानुसार उनकी योजना का पालन करने का क्या लाभ है? (11.34)
ऐसे भक्तों को ही वे उसका श्रेय देते हैं
जीवन-संघर्ष में विजयी बन सकते हैं
कोई लाभ नहीं है, व्यक्ति बेकार हो जाता है
भगवान् की योजना को कैसे जान सकते हैं? (11.34)
उर्वरक मस्तिष्क की मनोधर्मिता से
गुरु के माध्यम से
भगवान् की कृपा से
भक्तों की योजनाएँ उनकी ही योजनाएँ हैं
भयभीत होकर अवरुद्ध स्वर में आश्चर्य से कांपते हुए भगवान् को बारम्बार नमस्कार करते हुए अर्जुन को संजय ने किस नाम से सम्बोधित किया है? (11.35)
केशव
किरीटी
कृष्ण
अर्जुन
अर्जुन ने "भगवान् के गुणगान" का वर्णन किन शब्दों से किया है जिसके प्रति सभी लोग अनुरक्त होते हैं, सिद्धलोग नमस्कार करते हैं जबकि भयभीत होकर असुरगण भाग जाते हैं? (11.36)
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या
जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घा:
इनमें से क्या सही है? (11.36)
कृष्ण जो कुछ करते हैं, वह सब उचित है
कृष्ण के सारे कार्य सबों के लिए समान रूप से शुभ होते हैं
भक्त प्रत्येक अवस्था में भगवान् का गुणगान करता है
कृष्ण जो कुछ भी करते हैं, वह सबों के हित में है
असुर तथा नास्तिक भगवान् के विश्वरूप से आनंदित होते हैं
अर्जुन ने किस शब्द से स्पष्ट किया है कि भगवान् इस जगत की तरह विनाशशील नहीं हैं? (11.37)
अनन्त
देवेश
जगन्निवास
अक्षरं
अर्जुन किन शब्दों से कहता है कि ब्रह्मा से भी बढ़कर कृष्ण आदि स्रष्टा हैं? (11.37)
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्
गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे
अनन्त देवेश जगन्निवास
त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्
अर्जुन के द्वारा अनुभव की जा रही विभीषिका से आज के जीवन की तुलना करते हुए आप अपने लिए क्या सही कर्त्तव्य पाते हैं?
