WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-66 (18.29-38)
Total questions: 18
Worksheet time: 2hrs 40mins
धृति - का क्या अर्थ है जिसके विषय में भगवान् वर्णन करने वाले हैं? (18.29)
बुद्धि
संकल्प
धैर्य
सात्त्विकी बुद्धि क्या बताती है? (18.30)
क्या करणीय है और क्या नहीं
अच्छे बुरे का भेद
क्या बाँधने वाला है और क्या मुक्ति देने वाला है
किससे डरना चाहिए और किससे नहीं
प्रवृत्ति किसे कहते हैं? (18.30)
शास्त्रों के निर्देशानुसार कर्म करने को
उन कर्मों को करना जिन्हें किया जाना चाहिए
शास्त्रों के निर्देशों को न जानकर कर्मों तथा उनकी प्रतिक्रिया से बँधना
जो बुद्धि धर्म तथा अधर्म, करणीय तथा अकरणीय कर्म में भेद नहीं कर पाती, वह ________ है । (18.31)
सात्त्विकी
राजसी
तामसी
तामसी बुद्धि कैसे कार्य करती है? (18.32)
सदैव सही दिशा में प्रयत्न
अधर्म को धर्म तथा धर्म को अधर्म
महात्मा को सामान्य और सामान्य को महात्मा
सत्य को असत्य तथा असत्य को सत्य
तामसी बुद्धि को जिस दिशा में काम करना चाहिए, उससे सदैव उल्टी दिशा में काम क्यों करती है? (18.32)
तमसावृता
अंधकार के वशीभूत
मोह से ढ़की हुई
अज्ञान
सतोवृत्ते
भगवान् किस शब्द से सूचित करते हैं कि सात्त्विक धृति (संकल्प या दृढ़ता) अटूट होती है? (18.33)
अव्यभिचारिण्या
योगेन
मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः
धृत्या यया धारयते
कृष्णभावना में तत्पर मनुष्य के संकल्प के विषय में क्या सही है? (18.33)
मन, प्राण तथा इन्द्रियों को परमात्मा में एकाग्र करके दृढ़तापूर्वक उनमें स्थित रहता है
कभी किसी दूसरे कार्य द्वारा विचलित नहीं होता
कृष्ण के अतिरिक्त उनके सभी अंशों का अनादर करता है और तुच्छ समझता है
योग (योगाभ्यास) का क्या महत्त्व है? (18.33)
योग परमात्मा को जानने का साधन है
योग इसी संसार में सुखी रहने के निमित्त है
योग शरीर को स्वस्थ रखने का नाम है
योग प्रसिद्धि प्राप्त करने का साधन है
रजोगुणी धृति के क्या लक्षण हैं? (18.34)
धार्मिक या आर्थिक कार्यों में सदैव कर्मफलों का आकांक्षी
व्यक्ति की एकमात्र इच्छा इन्द्रियतृप्ति होती है
मन, जीवन तथा इन्द्रियाँ भगवान् की संलग्न रहती हैं
कैसी दुर्बुद्धिपूर्ण धृति तामसी कहलाती है? (18.35)
जो अपने को अधिक सोने से नहीं बचा पाते
जो भौतिक वस्तुओं को भोगने के गर्व से नहीं बच पाते
जो सदैव संसार पर प्रभुत्व जताने का स्वप्न देखते रहते हैं
जो धृति स्वप्न, भय, शोक, विषाद तथा मोह के परे नहीं जाती, ऐसी धृति ________ है|(18.35)
सात्त्विकी
राजसी
तामसी
भगवान् द्वारा बताये जाने वाले तीन प्रकार के सुखों के द्वारा क्या होता है? (18.36)
बद्धजीव भौतिक सुख भोगने की बारम्बार चेष्टा करता है (अभ्यासाद्रमते)
कभी-कभी दुखों का अन्त हो जाता है (दु:खान्तं)
तथाकथित आवृत्तिमूलक सुख से मुक्त होकर व्यक्ति कब भवबन्धन से मुक्त हो पाता है? (18.36)
कभी-कभी भोग के अन्तर्गत किसी महापुरुष की संगति से
यह समझ लेने पर कि यह तथाकथित सुख एक ही वस्तु की पुनरावृत्ति है - चबाये हुए को चबाने के समान
जब वास्तविक कृष्णभावनामृत का उदय होता है
सात्त्विक सुख कैसा होता है? (18.37)
जो प्रारम्भ में विष जैसा लगता है
जो अन्त में अमृत के समान है
जो मनुष्य में आत्म-साक्षात्कार जगाता है
जो प्रारम्भ में अमृत के समान है
जो अन्त में विष जैसा है
जो सुख इन्द्रियों द्वारा उनके विषयों के संसर्ग से प्राप्त होता है ____________ | (18.38)
प्रारम्भ में इन्द्रियों को अत्यन्त सुखकर लगता है
अन्त में या कुछ समय बाद विष तुल्य बन जाता है
वह सदैव दुख का कारण बनता है
वह सतोगुणी कहलाता है
जब कोई युवक किसी युवती से मिलता है, तो इन्द्रियाँ कैसे प्रेरित करती हैं और उसका क्या परिणाम होता है? (18.38)
उस युवती को देखे, स्पर्श करे और उससे संभोग करे
उसे माता के समान देखे (मातृवत परदारेषु)
ऐसा सुख सदैव राजसी होता है
ऐसा सुख सात्त्विक कहलाता है
तब वे विलग हो जाते हैं, फिर शोक, विषाद होता है
अपने जीवन के अनुभव से कोई राजसी सुख के उदाहरण बताइये जिसमे प्रारम्भ में तो अमृत जैसा सुख था पर अंततः केवल विष |
