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Bhagavad Gita As It Is DAY-62 (17.17-25)

Total questions: 15

Worksheet time: 1hrs 25mins

Name
Class
Date
1.

किन के द्वारा किये जाने पर मन, वाणी, शरीर की यह तीन प्रकार की तपस्या सात्त्विक तपस्या कहलाती है? (17.17)

a)

फलाकाङ्क्षिभिः - भौतिक लाभ की इच्छा करने वाले

b)

युक्तैः - केवल परमेश्वर में प्रवृत्त मनुष्यों द्वारा

c)

श्रद्धया परया - दिव्य श्रद्धा से संपन्न

2.

राजसी तपस्या के क्या लक्षण होते हैं? (17.18)

a)

सम्मान, सत्कार एवं पूजा कराने के लिए की जाती है

b)

इसके फल शाश्वत हैं, हमेशा तक रहते हैं

c)

दंभपूर्वक सम्पन्न की जाती है

d)

राजसी तपस्या और इसके फल कभी स्थायी नहीं होते

3.

कैसी तपस्या तामसी कहलाती है? (17.19)

a)

मूर्खतावश

b)

आत्म-उत्पीड़न के लिए

c)

अन्यों को विनष्ट करने के लिए

d)

हानि पहुँचाने के लिए

e)

किसी असम्भव वस्तु के लिए

4.

कैसा दान सात्त्विक माना जाता है? (17.20)

a)

वैदिक साहित्य में अविचार पूर्ण दान की संस्तुति है

b)

ऐसे व्यक्ति को जो आध्यात्मिक कार्यों में लगा हो

c)

किसी प्रकार की प्राप्ति की अभिलाषा न रखते हुए

d)

तीर्थ स्थान में, सूर्य-चन्द्रग्रहण के समय, मन्दिर में

e)

आध्यात्मिक सिद्धि के लिए कर्त्तव्य समझकर

5.

योग्य (पात्र) न होने पर भी यदि करुणावश निर्धन को दान दिया जाए तो वह कैसा है? (17.20)

a)

योग्य हो या अयोग्य, निर्धन को दान - महादान

b)

तीव्रता से आध्यात्मिक प्रगति होती है

c)

उससे आध्यात्मिक प्रगति नहीं होती

d)

उसके आशीर्वाद से भौतिक लाभ मिलता है

6.

वैदिक शास्त्र कैसे दान की संस्तुति करते हैं? (17.21)

a)

सतोगुणी

b)

रजोगुणी

c)

तमोगुणी

7.

किस प्रकार किया गया दान राजसी नहीं कहलाता? (17.21)

a)

पश्चाताप कि मैंने इतना व्यय इस तरह क्यों किया

b)

उन संस्थाओं को जहाँ इन्द्रियभोग का बाजार गर्म है

c)

स्वर्ग जाने हेतु प्रत्युपकार या कर्म फल की इच्छा से

d)

अपने वरिष्ठजनों के दबाव में आकर अनिच्छापूर्वक

e)

कर्त्तव्य-भाव से आध्यात्मिक लाभ हेतु भक्त को

8.

कैसा दान तामसी कहलाता है? (17.22)

a)

उपयुक्त व्यक्ति को बिना सम्मान तथा ध्यान दिये

b)

अपवित्र स्थान में, अनुचित समय में

c)

मद्यपान तथा द्यूतक्रीड़ा में व्यसनी के लिए

d)

पापी पुरुषों को प्रोत्साहन देने के लिए

9.

ॐ तत् सत् - का क्या वैदिक महत्त्व है कि आदिकाल में जब प्रथम जीवात्मा ब्रह्मा ने यज्ञ किये, तो उन्होंने इन तीनों शब्दों के द्वारा भगवान् को लक्षित किया था ? (17.23)

a)

ॐ - ॐ इत्येतद्ब्रह्मणो नेदिष्ठं नाम (ऋग्वेद) प्रथम लक्ष्य का सूचक है

b)

तत् - तत् त्वमसि (छान्दोग्य उपनिषद 6.8.7) दूसरे लक्ष्य का सूचक है

c)

सत् - सद् एव सौम्य (छान्दोग्य उपनिषद 6.2.1) तृतीय लक्ष्य का सूचक है

10.

ॐ तत् सत् - का क्या अर्थ है? (17.23)

a)

परब्रह्म को सूचित करने के लिए प्रयुक्त

b)

वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते समय प्रयुक्त

c)

ब्रह्म की संतुष्टि के लिए यज्ञों के समय प्रयुक्त

d)

कोई भी कार्य ॐ तत् सत् के लिए, अर्थात् भगवान् के लिए

11.

इनमें से क्या सही है? (17.23)

a)

ॐ तत् सत् ये तीन शब्द विशेष रूप में परम सत्य भगवान् के सूचक हैं और उनके साथ बोले जाते हैं, जैसे ॐ तद्विष्णोः

b)

कोई भी कार्य जब ब्रह्म-ॐ तत् सत् को लक्ष्य करके किये जाते हैं तो आध्यात्मिक उन्नति के साधन बन जाते हैं

c)

जब कोई इन तीनों शब्दों के द्वारा तप, दान तथा यज्ञ सम्पन्न करता है, तो वह कृष्णभावनामृत में कार्य करता है

12.

योगीजन ब्रह्म की प्राप्ति के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार यज्ञ, दान तथा तप की समस्त क्रियाओं का शुभारम्भ सदैव _____ से करते हैं | (17.24)

a)

b)

तत्

c)

सत्

d)

शोम

13.

ॐ तद् विष्णोः परमं पदम् (ऋग्वेद 1.22.20) का क्या आशय है? (17.24)

a)

भोग के लिए सम्पन्न हर एक क्रिया सारे कार्य क्षेत्र की सिद्धि निश्चित कर देती है

b)

विष्णु के चरण कमल ही परम भक्ति के आश्रय हैं

14.

विविध प्रकार के यज्ञ, तप तथा दान कार्य किस प्रकार किये जाने चाहियें? (17.25)

a)

कर्मफल की इच्छा किये बिना

b)

भगवान् के परम धाम वापस जाने के उद्देश्य से

c)

आध्यात्मिक पद तक उठने के लिए

d)

किसी लाभ के निमित्त कर्म करे

e)

‘तत्’ शब्द कह कर सम्पन्न करे

15.

अपने द्वारा अज्ञानता में की गयी रजोगुणी/तमोगुणी तपस्या, दान, यज्ञ विषय में बताइये |

आगे से क्या करना है, वह तो अब आप बखूबी जान ही चुके हैं |

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