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WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-08 (2.25-34)
Total questions: 23
Worksheet time: 1hrs 21mins
पिता के स्वरुप/अस्तित्व को जानने का साधन/एकमात्र प्रमाण क्या है? (2.25)
बौद्धिक परीक्षण
डी एन ए टेस्ट
पड़ोसी
माता
क्या आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती/सकती है? (2.25)
नहीं, शाश्वत रूप से अविकारी रहते हुए आत्मा अनन्त परमात्मा की तुलने में अणु-रूप है
हाँ, जैसे नदी समुद्र में, घड़े की वायु आकाश में मिल जाती है
नहीं, क्या पुत्र कभी माता में विलीन हो सकता/ जाता है?
आत्मा के गुणों : अव्यक्त, अकल्पनीय तथा अपरिवर्तनीय को बार-बार दोहराया क्यों जा रहा है? (2.25)
शायद भगवान् श्रीकृष्ण या व्यासदेव जी भूल गए हैं
दुहराना उस तथ्य को बिना किसी त्रुटि के समझने के लिए आवश्यक है
ऐसे कौन से दार्शनिक हैं जो नहीं मानते कि शरीर के परे भी आत्मा का स्वतन्त्र अस्तित्व है और जीवन के लक्षणों को भौतिक संयोग की घटना मानते हैं? (2.26)
लोकायतिक तथा वैभाषिक नाम से जाने जाने वाले पुरातन दार्शनिक
आधुनिक भौतिक विज्ञानी तथा भौतिकवादी दार्शनिक
नृतत्त्व विज्ञान, अनेक आधुनिक छद्म धर्म व शून्यवादी अभक्त बौद्ध अनुयायी
जो भौतिकतावादी आत्मा में विश्वास ही नहीं करते उनके लिए क्यों शोक करने का कारण नहीं है? (2.26)
थोड़े से रसायनों की क्षति के लिए शोक करके कोई कर्तव्यपालन छोड़ता है क्या?
यदि पदार्थ से प्रत्येक क्षण असंख्य जीव उत्पन्न होते है और नष्ट होते रहते हैं, तो शोक कैसा?
यदि आत्मा का पुनर्जन्म नहीं होता तो अर्जुन को स्वजनों के वध करने के पापफलों से डरने का कोई कारण ही नहीं, नहीं?
कृष्ण ने अर्जुन को व्यंगपूर्वक महाबाहु कह कर क्यों सम्बोधित किया? (2.26)
क्योंकि अर्जुन को वैदिक ज्ञान के प्रतिकूल, आत्मा को नकारने वाला, वैभाषिक ज्ञान स्वीकार्य नहीं था
क्षत्रिय होने के नाते वैदिक सिद्धान्तों का पालन करते रहना ही उसके लिए शोभनीय था
कौन सा श्लोक बताता है कि जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और उसके बाद पुनर्जन्म निश्चित है?
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च |
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि || 2.27 ||
आश्र्चर्यवत्पश्यति कश्र्चिदेनमाश्र्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः |
आश्र्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्र्चित् || 2.29 ||
जब कर्मों के अनुसार जन्म ग्रहण करना होता है, फिर मृत्यु और फिर जन्म, तो फिर तो कहीं भी युद्ध या वध किया जा सकता है | क्या यह सही समझ है या कुरुक्षेत्र युद्ध की सही समझ क्या है? (2.27)
जन्म-मरण के इस चक्र से वृथा हत्या, वध या युद्ध का समर्थन नहीं होता
शान्ति तथा व्यवस्था बनाये रखने के लिए हिंसा तथा युद्ध अपरिहार्य हैं
कुरुक्षेत्र का युद्ध भगवान् की इच्छा होने के कारण अपरिहार्य था
सत्य के लिए युद्ध करना क्षत्रिय का धर्म है
भगवद्गीता का वैदिक निष्कर्ष क्या है? (2.28)
भौतिक शरीर कालक्रम में नाशवान हैं (अन्तवन्त इमे देहाः)
आत्मा शाश्वत है (नित्यस्योक्ताः शरीरिणः)
ऐसे कौन हैं जो विश्व के प्रथम प्राणी ब्रह्मा के शिक्षक द्वारा समझाने पर भी अणु-आत्मा के चमत्कारों को नहीं समझ पाते? (2.29)
अल्पज्ञ तथा दुराचारी व्यक्ति
जो पांचवीं पास से कम हैं
भगवद्भक्त
इन्द्रियतृप्ति की बातों में फँस कर भौतिक शक्ति से मोहित होने का क्या दुष्परिणाम होता है? (2.29)
आत्मज्ञान को समझने का अवसर ही नहीं रहता
सारे कार्यों का दुष्परिणाम जीवन-संघर्ष में पराजय
अज्ञानवश परमात्मा तथा अणु-आत्मा को एक समझ बैठते हैं
आत्म-ज्ञान को समझने का सरलतम उपाय क्या है? (2.29)
विचलित हुए बिना भगवद्गीता के उपदेश को ग्रहण करें
पिछले जन्मों में प्रचुर तपस्या की हो या अब करें
कृष्ण को श्रीभगवान् के रूप में स्वीकार करें
शुद्ध भक्तों की अहैतुकी कृपा
इनमें से क्या शब्द आत्मा के लिए प्रयुक्त नहीं हुआ है? (2.30)
देह
देही
नित्यं
अवध्य
हिंसा की आवश्यकता है या नहीं यह किस आधार पर उचित ठहराया जा सकता है? (2.30)
आत्मा तो मरती ही नहीं, शरीर मृत ही है, तो सब उचित है
भगवान् की आज्ञा के आधार पर
अपनी सनकी स्वेच्छा से
क्षत्रिय कौन कहलाता है? (2.31)
जो क्षति से रक्षा करे
जो उत्तम शासन प्रदान करे
जो चोट खाया हुआ हो
जो धर्मार्थ ललकारने और मारने में प्रशिक्षित हो
धर्म के लिए वध हिंसा कार्य नहीं माना जाता, ऐसा कैसे? (2.31)
निहित धर्म के कारण प्रत्येक व्यक्ति को लाभ पहुँचता है
यज्ञ में बलि दिये गये पशु को तुरन्त मनुष्य का शरीर प्राप्त हो जाता है
युद्धभूमि में मारे गये क्षत्रिय, यज्ञ सम्पन्न करने वाले ब्राह्मणों को प्राप्त होने वाले, स्वर्गलोक में जाते हैं
स्वधर्म क्या होता है? (2.31)
अपना-अपना धर्म, जैसे मैं चाहूँ
मुक्ति से पहले शारीरिक स्तर पर वर्णाश्रम धर्म
देहात्मबुद्धि से मुक्त होने पर आध्यात्मिक धर्म
हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई-पारसी-यहूदी-जैन धर्म
वर्णाश्रम धर्म के विषय में क्या सही नहीं है? (2.31)
शारीरिक स्तर पर स्वधर्म
अध्यात्मिक बोध का प्रथम सोपान
मानवीय सभ्यता का शुभारम्भ
जीवन के उच्चतर पद को प्राप्त करने का अवसर
ऊंच-नीच जाति-पाति का भेदभाव
पराशर-स्मृति के अनुसार क्षत्रिय का क्या धर्म है? (2.32)
सभी क्लेशों से नागरिकों की रक्षा करे
शान्ति तथा व्यवस्था बनाये रखने के लिए हिंसा भी करे
शत्रु राजाओं के सैनिकों को जीते
धर्मपूर्वक संसार पर राज्य करे
पराशर मुनि किसके पिता हैं? (2.32)
नारद मुनि
शुकदेव गोस्वामी
सत्यवती
व्यासदेव
यदि अर्जुन अपने स्वधर्म, युद्ध करने के कर्तव्यपालन की उपेक्षा करता है तो क्या परिणाम होगा? (2.33)
वह क्षत्रिय धर्म की उपेक्षा का दोषी होगा
शिव, द्रोण, इंद्र आदि से प्राप्त यश की हानि होगी
नरक जाने के लिए अपना मार्ग तैयार कर लेगा
स्वजनों को मरने से बचा लेगा
नरक ले जाने वाले पापकर्म से बच जाएगा
अर्जुन के मित्र तथा गुरु के रूप में भगवान् कृष्ण अर्जुन को क्या अंतिम निर्णय देते हैं? (2.34)
युद्ध प्रारम्भ होने के पूर्व ही युद्धभूमि छोड़ दे
लोग कायर कहें, गाली दें, देते रहें
युद्धभूमि से भागकर अपनी जान बचा लो
सम्माननीय व्यक्ति के लिए अपकीर्ति मृत्यु से भी बुरी है
संग्राम से पलायन न करे अपितु युद्ध में मरे
इन श्लोकों के अध्ययन से आपने अपने जीवन में आने वाली दुविधाओं के समय अपने सही कर्तव्य निर्धारण के विषय में क्या सीखा?
