Font size
WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-24 (5.27-29, 6.1-8)
Total questions: 28
Worksheet time: 3hrs 30mins
कृष्णभावनामृत के प्रारंभ से मुक्ति तक को क्रम से लगाएं | (5.27-28)
ABC
CBA
CAB
ACB
इनमें से क्या अष्टांगयोग की आठ विधियों में से नहीं है? (5.27-28)
यम, नियम
संकल्प, विकल्प
आसन, प्राणायाम
प्रत्याहार, धारणा
ध्यान तथा समाधि
शब्द, स्पर्श, रूप, स्वाद तथा गंध का निराकरण करने के योगविधि क्या कहलाती है? (5.27-28)
प्राणायाम
प्रत्याहार
धारणा
ध्यान
समाधि
योग विधि में नथुनों के भीतर श्वास की गति को रोकने के लिए किन दो वायुओं को सम किया जाता है? (5.27-28)
प्राण
अपान
व्यान
समान
उदान
इन्द्रियों को वश में करके, भय तथा क्रोध से मुक्त होकर परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव करने की सरलतम विधि क्या है? (5.27-28)
अष्टांगयोग
कृष्णभावनामृत
संसार में व्यष्टि या समष्टि रूप से शान्ति प्राप्त करने के लिए क्या समझना आवश्यक है? (5.29)
भगवान् प्रकृति के कठोर अनुशासन के अन्तर्गत हैं
बद्धजीव प्रकृति (माया) के स्वामी हैं
सर्वत्र भगवान् की माया का प्रभुत्व है
भगवान् कृष्ण समस्त मानवीय कर्मों के भोक्ता हैं
भगवान् बड़े से बड़े देवता, शिव तथा ब्रह्मा से भी महान हैं
भौतिक दुखों से शान्ति लाभ के लिए व्यक्ति को भगवान् कृष्ण को किस रूप में जानना चाहिए? (5.29)
भोक्तारं यज्ञतपसां - समस्त यज्ञों तथा तपस्याओं का परम भोक्ता
सर्वलोकमहेश्र्वरम् - समस्त लोकों तथा देवताओं का परमेश्वर
सुहृदं सर्वभूतानां - समस्त जीवों का उपकारी एवं हितैषी
कैसे समझें कि भगवान् पक्षपात नहीं करते? (5.29)
माया पर प्रभुत्व की इच्छा ही जीव के कष्टों का मूल कारण है
कृष्णभावनामृत जीव को आध्यात्मिक जीवन में ले आता है
भक्ति करने पर जीव का दिव्य स्वरूप पुनः प्रकट होता है
जो जितना प्रगत है, उतना पदार्थ के बन्धन से मुक्त रहता है
यह व्यक्तिगत व्यावहारिक कर्तव्यपालन पर निर्भर करता है
भगवद्गीता यथारूप के छठे अध्याय का क्या नाम है?
दिव्य ज्ञान
कर्मयोग – कृष्णभावनाभावित कर्म
ध्यानयोग
भगवद्ज्ञान
भगवत्प्राप्ति
संसार में प्रत्येक मनुष्य के लिए पूर्णता की कसौटी है – कृष्णभावनामृत में कर्म करना, कर्म के फलों का भोग करने के उद्देश्य से नहीं | शरीर के अंगों के उदाहरण से बताएं | (6.1)
शरीर के अंग पूरे शरीर के लिए कार्य करते हैं
शरीर के अंग अपनी तृप्ति के लिए कार्य करते हैं
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति की क्या इच्छा होती है कि वह पूर्ण संन्यासी या पूर्णयोगी कहलाता है? (6.1)
निराकार ब्रह्म से तादात्मय स्थापित करना
भौतिक इच्छा
आत्मतुष्टि की इच्छा
कृष्ण को प्रसन्न करना
त्याग के सर्वोच्च प्रतीक भगवान् चैतन्य क्या अभिलाषा करते हैं? (6.1)
धन-संग्रह की कामना
सुन्दर स्त्रियों के साथ रमण
अनुयायियों की कामना
प्रेमाभक्ति की अहैतुकी कृपा
भगवान् श्रीकृष्ण के कथनानुसार कौन संन्यासी और असली योगी है? (6.1)
जो पुरुष अपने कर्मफल के प्रति आसक्त है
जो अपने कर्तव्य का पालन करता है
जो कोई कर्म नहीं करता है
जो अग्नि नहीं जलाता है
जीवात्मा भगवान् की कौन सी शक्ति कहलाता है? (6.2)
अंतरंगा
बहिरंगा
तटस्था
किस प्रकार कृष्णभावनाभावित व्यक्ति संन्यासी तथा योगी साथ-साथ होता है? (6.2)
वह कृष्ण के पूर्णज्ञान के कारण समस्त प्रकार की आत्मतृप्ति को त्यागकर आध्यात्मिक शक्ति में सजग रहता है
उसे ऐसी किसी भी वस्तु में अपनी इन्द्रिय लगाने का अवसर ही नहीं मिलता जो कृष्ण के निमित्त न हो
योगारुरुक्षु अवस्था से प्रारम्भ होकर अन्तिम भाग योगारूढ तक जाने वाली योग सीढ़ी के तीन हैं? (6.3)
ज्ञानयोग
ध्यानयोग
भक्तियोग
राजयोग
सहजयोग
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति किस प्रकार यंत्रवत् प्रयास किये बिना योगारूढ हो जाता है? (6.4)
कृष्णभावनामृत मनुष्य सदैव स्वार्थ में तत्पर रहता है
कृष्ण की प्रसन्नता के लिए ही सब कुछ करता है
इन्द्रियतृप्ति से पूरी तरह विरक्त रहता है
भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में पूरी तरह लगा रहता है
सकामकर्मों में प्रवृत्त होता है
प्रसंग के अनुसार आत्मा शब्द का क्या-क्या अर्थ होता है? (6.5)
शरीर
मन
आत्मा
उदर
शुद्ध आत्मा इस संसार में किसलिए फँसा हुआ है? (6.5)
मन मिथ्या अहंकार में लगकर प्रकृति के ऊपर प्रभुत्व जताना चाहता है
जो जितना ही इन्द्रियविषयों के प्रति आकृष्ट होता है वह उतना ही इस संसार में फँसता जाता है
इनमें से क्या गलत है? (6.5)
मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का भी कारण है
इन्द्रियविषयों में लीन मन बन्धन का कारण है
विषयों से विरक्त मन मोक्ष का कारण है
सर्वोत्कृष्ट है कि मन को सदैव कृष्णभावनामृत से रिक्त रखें
मन को किस प्रकार प्रशिक्षित किया जाना चाहिए? (6.5)
वह बद्धजीव को अज्ञान के दलदल से निकाल सके
वह प्रकृति की तड़क-भड़क से आकृष्ट न हो
जिससे बद्धजीव की रक्षा की जा सके
परम मुक्ति के लिए निरन्तर कृष्णभावनामृत में लगा रहे
योगपद्धति का उद्देश्य क्या है? (6.5)
मन को रोकना
इन्द्रियविषयों के प्रति आसक्ति हटाना
प्रकृति के ऊपर प्रभुत्व जताना
अपना उद्धार करे और अपने को नीचे न गिरने दे
प्रकृति की तड़क-भड़क से आकृष्ट हो
मन को वश में न करने से क्या नुक्सान है? (6.6)
योगाभ्यास करना मात्र समय को नष्ट करना है
सतत अपने परम शत्रु के साथ निवास का अवसर
काम, क्रोध आदि की आज्ञाओं को पालना होगा
भगवान् की आज्ञा के प्रति समर्पित होना पड़ेगा
जिसने मन को जीत लिया है उसे कैसे पहचानें? (6.7)
उसने पहले ही परमात्मा को प्राप्त कर लिया है
उसने शान्ति प्राप्त कर ली है
उसके लिए सुख-दुख, सर्दी-गर्मी एवं मान-अपमान एक से हैं
स्वतः ही परमात्मा के आदेश का पालन करता है
क्या आप भी मन को वश में करना चाहेंगे?
हाँ भई, बिलकुल
कोई नहीं कर सकता, भगवान् भी नहीं
नहीं, मुझे मन के वश में रहना पसंद है
आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त, जितेन्द्रिय तथा योगी कौन कहलाता है? (6.8)
जो अपने अर्जित ज्ञान तथा अनुभूति से पूर्णतया सन्तुष्ट रहता है
जो सभी वस्तुओं को – चाहे वे कंकड़ हों, पत्थर हों या कि सोना – एक समान देखता है
जो मात्र शैक्षिक ज्ञान से वह बाह्य विरोधाभासों द्वारा मोहित और भ्रमित होता रहता है
श्रीकृष्ण के नाम, रूप, गुण तथा उनकी लीलाओं की दिव्य प्रकृति को कौन और कैसे समझ सकता है? (6.8)
कोई भी व्यक्ति अपनी दूषित इन्द्रियों के द्वारा
भगवान् की दिव्य सेवा से पूरित होने पर ही
मात्र संसारी विद्वता से
विशुद्ध चेतना वाले का सान्निध्य प्राप्त होने पर
भगवत्कृपा से अनुभूत ज्ञान के द्वारा
वो स्थितियां लिखें जब मन आपके शत्रु के रूप में कार्य करता है |
