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WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-30 (7.12-21)
Total questions: 30
Worksheet time: 3hrs 40mins
भगवान् की शक्ति से कौन से गुण प्रकट होते हैं जिनके अधीन सारे भौतिक कार्यकलाप सम्पन्न होते हैं? (7.12)
सतोगुण
रजोगुण
तमोगुण
निर्गुण
बहुगुण
इनमें से सही चुनिए | (7.12)
प्रकृति के सभी गुण भगवान् कृष्ण से उद्भूत हैं
कृष्ण प्रकृति के गुणों के अधीन हैं
राज्य के नियमानुसार कोई दण्डित नहीं हो सकता है
नियम बनाने वाला राजा उस नियम के अधीन नहीं होता
कृष्ण निर्गुण हैं, प्रकृति के गुण उन्हें प्रभावित नहीं करते
प्रत्येक जीव प्रकृति के कितने गुणों से मोहित हैं जिसके कारण वो गुणातीत तथा अविनाशी भगवान् श्रीकृष्ण को नहीं जान पाते? (7.13)
3
5
8
13
प्रकृति के तीन गुणों के अन्तर्गत कार्य करने वाले मनुष्यों की चार श्रेणियों में से वैश्य कौन कहलाते हैं? (7.13)
जो नितान्त सतोगुणी हैं
जो सतोगुणी एवं रजोगुणी दोनों हैं
जो नितान्त रजोगुणी हैं
जो रजोगुणी एवं तमोगुणी दोनों हैं
जो नितान्त तमोगुणी हैं
सतोगुणी भी परमसत्य के किस स्वरूप से आगे नहीं बढ़ पाते, जहां तक रजोगुणी व तमोगुणी से तो कोई आशा भी नहीं की जा सकती? (7.13)
निर्विशेष ब्रह्म स्वरूप
समस्त सौंदर्य, ऐश्वर्य, ज्ञान, बल, यश तथा त्याग से भरा साक्षात् स्वरुप
भगवान् की तीन गुणों वाली दुरत्यया दैवी शक्ति को कौन सरलता से पार कर सकते हैं? (7.14)
जो भगवान् श्रीकृष्ण के शरणागत हो जाते हैं
जो भौतिक शक्ति के सम्पर्क में रहते हैं
भौतिक शक्ति से आच्छादित पराशक्ति
पदार्थ के द्वारा दूषित मोहित नित्यबद्ध बद्धजीव
भगवान् ने किन शब्दों में बताया है कि "सरलता से माया को पार कर सकते हैं"? (7.14)
दैवी ह्येषा गुणमयी
मम माया दुरत्यया
मामेव ये प्रपद्यन्ते
मायामेतां तरन्ति ते
परमेच्छा द्वारा संचालित माया की मोह रूपी रस्सी से जकड़े हुए बद्धजीव को कौन भवबंधन से छुड़ा सकता है? (7.14)
हाथ-पैर बंधा व्यक्ति स्वयं को छुड़ा सकता है
ऐसा व्यक्ति चाहिए जो बँधा न हो
केवल कृष्ण या उनके प्रामाणिक प्रतिनिधि गुरु
भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण करना
ब्रह्मा तथा शिव जो दोनों ही माया के नियंत्रण में हैं
कौन दुष्ट (दुष्कृतिन) भगवान् की शरण ग्रहण नहीं करते? (7.15)
मूढाः
नराधमाः
माययापहृतज्ञाना
आसुरं भावमाश्रिताः
आर्त
जब श्रीभगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण करने से मनुष्य प्रकृति के कठोर नियमों को लाँघ सकता है, तो बुद्धिमान तथा श्रमशील मनुष्य इस सरल विधि को क्यों नहीं अपनाते? (7.15)
लोग सही में दार्शनिक, विज्ञानी, शिक्षक, प्रशासक आदि हैं
लोग भौतिक लाभ से पूर्णतया मुक्त हैं
वे परमेश्वर की योजना या पथ को स्वीकार नहीं करते
उन्हें ईश्वर का कोई ज्ञान नहीं होता
व्यर्थ संसारी योजनाओं से स्थिति को और जटिल बना लेते हैं
नास्तिक योजना-निर्माता के विषय में क्या सही नहीं है? (7.15)
दुष्कृतिनः जिसका अर्थ है, दुष्टजन
पुण्यात्मा
अत्यन्त बुद्धिमान और प्रतिभाशाली
बुद्धि तथा प्रयास उलटी दिशा की ओर होते हैं
इन्हें पहचानें-श्रम का लाभ स्वयं उठाना चाहते हैं, नहीं जानते कि वे किसके लिए कर्म करते हैं, जीव की अमरता के विषय में सुनने का समय ही नहीं है, इन्द्रियों को सुख देने वाले समाचारों को निरन्तर सुनता रहता है |
मूढ़
नराधम
माययापहृतज्ञानाः
आसुरं भावमाश्रिताः
नराधम के गुण पहचानिये | (7.15)
सामाजिक तथा राजनीतिक दृष्टि से उन्नत, किन्तु जिनका कोई धर्म नहीं होता
मनुस्मृति के अनुसार ईशभावनामृत को जागृत करने के उद्देश्य से दस शुद्धि-संस्कारों का पालन नहीं करता
मनुष्य का सुसंस्कृत रूप मिलने पर भी सर्वशक्तिमान परमसत्य श्रीभगवान् कृष्ण को जानने का अवसर गंवाना
चार प्रकार के पुण्यात्मा – आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा ज्ञानी, जो शास्त्रीय विधि-विधानों का दृढ़ता से पालन करते हैं, _______ कहलाते हैं | (7.16)
दुष्कृतिनः
सुकृतिनः
आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा ज्ञानी श्रेणी के लोग शुद्ध भक्त क्यों नहीं हैं? (7.16)
ये भक्ति के बदले कुछ महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति करना चाहते हैं
इनकी भक्ति निष्काम होती है और उसमें किसी लाभ की आकांशा नहीं रहती
ये हर परिस्थिति में भगवान् की भक्ति करते रहते हैं
भक्तिरसामृत सिन्धु में शुद्ध भक्ति (उत्तम भक्ति) की परिभाषा किस प्रकार दी गई है? (7.16)
अन्याभिलाषिताशून्यं
ज्ञानकर्माद्यनावृतम्
आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं
स्वार्थपूर्ण, अनियमित तथा निरुद्देश्य जीवन वाले दुष्कृती भी किस प्रकार शुद्ध भक्त बन सकते हैं? (7.16)
शुद्ध भक्त के सम्पर्क में आने पर
यह एक असंभव स्वप्न है
भौतिक इच्छाओं के कल्मष से युक्त पुण्यात्मा जब शुद्धभक्त बन जाता है तो इनमें से कौन सा भगवान् को अत्यंत प्रिय है? (7.17)
आर्त
जिज्ञासु
धनहीन
ज्ञानी
ज्ञान की खोज करते रहने से मनुष्य को किन-किन स्तरों की अनुभूति होती है? (7.17)
आत्मा भौतिक शरीर से भिन्न है
निर्विशेष ब्रह्म का ज्ञान
परमात्मा का ज्ञान
ईश्वर के नित्यदास की स्वाभाविक स्थिति की अनुभूति
आर्त, जिज्ञासु, धन का इच्छुक तथा ज्ञानी स्वयं कैसे शुद्ध हो जाते हैं? (7.17)
मिश्रित भक्ति करते रहने से
शुद्ध भक्त की संगति में
जो भक्त भक्ति के बदले कुछ लाभ चाहते हैं उन्हें भगवान् स्वीकार _______________ | (7.18)
करते हैं क्योंकि इससे स्नेह का विनिमय होता है
नहीं करते क्योंकि इस व्यापार के लिए देवता नियुक्त किये गए हैं
जो भी भगवान् के पास किसी भी उद्देश्य से आये वह महात्मा और उदारचेता कहलाता है पर फिर भी ज्ञानी भक्त भगवान् को अत्यंत प्रिय क्यों है? (7.18)
उसका उद्देश्य प्रेम तथा भक्ति से परमेश्वर की सेवा करना होता है
ऐसा भक्त भगवान् की सेवा किये बिना क्षण भर भी नहीं रह सकता
ऐसा भक्त भगवान् के अतिरिक्त और कुछ नहीं जानता और कभी भी अध्यात्मिक सम्पर्क से दूर नहीं होता
अनेक जन्म-जन्मान्तर के बाद जीव दिव्यज्ञान के किस स्तर पर भगवान् की शरण ग्रहण करता है? (7.19)
आत्म-साक्षात्कार का चरम लक्ष्य श्रीभगवान् हैं
प्रत्येक वस्तु को वासुदेव श्रीकृष्ण से सम्बन्धित समझता है
यह जगत् अध्यात्मिक विविधताओं का विकृत प्रतिबिम्ब है
श्रीकृष्ण की कृपा ही सर्वस्व है, वे ही सब कारणों के कारण हैं
प्रत्येक वस्तु वासुदेव है - इसका क्या अर्थ है? (7.19)
हर कोई कृष्ण है - मैं भी, बस सब भूल गए हैं
किसी की भी पूजा करो, एक ही बात है
वासुदेव सर्वव्यापी हैं
भगवान् श्रीकृष्ण ही समस्त पदार्थों में मूल सत्ता हैं
प्रत्येक वस्तु का परमेश्वर कृष्ण से सम्बन्ध है
कौन परम भगवान् को छोड़कर देवताओं की शरण में जाते हैं? (7.20)
जिनकी बुद्धि भौतिक इच्छाओं द्वारा मारी गई है
जो समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त हो चुके हैं
जो निम्नतर गुणों वाले (रजो तथा तमोगुणी) होते हैं
जो सोचते हैं कि देवता कुछ कार्यों के लिए भगवान् से श्रेष्ठ हैं
जो छोटी-छोटी इच्छाओं की अविलम्ब पूर्ति के लिए प्रेरित हैं
भौतिक इच्छाओं के होते हुए भी भगवान् की ओर उन्मुख होने का क्या प्रभाव होता है? (7.20)
वे बहिरंगा शक्ति द्वारा आकृष्ट नहीं होते
वे यथावत भौतिक इच्छाओं से युक्त बने रहते हैं
वे शीघ्र ही सारी कामेच्छाओं से मुक्त हो जाते हैं
वे सही उद्देश्य की ओर अग्रसर होते हैं
वे भगवान् द्वारा प्रदत्त लाभों से संतुष्ट नहीं हो पाते
जैसे ही कोई किसी देवता की पूजा करने की इच्छा करता है तो भगवान् क्या करते हैं? (7.21)
उसको अपनी शक्तियों से प्रताड़ित करते हैं
उस देवता के मंदिर, पूजाविधि को नष्ट कर देते हैं
उसकी श्रद्धा को स्थिर करते हैं
उसके मनोभावों को जानकर सुविधाएँ प्रदान करते हैं
वे उनकी स्वतन्त्रता में हस्तक्षेप नहीं करते
जीवात्मा तथा देवता दोनों ही कैसे परमेश्वर श्रीकृष्ण की इच्छा के अधीन हैं? (7.21)
जीवात्मा स्वेच्छा से किसी देवता की पूजा नहीं कर सकता है
देवता परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध कोई वर नहीं दे सकते हैं
भगवान् देवता के माध्यम से जीव की इच्छा पूरा करते हैं
वे ही विशेष देवता से वर प्राप्त करने की प्रबल इच्छा देते हैं
परमात्मा रूप में भगवान् देवता के हृदय में भी स्थित रहते हैं
वेदों में अमुक-अमुक इच्छाओं वाले को अमुक-अमुक देवताओं की शरण में जाने का उपदेश है परन्तु भगवद्गीता में भगवान् का अंतिम उपदेश क्या है? (7.21)
यदि भौतिक इच्छाएं हैं तो देवताओं की शरण में जाओ
अन्य सारे कार्यों को त्यागकर उनकी ही शरण में आएं
भगवान् के साथ-साथ मंदिर में देवताओं को भी पूजें
अपना स्वकल्पित कर्म करते रहें, बस
4 प्रकार के दुष्कृति और 4 प्रकार के सुकृति में आप अपने आप में किस के या किन के मिश्रित गुणों का अनुभव करते हैं और शुद्धभक्ति के स्तर तक आने के लिए क्या एक कदम उठाने वाले हैं? अभी सोचें और लिखें |
