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WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-57 (15.11-20)
Total questions: 33
Worksheet time: 3hrs 55mins
भगवान् कृष्ण ने यतन्तोऽप्यकृतात्मानो किन के लिए कहा है? (15.11)
तथाकथित योगी और योगियों के तथाकथित संगठन जो आत्म-साक्षात्कार के मामले में शून्य हैं
ऐसे योगी जो केवल कुछ आसनों में व्यस्त रहते हैं और सुगठित तथा स्वस्थ शरीर से सन्तुष्ट हो जाते हैं
जो सचमुच योग पद्धति में रमते हैं और जिन्हें आत्मा, जगत् तथा परमेश्वर की अनुभूति हो चुकी है
सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि का प्रकाश या तेज को भगवान् कृष्ण से उद्भूत देखते हुए कृष्णभावनामृत जगाने वाले क्या विचार हैं? (15.12)
सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि के बिना जीवित रहना असम्भव है
सूर्य सम्पूर्ण सौर मण्डल को प्रकाशित कर रहा है
चन्द्रमा के प्रकाश से सारी वनस्पतियाँ पोषित होती हैं
भोजन पकाने और फैक्टरियाँ चलाने के लिए अग्नि जलाते हैं
कौन सा शब्द सूचित करता है कि प्रत्येक वस्तु चन्द्रमा के प्रभाव से परमेश्वर के द्वारा स्वादिष्ट बनती है? (15.13)
पुष्णामि
रसात्मकः
औषधीः
ओजसा
भगवान् के किस प्रकार लोकों में, ब्रह्माण्ड में, जीव में, तथा अणु तक में प्रवेश करने से प्रत्येक वस्तु ठीक से दिखती है? (15.13)
निराकार ब्रह्म
अन्तर्यामी परमात्मा
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्
बहिरंगा शक्ति
जीवित मनुष्य पानी मैं तैर सकता है लेकिन जब जीवित स्फुलिंग इस देह से निकल जाता है तो क्या होता है? (15.13)
शरीर मृत हो जाता है और फिर डूब जाता है
मरने के तुरन्त बाद शरीर पानी में तैरता है
सारे लोक, जो वायु में तैर रहे हैं, वास्तव में भगवान् के विराट रूप की _______________ हैं । (15.13)
मुट्ठी में बँधे
मुट्ठी से बाहर
भगवान् की ही शक्ति के कारण चन्द्रमा वनस्पतियों पर क्या प्रभाव डालता है? (15.13)
चन्द्रमा समस्त वनस्पतियों का शोषण करता है
चन्द्रमा के प्रभाव से सब्जियाँ बेस्वाद बनती हैं
चन्द्रमा समस्त वनस्पतियों को जीवन-रस प्रदान करता है
वैदिक साहित्य का कोई प्रमाण है कि भगवान् आमाशय के भीतर स्थित रहकर समस्त प्रकार के अन्न को पचाते हैं? (15.14)
बृहदारण्यक उपनिषद् (5.9.1) अयमग्निर्वैश्र्वानरो योऽयमन्तः पुरुषे येनेदमन्नं पच्यते - परमेश्वर या ब्रह्म अग्निरूप में आमाशय के भीतर स्थित है और समस्त प्रकार के अन्न को पचाते हैं
वेदान्तसूत्र (1.2.27) शब्दादिभ्योऽन्तः प्रतिष्ठानाच्च – भगवान् शब्द के भीतर, शरीर के भीतर, वायु के भीतर तथा यहाँ तक कि पाचन शक्ति के रूप में आमाशय में भी उपस्थित हैं
सभी प्रकार के अन्नों की पाचक शक्ति, भगवान् द्वारा पचाये जाने वाले अन्न कौन-कौन से हैं? (15.14)
कुछ निगले जाते हैं (पेय)
कुछ चबाये जाते हैं (भोज्य)
कुछ चाटे जाते हैं (लेह्य)
कुछ चूसे जाते हैं (चोष्य)
कुछ लेपे जाते हैं (लेप्य)
समस्त जीवों के शरीरों में उपस्थित पाचन-अग्नि का क्या नाम है? (15.14)
वैश्वानर
विवस्वान
वैशम्पायन
वैशेषिक
वालखिल्य
किस प्रकार जीव भोजन करने के मामले में स्वतन्त्र नहीं है? (15.14)
भगवान् ही अन्न को उत्पन्न करते और उसे जीवन-रस प्रदान करते हैं
भगवान् ही सभी प्रकार के अन्नों के पाचन में सहायक होते हैं
जब तक वे पाचन में सहायता नहीं करते, तब तक खाने की कोई सम्भावना नहीं है
भगवान् कृष्ण कहाँ कहते हैं कि मैं ही वेदों के द्वारा जानने योग्य हूँ? (15.15)
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो
मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्
भगवान् किस प्रकार वेदान्त का संकलनकर्ता व ज्ञान के प्रदाता हैं? (15.15)
अपने अवतार व्यासदेव के रूप में कृष्ण ही वेदान्तसूत्र के संकलनकर्ता हैं
व्यासदेव द्वारा श्रीमद्भागवत रूपी वेदान्तसूत्र का भाष्य वेदान्तसूत्र की वास्तविक सूचना प्रदान करता है
वे भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में भगवद्गीता के शिक्षक हैं
क्या वैदिक प्रमाण है कि परम भगवान् को समझना और उनकी कीर्ति का गायन ही सारे वैदिक साहित्य का लक्ष्य है? (15.15)
योऽसौ सर्वैर्वेदैगीयते – चारों वेदों, वेदान्त सूत्र तथा उपनिषदों एवं पुराणों समेत सारे वैदिक साहित्य में परमेश्वर की कीर्ति का गान है
भगवान् ही चरम लक्ष्य है , वेदान्तसूत्र (1.1.4) में इसकी पुष्टि इन शब्दों में हुई है – तत्तु समन्वयात्
भगवान् जीव को किस प्रकार स्मृति, ज्ञान और विस्मृति प्रदान करते हैं? (15.15)
अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानाम् - जीव ज्योंही अपने इस शरीर को छोड़ता है, इसे भूल जाता है, लेकिन परमेश्वर द्वारा प्रेरित होने पर वह फिर से काम करने लगता है
यद्यपि जीव भूल जाता है, लेकिन भगवान् उसे बुद्धि प्रदान करते हैं, जिससे वह अपने पूर्वजन्म के अपूर्ण कार्य को फिर से करने लगता है
वैदिक ज्ञान द्वारा मनुष्य किन तीन अवस्थाओं में सिद्धि प्राप्त करता है? (15.15)
वैदिक साहित्य के ज्ञान से भगवान् के साथ अपने सम्बन्ध को समझा जा सकता है (सम्बन्ध)
विभिन्न विधियों को सम्पन्न करके उन तक पहुँचा जा सकता है (अभिधेय)
अन्त में उस परम लक्ष्य श्रीभगवान् की प्राप्ति की जा सकती है (प्रयोजन)
जीव छः परिवर्तनों से गुजरता है - जन्म, वृद्धि, अस्तित्व, प्रजनन, क्षय तथा विनाश । ये ______ शरीर के परिवर्तन हैं । (15.16)
भौतिक
आध्यात्मिक
भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार के
भौतिक जगत् का जीव क्या कहलाता है? (15.16)
च्युत
अच्युत
जीवभूत
अक्षर
क्षर
क्षर व अक्षर पुरुषों के अतिरिक्त एक अन्य परम पुरुष, जो साक्षात् अविनाशी है और जो तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका पालन कर रहा है, क्या कहलाता है? (15.17)
परमात्मा
बद्धात्मा
नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम् - के द्वारा किन वैदिक शास्त्रों में दोनों प्रकार के जीवों में से एक परम पुरुष भगवान् के बारे में बताया गया है जो उन सबका पालन करता है और उन्हें कर्मों के अनुसार भोग की सुविधा प्रदान करता है? (15.17)
कठोपनिषद् (2.2.13)
श्वेताश्वतर उपनिषद् (6.13)
भगवान् किस के पुत्ररूप में अवतार ग्रहण कर व्यासदेव के रूप में वैदिक ज्ञान की व्याख्या करते हैं? (15.18)
सत्यवती तथा पराशर
धरा तथा द्रोण
पृश्नि तथा सुतपा
अम्बिका तथा कृष्ण द्वैपायन
कौन से जीव सब प्रकार से भगवान् के समान स्तर पर हैं? (15.18)
बद्धजीव
मुक्त जीव
कोई भी नहीं क्योंकि वे पुरुषोत्तम हैं
क्या प्रमाण है कि जीव तथा भगवान् दोनों का भिन्न व्यष्टि अस्तित्व है? (15.18)
परम पुरुषोत्तम भगवान् बद्ध और मुक्त दोनों जीवों से श्रेष्ठ हैं अर्थात दोनों से भिन्न हैं
जीव और भगवान् दोनों को ही पुरुष बताया गया है अर्थात दोनों ही व्यष्टि हैं
"लोके वेदे" शब्द किस शास्त्र के लिए प्रयुक्त हुआ है जहां के लिए भगवान् कहते हैं कि मैं परम पुरुष के रूप में विख्यात हूँ? (15.18)
लोके शब्द “पौरुष आगम (स्मृति-शास्त्र) में” के लिए आया है | निरुक्ति कोश में पुष्टि की गई है – लोक्यते वेदार्थोऽनेन – “वेदों के प्रयोजन स्मृति-शास्त्रों में विवेचित है |”
छान्दोग्यउपनिषद् (8.12.3) – तावदेष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरूपं सम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः
"भजति" शब्द का क्या अर्थ प्रयुक्त होता है? (15.19)
भगवान् की सेवा
संगीतमय भजन गाना
कौन सारी वस्तुओं का ज्ञाता है? (15.19)
जो कोई भी भगवान् कृष्ण को संशयरहित होकर पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में जानता है
जो परम सत्य के विषय में केवल चिन्तन करता जाता है
जो समय का अपव्यय किये बिना सीधे कृष्णभावनामृत में लग जाता है , अर्थात् भगवान् की भक्ति करने लगता है
वैदिक ज्ञान श्रुति कहलाता है, इसका क्या अर्थ है? (15.19)
श्रवण करके सीखना, वास्तव में वैदिक सूचना कृष्ण तथा उनके प्रतिनिधियों जैसे अधिकारियों से ग्रहण करनी चाहिए
केवल सूकरों की तरह सुनना पर्याप्त नहीं है, मनुष्य को चाहिए कि अधिकारियों से समझे कि सारे जीव भगवान् के अधीन हैं
भगवद्गीता के ऐसे अनेक कट्टर भाष्यकार हैं, जो परमेश्वर तथा जीव को एक ही मानते हैं, उनका क्या? (15.19)
यदि कोई लाखों जन्मों तक चिन्तन करने पर भी इस लक्ष्य पर नहीं पहुँच पाता कि श्रीकृष्ण ही भगवान् हैं और उनकी ही शरण ग्रहण करनी चाहिए, तो उसका चिन्तन व्यर्थ जाता है
यह समझना चाहिए कि उसने सारे वैदिक ज्ञान समझ लिया है, उसे भगवान् को जानने के लिए किसी अन्य आध्यात्मिक विधि की आवश्यकता नहीं रहती
जो वैदिक शास्त्रों का सर्वाधिक गुप्त अंश, परम पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण को समझता है, उसका क्या परिणाम होगा? (15.20)
बुद्धिमान स्यात - वह बुद्धिमान हो जाएगा
कृतकृत्यश्च - उसके प्रयास पूर्ण होंगे
भगवान् की दिव्य सेवा में प्रवृत्त होने से प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति के गुणों के समस्त कल्मष से कैसे मुक्त हो सकता है? (15.20)
भगवान् सूर्य के समान हैं और अज्ञान अंधकार है | जहाँ सूर्य विद्यमान है, वहाँ अंधकार का प्रश्न ही नहीं उठता |
जब भी प्रामाणिक गुरु के मार्गदर्शन के अन्तर्गत भक्ति की जाती है, तो अज्ञान का प्रश्न ही नहीं उठता |
भगवान् ने अर्जुन को अनघ अर्थात् “हे निष्पाप” कहकर क्यों सम्बोधित किया? (15.20)
जब तक मनुष्य पापकर्मों से मुक्त नहीं हो जाता, तब तक कृष्ण को समझ पाना कठिन है
भक्ति इतनी शुद्ध तथा शक्तिमान् होती है कि एक बार भक्ति में प्रवृत्त होने पर मनुष्य स्वतः निष्पाप हो जाता है
शुद्ध भक्तों की संगति में रहकर पूर्ण कृष्णभावनामृत में भक्ति करते हुए किन हृदय की दुर्बलताओं पर विजय पानी है? (15.20)
प्रकृति पर प्रभुत्व जताने की इच्छा
भौतिक पदार्थ और उसके स्वामित्व के प्रति आसक्ति
इस पूरे 15वें अध्याय से आपने क्या सबसे महत्तवपूर्ण सीखा?
