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Bhagavad Gita As It Is DAY-68 (18.49-58)

Total questions: 37

Worksheet time: 3hrs 15mins

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Date
1.

क्या शब्द सूचित करते हैं कि वास्तविक संन्यासी कोई भौतिक भोगों की परवाह नहीं करता? (18.49)

a)

असक्तबुद्धिः

b)

जितात्मा

c)

विगतस्पृहः

d)

नैष्कर्म्य

2.

कृष्णभावनामृत में स्थित व्यक्ति कैसे वास्तव में संन्यासी है? (18.49)

a)

वह सोचता है कि अपने कार्य का फल स्वयं भोगना चाहिए

b)

भगवान् के लिए कार्य करने से वह संतुष्ट रहता है

c)

वह कृष्णसेवा से मिले दिव्य सुख से परे आनन्द ढूंढता है

d)

वह किसी भी भौतिक वस्तु के लिए आसक्त नहीं होता

e)

बिना संन्यास ग्रहण किये ही नैष्कर्म्यसिद्धि प्राप्त कर लेता है

3.

योग की सिद्धावस्था क्या कहलाती है? (18.49)

a)

योगारूढ़

b)

योगरुरुक्षुः

c)

योगभ्रष्ट

d)

योगेश्वर

4.

जैसा कि गीता 3.17 में पुष्टि हुई है – यस्त्वात्मरतिरेव स्यात्– जो व्यक्ति अपने में ________ रहता है, उसे अपने कर्म से किसी प्रकार के बन्धन का भय नहीं रह जाता | (18.49)

a)

दुःखी

b)

खोया

c)

संतुष्ट

d)

व्यस्त

e)

त्रस्त

5.

कोई व्यक्ति केवल अपने वृत्तिपरक कार्य मे लग कर कैसे परम सिद्धावस्था अर्थात् ब्रह्म को प्राप्त कर सकता है? (18.50)

a)

यदि वह कार्य भगवान् के लिए किया गया हो

b)

यदि वह कार्य शास्त्रविरुद्ध भोगेच्छा के लिए किया गया हो

c)

यदि मनुष्य अपने कर्म के फल को ही भगवान् की तुष्टि के लिए त्याग दे

6.

मिथ्या अहंकार, मिथ्या शक्ति, मिथ्या गर्व, काम, क्रोध तथा मिथ्या स्वामित्व की भावना से रहित होकर आत्म-साक्षात्कार के पद को प्राप्त होने तक की यात्रा में क्या-क्या करना होता है? (18.51-53)

a)

बुद्ध्या विश‍ुद्धया युक्तो - बुद्धि से शुद्ध होकर

b)

धृत्यात्मानं नियम्य च - धैर्यपूर्वक मन को वश

c)

शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा - इन्द्रियतृप्ति के विषयों का त्याग

d)

रागद्वेषौ व्युदस्य च - राग तथा द्वेष से मुक्त

e)

यतवाक्कायमानसः - शरीर, मन तथा वाणी को वश में

7.

कौन सा शब्द सूचित करता है कि आत्मसाक्षात्कार का पथिक थोड़ा खाता है या आवश्यकता से अधिक नहीं खाता? (18.51-53)

a)

विविक्तसेवी

b)

लघ्वाशी

c)

निर्ममः

d)

परिग्रहम्

e)

वैराग्यं

8.

मन को वश में करने के लिए पहले मनुष्य को अपने आप को किस गुण में अधिष्ठित करना होता है? (18.51-53)

a)

सत्त्व

b)

रजस

c)

तमस

d)

शुद्ध सत्त्व

9.

आत्म-साक्षात्कार के पथ पर प्रगतिशील व्यक्ति के विषय में क्या सही है? (18.51-53)

a)

स्वभावतः भीड़भाड़ में रहना पसन्द करता है

b)

शरीर को स्थूल तथा बलवान बनाने की इच्छा करता है

c)

भगवत्कृपा से जितना कुछ प्राप्त हो उसी से संतुष्ट रहता है

d)

इन्द्रियतृप्ति न होने पर भी क्रुद्ध नहीं होता

e)

इन्द्रियविषयों को प्राप्त करने के लिए प्रयास करता है

10.

समस्त भौतिक वस्तुओं से विरक्त होकर प्राप्त हुई ब्रह्म की आत्म-साक्षात्कार अवस्था क्या कहलाती है? (18.51-53)

a)

ब्रह्मभूत

b)

जीवभूत

c)

भ्रमभूत

d)

लातों का भूत

e)

महाभूत

11.

भगवद्गीता 2.70 के वर्णन के अनुसार जब मनुष्य देहात्मबुद्धि से मुक्त हो जाता है, तो _____________ (18.51-53)

a)

वह एक बार शान्त हो जाता है पर उसे फिर से उत्तेजित किया जा सकता है

b)

वह शान्त हो जाता है और उसे उत्तेजित नहीं किया जा सकता

12.

जिस प्रकार नदियों के जल के निरन्तर प्रवेश करते रहने और सदा भरते रहने पर भी समुद्र शांत रहता है, कौन उसी तरह शान्ति प्राप्त कर सकता है? (18.51-53)

a)

जो मनुष्य इच्छाओं के अनवरत प्रवाह से विचलित नहीं होता

b)

जो मनुष्य इच्छाओं की तुष्टि के लिए निरन्तर उद्योग करता रहता है

13.

दिव्य पद पर स्थित व्यक्ति के क्या लक्षण होते हैं? (18.54)

a)

तुरन्त परब्रह्म का अनुभव करता है

b)

पूर्णतया प्रसन्न हो जाता है

c)

प्रत्येक जीव पर समभाव रखता है

d)

शुद्ध भक्ति को प्राप्त करता है

e)

सदा शोक करता है और कामना करता है

14.

निर्विशेषवादी के लिए ब्रह्मभूत अवस्था प्राप्त करना अर्थात् ______ (18.54)

a)

ब्रह्म से तदाकार होना

b)

शुद्ध भक्ति में प्रवृत्त होने का अवसर

15.

जो भगवद्भक्ति में रत है, _________ (18.54)

a)

वह पहले ही मुक्ति की अवस्था, जिसे ब्रह्मभूत या ब्रह्म से तादात्मय कहते हैं, प्राप्त कर चुका होता है

b)

उसे मुक्ति की अवस्था, जिसे ब्रह्मभूत या ब्रह्म से तादात्मय कहते हैं, प्राप्त करनी होती है

16.

परम जगत् में कोई दुख क्यों नहीं रह जाता? (18.54)

a)

क्योंकि व्यक्ति देहात्मबुद्धि के अन्तर्गत इन्द्रियतृप्ति के लिए कर्म करता है

b)

क्योंकि शुद्ध भक्ति में रत रहने वाले कृष्णभावनाभावित भक्त को न तो कोई आकांक्षा होती है न शोक

17.

शुद्ध भक्त के क्या लक्षण होते हैं? (18.54)

a)

वह ऐसी नदी के तुल्य है, जिसके जल की सारी गंदगी साफ कर दी गई है

b)

उसमें कृष्ण के अलावा कोई विचार नहीं उठते, अतः वह प्रसन्न रहता है

c)

इन्द्रियाँ विषदंतविहीन सर्प की भाँति होती हैं जिनसे कोई भय नहीं रहता

d)

क्षणभंगुर प्राकट्य तथा तिरोधान से कुछ लेना-देना नहीं रहता

e)

परब्रह्म से तादात्मय और अपने अस्तित्व का विलय उद्देश्य बन जाता है

18.

इनमें से क्या सही है? (18.54)

a)

ब्रह्माण्ड का महान से महानतम पुरुष भी भक्त के लिए एक क्षुद्र चीटीं से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं होता

b)

यह संसार उस व्यक्ति के लिए दुखमय है, जो भक्ति में रत है

c)

भौतिक व्यक्ति के लिए समस्त जगत् वैकुण्ठ-तुल्य है

19.

भगवान् को यथारूप में कैसे जाना जा सकता है? (18.55)

a)

कर्मेण

b)

ज्ञानेन

c)

योगेन

d)

तपेन

e)

भक्त्या

20.

भगवान् किसके द्वारा नहीं जाने जा सकते, जैसा कि भगवद्गीता (7.25) में कहा जा चुका है – नाहं प्रकाशः सर्वस्य– मैं सबों के समक्ष प्रकाशित नहीं होता? (18.55)

a)

मनोधर्म के द्वारा

b)

अभक्तगण के द्वारा

c)

शुद्ध भक्त के पथप्रदर्शन में शुद्ध भक्ति के द्वारा

d)

केवल पाण्डित्य के द्वारा

e)

विश्वविद्यालय की उपाधियों के द्वारा

21.

विशते - शब्द का क्या अर्थ है? (18.55)

a)

मुक्ति के बाद मनुष्य निर्गुण ब्रह्म से एकाकार हो जाता है और अपना स्वरूप खो बैठता है

b)

मनुष्य अपने व्यक्तित्व सहित भगवान् के धाम में, भगवान् की संगति करने तथा उनकी सेवा करने के लिए प्रवेश करता है

22.

इनमें से क्या सही है? (18.55)

a)

एक हरा पक्षी (शुक) हरे वृक्ष में इसलिए प्रवेश करता है कि वह वृक्ष से तदाकार (लीन) हो जाय

b)

साकारवादी अपने व्यक्तित्व को उसी प्रकार बनाये रखता है, जिस प्रकार समुद्र की गहराई में रहने वाले जलचर प्राणी

23.

भक्ति का शुभारम्भ कैसे होता है? (18.55)

a)

मुक्ति की अवस्था को प्राप्त कर लेने के बाद

b)

मुक्ति की अवस्था को प्राप्त करने से पहले

c)

भगवान् के विषय में श्रवण करने से

24.

मुक्ति के विषय में क्या सही है? (18.55)

a)

मुक्ति का अर्थ देहात्मबुद्धि से मुक्त होना है, मुक्ति के बाद भी जीव द्वारा भगवान् की स्वाभाविक सेवा नहीं रूकती

b)

वेदान्तसूत्र (4.1.12) – आप्रायणात् तत्रापि हि दृष्टम् – मुक्ति के बाद भक्तियोग चलता रहता है

c)

श्रीमद्भागवत (2.10.6) - मुक्ति जीव का अपनी निजी स्वाभाविक स्थिति में पुनःप्रतिष्ठापित होना है

25.

किन शब्दों से भगवान् ने अपने नित्य तथा अविनाशी धाम का वर्णन किया है? (18.56)

a)

सर्वकर्माण्यपि सदा

b)

कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः

c)

मत्प्रसादादवाप्‍नोति

d)

शाश्वतं पदमव्ययम्

26.

समस्त प्रकार के कार्यों में संलग्न रह कर भी एक शुद्ध भक्त भगवान् के नित्य तथा अविनाशी धाम को कैसे प्राप्त कर लेता है? (18.56)

a)

मद्-व्यपाश्रयः - परम भगवान् के संरक्षण में

b)

मत्प्रसादात् - परम भगवान् की कृपा से

c)

चौबीसों घंटे अपनी मेहनत से कार्यों में लगने से

27.

भगवान् किस भक्त पर अत्यंत दयालु होते हैं और जिसके लिए अन्ततोगत्वा दिव्यधाम या कृष्णलोक में प्रवेश सुनिश्चित रहता है? (18.56)

a)

जो भौतिक कल्मष से रहित होने के लिए परमेश्वर या उनके प्रतिनिधि स्वरूप गुरु के निर्देशन में कर्म नहीं करता

b)

जो भगवान् की सेवा समयसीमा के अनुसार ही करता है, एक निर्धारित सीमा के बाद नहीं

c)

जो सदा, चौबीसों घंटे, शत प्रतिशत भगवान् के निर्देशन में कृष्णभावनामृत कार्यों में संलग्न रहता है

28.

भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को किस प्रकार कर्म करने के लिए कहा है? (18.57)

a)

सारे कार्यों के लिए मुझ पर निर्भर रहो

b)

मेरे संरक्षण में सदा कर्म करो

c)

भक्ति में मेरे प्रति पूर्णतया सचेत रहो

d)

मनमाना कर्म करते रहो और फल भी स्वयं भोगो

29.

कृष्णभावनामृत में मनुष्य का कर्म कैसा होता है? (18.57)

a)

अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उपयोग करते हुए वह संसार के स्वामी के रूप में कर्म करता है

b)

वह निजी स्वतंत्रता त्यागकर सेवक की भाँति परमेश्वर के निर्देशानुसार कर्म करता है

c)

वह स्वामी के आदेश पर कार्य करने के कारण लाभ-हानि से अप्रभावित रहता है

30.

अर्जुन तो कृष्ण के व्यक्तिगत निर्देशानुसार कार्य कर रहे थे, लेकिन जब कृष्ण उपस्थित न हों तो कोई किस तरह कार्य करें कि उसका फल वैसा ही हो? (18.57)

a)

भगवद्गीता में दिए गये कृष्ण के निर्देश के अनुसार

b)

कृष्ण के प्रतिनिधि, गुरु-परम्परा द्वारा प्रमाणिक गुरु के मार्गदर्शन में

31.

मत्परः - के अनुसार मनुष्य जीवन का क्या लक्ष्य होता है? (18.57)

a)

कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए कृष्णभावनाभावित होकर कार्य करने के अतिरिक्त अन्य भी कुछ

b)

कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए कृष्णभावनाभावित होकर कार्य करने के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं

32.

किस प्रकार का कार्य पूर्ण कृष्णभावनामृत माना जाता है? (18.57)

a)

कृष्ण के आदेशानुसार कर्म करते हुए चिन्तन करना - “कृष्ण ने मुझे इस विशेष कार्य को पूरा करने के लिए नियुक्त किया है”

b)

मनमाना कर्म करके उसका फल कृष्ण को अर्पित करना

33.

किस प्रकार कृष्णभावनामय जीवन की सिद्धि सुनिश्चित है? (18.57)

a)

कृष्ण के आदेशानुसार ही कर्म करें जो गुरु-परम्परा द्वारा प्रमाणिक गुरु से प्राप्त होता है

b)

प्रमाणिक गुरु के आदेश को जीवन का मूल कर्तव्य समझना चाहिए

c)

यदि किसी को प्रमाणिक गुरु प्राप्त हो जाता है और वह निर्देशानुसार कार्य करता है

34.

पूर्ण कृष्णभावनाभावित में कर्म करने का क्या लाभ है? (18.58)

a)

अस्तित्व के लिए कर्तव्य करने के विषय में समस्त चिन्ताओं से मुक्त कैसे रहे, इस बात को वह नहीं समझता

b)

भगवान् कृष्ण घनिष्ट मित्र बन जाते हैं और वे सदैव अपने मित्र की सुविधा का ध्यान रखते हैं

c)

जो मित्र चौबीसों घंटे उन्हें प्रसन्न करने के लिए निष्ठापूर्वक कार्य में लगा रहता है, कृष्ण उसको आत्मदान कर देते हैं

35.

देहात्मबुद्धि के मिथ्या अहंकार में बहकर व्यक्ति झूठे ही क्या सोचता है? (18.58)

a)

वह प्रकृति के नियमों से स्वतन्त्र है

b)

वह कर्म करने के लिए मुक्त है

c)

वह कठोर भौतिक नियमों के अधीन है

36.

कृष्णभावनाभावित व्यक्ति क्या भौतिक नियमों के अधीन नहीं है, फिर ऐसे कर्मों से क्या लाभ? (18.58)

a)

वह तुरंत भौतिक दुश्चिन्ताओं से मुक्त हो जाता है क्योंकि वह कृष्ण की कृपा से बद्ध जीवन के सारे अवरोधों को लाँघ जाता है

b)

वह कर्म करने के लिए मुक्त है, क्योंकि प्रत्येक किया हुआ कर्म कृष्ण द्वारा अन्तर से प्रेरित तथा गुरु द्वारा पुष्ट होता है

c)

वह जन्म-मृत्यु रूपी सागर के भंवर में पड़कर अपना विनाश कर रहा है क्योंकि वह सही सही नहीं जानता कि क्या करना है और क्या नहीं

37.

क्या आप कृष्ण की मित्रता के प्रस्ताव को स्वीकार करना चाहेंगे? क्यों या क्यों नहीं?

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