Worksheetsचरक चिकित्सा 25 से 30
Total questions: 37
Worksheet time: 19mins
आचार्य चरक ने आढ्यवात शब्द प्रयुक्त किया है।
मेद से आवृत वात एवं उरूस्तंभ के लिए
वात रक्त एवं उरुस्तंभ के लिए
मेद से आवृत वात एवं वात रक्त के लिए
केवल उरूस्तंभ के लिए
आमवात का सर्वप्रथम वर्णन मिलता है।
माधव निदान
शारंगधर संहिता
भाव प्रकाश
चरक संहिता
निम्न में से रक्त प्रदर का कारण है।
प्राण आवृत अपान वायु
कफ आवृत अपान वायु
पित्त् आवृत्त अपान वायु
त्रिदोष आवृत अपान वायु
आधमान एवं शर्करा का होना आचार्य चरक अनुसार लक्षण है
बस्ती गत वात
गुद गत वात
अमाशय गत वात
पक्वाशय गत वात
अस्थि मज्जा गत वात के लक्षण में नहीं है।
नींद का ना आना नींद
लगातार पीड़ा का बना रहना
मांस एवं बल का क्षय होना
खल्ली रोग होना
आचार्य चरक अनुसार मन्या स्तंभ में होता है।
आभ्यंतरा आयाम
बहिरा आयाम
दंडाआयाम
अभ्यंतरा आयाम एवम पृष्ठ आयाम
आचार्य चरक अनुसार पाद, जंघा, उरु एवम कर के मूल में आवमोटन पीड़ा का होना है
गृधसी
खल्ली
आवबाहुक
तूनी
आचार्य चरक अनुसार मज्ज़ा आवृत वात के लक्षण में नहीं है।
विनाम
जृम्भा
पीड़नम च अभिनंदिति
पानीभ्याम च लभते सुखम
किसी व्यक्ति का हृदय अस्वस्थ बना रहता है तो इसका निदान हो सकता है।
वात द्वारा हृदय को आवृत करना
मल द्वारा वात को आवृत करना
वात के द्वारा मल को आवृत करना
पित्त के द्वारा हृदय को आवृत करना
आचार्य चरक अनुसार अर्दित की चिकित्सा में स्वेद का वर्णन है
प्रस्तर एवं संकर स्वेद
कूटी स्वेद
मुर्ध तैल
नाड़ी एवम उपनाह स्वेद
पक्षाघात रोग की चिकित्सा में सुश्रुत ने अनुवासन हेतु कौन सा तेल प्रयोग करने के लिए कहा है।
अणु तेल
बला तैल
ब्राह्मी तैल
एरंड तैल
शरीर की सभी प्रकार की शारीरिक चेष्टा का, बल तथा वर्ण का नाश होना एवं मृत्यु हो जाना लक्षण है।
प्राण आवृत व्यान वायु
ब्यान आवृत्त प्राणवायु
प्राण आवृत समान वायु
उदान आवृत प्राणवायु
आचार्य चरक अनुसार रासना घृत का रोगाधिकार है
वातव्याधि
वात रक्त
उरू स्तंभ
कास
अंशुमती के कल्क से पकाया हुआ दूध पीना हितकर होता है
न नाभि गत वात
अमाशय गत् वात
शुक्र स्थान गत् वात
ह्रदय गत वात
वाद के कारण यदि गर्भ शुष्क हो तो इसकी चिकित्सा आचार्य चरक अनुसार होगी।
आस्थापन तथा अनुवासन बस्ती का प्रयोग
सिता ,काश्मीरी तथा मुलेठी से सिद्ध दूध का प्रयोग
के जीवनीय एवं वृहणय घृत का प्रयोग
विविध प्रकार के मांस रस का प्रयोग
आचार्य सुश्रुत ने अरु स्तंभ की चिकित्सा में बताया है।
गुंजा भद्र रस का प्रयोग करें
स्नेह रहित षड धरण का प्रयोग करें
स्नेह युक्त षड धरण का प्रयोग करें
प्रारंभिक अवस्था में पंचकर्म का प्रयोग करें
किस रोग के पूर्व रूप में कुष्ठ के समान लक्षण मिलते हैं कहा गया है।
ब्यान आवृत्त प्राणवायु
उरूस्तंभ
वात रक्त
त्रि मर्म के रोग
आचार्य चरक ने त्रिदोष मूत्रकृच्छ की चिकित्सा में कहा है
गोक्षुरादि योग
त्रुटियादी चूर्ण
शिग्रु का प्रयोग
वात स्थान अनुपूर्व चिकित्सा
सात प्रकार के हृदय रोग का वर्णन मिलता है
भैषज्य रत्नावली
शारंगधर संहिता
चरक संहिता
आयुर्वेद विज्ञान
आचार्य चरक अनुसार वात ह्रदय रोग एवं विकर्तिका रोग का का नाश हो जाता है
गोमूत्र कांजी एवं पांचों नमक को तिल तेल में पकाकर पीने से
पुनर्नवादी तेल पीने से
शालपरणि से सिद्ध दूध पीने से
पुष्कर मूल आदि कल्क सेवन से
प्रतिश्याय रोग से सूर्यावर्त की उत्पत्ति किस आचार्य ने मानी है।
सुश्रुत
माधव निदान
कश्यप
शारंगधर
यदि किसी रोगी का भोजन के परिपाक काल में ह्रदय में शूल बढ़ जा रहा है तो उसे देना चाहिए
तैल से स्नेह विरेचन
मूलद्रव्य के प्रयोग से विरेचन
फल द्रव्य के प्रयोग से विरेचन
सुरदारु चूर्ण
यदि किसी रोगी की नासिका में अनाह हो तथा नासिका शुष्क हो जाती हो नासिका में कभी-कभी गीलापन हूं एवं नासिका से धुआं निकलता प्रतीत हो उसे किसी प्रकार का गंध एवं रस का ज्ञान ना हो तो यह रोग होगा।
अपीनस रोग
दुष्ट पीनस रोग
दीप्त रोग
नासा प्रतिनाह रोग
कालक चूर्ण का रोगाधिकार है
वात प्रतिश्याय
वात मूख रोग
पित्त प्रतिश्याय
पित्त मुख रोग
आचार्य सुश्रुत अनुसार नीलघृत का रोगाधिकार है
शिरो रोग
कुष्ठ रोग
वात रक्त
वात व्याधि
आचार्य सुश्रुत अनुसार बाहु कर्म क्षय कारी रोग है
विश्वाची
आवबाहुक
पक्षाघात
अर्दित
बोधि वृक्ष कषाय का प्रयोग किस रोग में कहा गया
वात रक्त
उरू स्तंभ
वात व्याधि
त्रिमर्म के रोग
सोम रोग का सर्वप्रथम वर्णन आया हैl
शारंगधर संहिता
बंग सेन संहिता
भाव प्रकाश
योगरत्नाकर
आचार्य वागभट्ट के अनुसार कण्डू उत्पत्ति किस योनिव्यापद में होती है।
अचरणा
विप्लूता
अति चरणा
कफज योनिव्यापद
षड या सप्त रात्रि में गर्भाशय में गए हुए शुक्र का स्त्राव करने वाली योनिव्यापद है।
पुत्रघ्नि
प्रस्त्रंसनी
वामिनी
परिप्लूता
किस योनिव्यापद में योनि का मुंह टेढ़ा हो जाता है
महायोनी व्यापद
अणु मुखी योनि व्यापद
अंतर्मुखी योनि व्यापद
उपप्लूता योनि व्यापद
मातृ दोष से होने वाली योनिव्यापद है।
सूची मुखी
अंतर्मुखी
पुत्रघ्नी
करणिनी
आचार्य चरक अनुसार नपुंसकता के भेद हैं।
4
5
6
8
पलाश के धोवन के जैसा रक्तस्राव होना लक्षण है
त्रिदोष रक्त प्रदर का
पित्त रक्त प्रदर का
वात रक्त प्रदर का
कफ रक्त प्रदर
आचार्य चरक अनुसार रुक्ष स्तनय दोष की चिकित्सा है
पंचकोल आदि लेप
पंच मूल आदि लेप
अंजनादि लेप
तकरारिष्ट का प्रयोग
आचार्य चरक अनुसार यदि किसी व्यक्ति में व्यान वायु की दुष्टि है तो औषध सेवन काल होगा।
प्रातः काल भोजन पश्चात
सायं काल भोजन पश्चात
सायं काल भोजन पश्चात ग्रास ग्रास अंतर में
बार-बार औषध सेवन कराना है।
कुमाराधार का सर्वप्रथम वर्णन किया है
वाग्भट
चरक
सुश्रुत
शार्ंगधार
