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WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-63 (17.26-28, 18.1-8)
Total questions: 22
Worksheet time: 2hrs 0mins
ॐ तत् सत् शब्दों का उच्चारण कहाँ-कहाँ किया जाता है? (17.26-27)
वैदिक संस्कारों के समय
दीक्षित करते व यज्ञोपवीत कराते समय
भगवान् के मन्दिर में भोजन पकाना
सभी प्रकार के यज्ञ करते समय
भगवान् के यश का प्रसार करने वाला कोई भी कार्य
प्रशस्ते कर्मणि - शब्द क्या सूचित करते हैं? (17.26-27)
वैदिक साहित्य में नियत कर्त्तव्य
गर्भाधान से लेकर मृत्यु तक के शुद्धिकरण संस्कार
अच्छे कर्म करने पर मिला प्रशस्ति पत्र (सर्टिफिकेट)
प्रशंसा के लिए किये गए कर्म
इनमें से क्या सही नहीं है? (17.26-27)
वैदिक संस्कार जीव की चरम मुक्ति के लिए होते हैं
कृष्णभावनामृत कार्यों में सचेष्ट रहने वाला साधु है
कृष्णभावनामृत में कर्म करना सत् है
भक्तसंग से आध्यात्मिक विषय भ्रष्ट हो जाता है
परम सत्य भक्तिमय यज्ञ का लक्ष्य है
श्रद्धा तथा समुचित मार्गदर्शन के बिना किये गए यज्ञ, दान व तप के विषय में क्या सही है? (17.28)
वह शाश्वत व अनश्वर है
वह सत् कहलाता है
इस जन्म तथा अगले जन्म – दोनों में व्यर्थ जाता है
इस प्रकार किये कार्य अत्यंत उत्कृष्ट हैं
सब प्रकार से सफल होने का यही मार्ग है
समस्त जीवों के चरम लक्ष्य, श्रद्धा की परिपक्व अवस्था, ईश्वरप्रेम प्राप्त करने की क्या विधि है? (17.28)
पहले देवताओं, भूतों, यक्षों की पूजा से आकृष्ट हो
शुद्धभक्तों के संग से सीधे कृष्णभावनामृत स्वीकारे
उपयुक्त गुरु प्राप्त करके उसके निर्देशन में प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए
अर्जुन ने भगवान् को किन नामों से सम्बोधित किया है? (18.1)
संन्यासी
महाबाहु
त्यागी
हृषीकेश
केशिनिषूदन
भगवान् के समस्त सन्देश का क्या लक्ष्य है? (18.1)
भगवान् की सेवा ही जीवन का चरम लक्ष्य है
ॐ तत् सत् - शब्द परम पुरुष विष्णु के सूचक हैं
सारे कार्यों को परमेश्वर से युक्त होना चाहिए
वास्तव में वेदान्त सूत्र भक्ति को समझने के लिए हैं
प्रत्येक शास्त्र, प्रत्येक वेद का लक्ष्य भक्ति है
भगवद्गीता के सभी अध्यायों में क्या सन्देश दिया गया है? (18.1)
प्रथम छह में भक्तियोग पर बल दिया गया – योगिनामपि सर्वेषाम्
मध्य छह में शुद्ध भक्ति, उसकी प्रकृति तथा कार्यों का विवेचन है
अन्त के छह में ज्ञान, वैराग्य, अपरा तथा परा और भक्ति का वर्णन है
द्वितीय अध्याय में सम्पूर्ण विषयवस्तु की प्रस्तावना (सार) का वर्णन है
अठारहवें अध्याय में सारे उपदेश का सारांश दिया गया है
अठारहवें अध्याय में किसे जीवन का लक्ष्य बताया गया है? (18.1)
त्याग (वैराग्य)
भोग - शरीर में रहते हुए अनियंत्रित उपभोग
त्रिगुणातीत दिव्य पथ की प्राप्ति
शरीर त्याग के बाद आध्यात्मिक आत्महत्या
अर्जुन भगवद्गीता के किन दो विषयों का स्पष्ट अन्तर जानने का इच्छुक है? (18.1)
त्याग तथा संन्यास
कर्म तथा ज्ञान
सुर तथा असुर
जीव तथा भगवान्
अर्जुन भगवान् कृष्ण को केशि-निषूदन कहकर क्यों सम्बोधित करता है? (18.1)
कृष्ण समस्त इन्द्रियों के स्वामी हैं, जो हमें मानसिक शान्ति प्राप्त करने में सहायक बनते हैं अतः अर्जुन प्रार्थना करता है कि वे सार बताएं, जिससे वह समभाव में स्थिर रहे
संशय असुरों के समान होते हैं, केशी अत्यन्त दुर्जेय असुर था, जिसका वध कृष्ण ने किया था अतः अब अर्जुन चाहता है कि वे उसके संशय रूपी असुर का वध करें
संन्यास किसे कहते हैं? (18.2)
भौतिक इच्छा पर आधारित कर्मों के परित्याग को
समस्त कर्मों के फल-त्याग को
कर्मफल की आकांक्षा से किये गये कर्म का त्याग
उच्च आध्यात्मिक ज्ञान प्रदाता कर्मों का परित्याग
हृदय की शुद्धि के लिए किये जाने वाले यज्ञों का परित्याग
कर्मों के त्याग के विषय में विभिन्न विद्वानों की क्या मान्यता है? (18.3)
समस्त प्रकार के सकाम कर्मों को दोषपूर्ण समझ कर त्याग देना चाहिए
यज्ञ, दान तथा तपस्या के कर्मों को कभी नहीं त्यागना चाहिए
विभिन्न मनीषियों के अनुसार यज्ञ में मारे गये पशु का क्या होता है? (18.3)
नवीन पशु-जीवन प्राप्त होता है
तत्क्षण मनुष्य योनि को प्राप्त हो जाता है
अधोगति को प्राप्त होता है
शास्त्रों के अनुसार तीन प्रकार के त्याग के विषय में अपना निर्णय देते हुए परम पुरुष भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कैसे सम्बोधित किया? (18.4)
भरतसत्तम
धनञ्जय
पुरुषव्याघ्र
कौन्तेय
यज्ञ, दान तथा तपस्या के कर्मों के विषय में भगवान् का क्या निर्णय है? (18.5)
उनका कभी परित्याग नहीं करना चाहिए
उन्हें अवश्य सम्पन्न करना चाहिए
ये महात्माओं को भी शुद्ध बनाते हैं
इनका तुरंत परित्याग कर देना चाहिए
इनमें से क्या सही नहीं है? (18.5)
कोई भी यज्ञ जो मानव कल्याण के लिए हो, उसका कभी भी परित्याग न करे, मानव समाज की उन्नति के लिए कर्म करे
विवाह-यज्ञ मानव मन को असंयमित करने के लिए है, जिससे आध्यात्मिक प्राप्ति के बजाय अशान्त बन सके
दान हृदय की शुद्धि (संस्कार) के लिए है, यदि सुपात्र को दिया जाता है, तो इससे आध्यात्मिक जीवन में प्रगति होती है
सभी कार्यों के विषय में भगवान् का क्या अंतिम मत है? (18.6)
आसक्ति या फल की आशा के बिना सम्पन्न करना चाहिए
कर्तव्य मानकर सम्पन्न किया जाना चाहिए
भौतिक उन्नति के लिए हैं यज्ञों का परित्याग करना चाहिए
भगवद्भक्ति करने में सहायक यज्ञ, तप, दान का परित्याग
इनमें से क्या सही नहीं है? (18.7)
निर्दिष्ट कर्तव्यों को कभी नहीं त्यागना चाहिए
भौतिक तुष्टि के कार्य को अवश्य ही त्याग दे
संन्यासी को अपने लिए भोजन नहीं बनाना चाहिए
संन्यासी कृष्ण के लिए भोजन नहीं बना सकता
मोहवश अपने नियत कर्मों का परित्याग तामसी है
कैसा त्याग राजसी होता है? (18.8)
नियत कर्मों को कष्टप्रद समझ कर या शारीरिक क्लेश के भय से त्याग
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति का सकाम कर्म के भय से अर्थोपार्जन बन्द करना
दिव्य कृष्णभावनामृत को अग्रसर करने के लिए प्रातःकालीन निद्रा का त्याग
राजसी त्याग का कैसा फल होता है? (18.8)
उच्च फल प्राप्त नहीं होता
सदैव दुखद फल होता है
राजसी ठाठ-बाठ और वैभवशाली
सब विषयों को जानकार अब आपका किस प्रकार कर्म करने का विचार है?
