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Worksheets43. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_9.27–9.31
Total questions: 47
Worksheet time: 1hrs 25mins
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श्लोक संख्या 9.27 के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण हम जीवों को क्या आदेश देते हैं ?
यह कि प्रत्येक व्यक्ति भगवान् श्रीकृष्ण लिए ही कर्म करे ।
यह कि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन निर्वाह के लिए स्वयँ उद्यम करे ।
यह कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी इच्छाओं के विरुद्ध कर्म करे ।
यह कि प्रत्येक व्यक्ति भौतिक जगत् की गतिविधियों में यथा सामर्थ्य सहयोग करे ।
श्लोक संख्या 9.27 के तात्पर्य में श्रील प्रभुपाद जी ने हम सभी को क्या परामर्श दिया है ?
यह कि हम सभी को अपने जीवन को इस प्रकार से ढालना चाहिए कि हम जीवन की किसी भी दशा में कृष्ण को न भूल सकें ।
यह कि हम सभी को अपना सब कुछ भगवान् श्रीकृष्ण को अर्पित करके ध्यान-साधना हेतु वन की ओर प्रस्थान कर जाना चाहिए ।
यह कि हम सभी को अपने नियत कर्मों सहित समस्त प्रकार के कर्मों को त्याग कर ध्यान समाधि में लीन हो जाना चाहिए ।
यह कि हम सभी को अपने-अपने जीवन निर्वाह के लिए धार्मिक अनुष्ठान करने चाहिए ।
हमें किस प्रकार का भोजन ग्रहण करना चाहिए ?
हमें केवल भगवान् श्रीकृष्ण को अर्पित भोजन के उच्छिष्ट को ग्रहण करना चाहिए ।
हमें केवल शुद्ध शाकाहारी भोजन ही ग्रहण करना चाहिए ।
हमें केवल शुद्ध सात्विक भोजन ही ग्रहण करना चाहिए ।
हमें केवल फल ही ग्रहण करने चाहिए ।
हमें अपने धन का उपयोग किस प्रकार करना चाहिए ?
हमें अपने अधिकांश धन का उपयोग कृष्णभावनामृत आंदोलन की प्रगति के लिए करना चाहिए ।
हमें अपने अधिकांश धन का प्रयोग अपने परिवारजनों की इंद्रियतृप्ति के लिए करना चाहिए ।
हमें अपने अधिकांश धन का उपयोग अपने बेहतर जीवन के निर्वाह हेतु धार्मिक अनुष्ठानों में करना चाहिए ।
हमें अपने अधिकांश धन का उपयोग अपने धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु करना चाहिए ।
श्रील प्रभुपाद जी के अनुसार महानतम् ध्यानी तथा योगी कौन है ?
वह व्यक्ति जो 24 घंटे हरे कृष्ण महामंत्र का जप अपनी माला में करता रहता है ।
वह व्यक्ति जो प्रतिक्षण भगवान् श्रीकृष्ण का चिंतन करता रहता है ।
वह व्यक्ति जो प्रतिक्षण अपनी चेतना को कृष्णभावनाभावित बनाए रखने में प्रयासरत रहता है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
कर्म के बंधन तथा इसके शुभाशुभ फलों से मुक्त होने का सूत्र क्या है ?
अपने समस्त कर्मों को भगवान् श्रीकृष्ण को अर्पित करना ।
अपने समस्त कर्मों को अपने परिवार जनों के प्रति समर्पित कर देना ।
अपने समस्त कर्मों को अपने समाज तथा राष्ट्र के प्रति समर्पित कर देना
अपने समस्त कर्मों को अपनी कुल देवी या देवता को समर्पित कर देना ।
युक्त किसे कहते हैं ?
गुरु के निर्देशन में कृष्णभावनाभावित कर्म करने को युक्त कहते हैं ।
मित्र के निर्देशन में कृष्णभावनाभावित कर्म करने को युक्त कहते हैं ।
उच्च अधिकारी के निर्देशन में कृष्णभावनाभावित कर्म करने को युक्त कहते हैं ।
माता-पिता के निर्देशन में जीवन यापन हेतु कर्म करने को युक्त कहते हैं ।
युक्त-वैराग्य किसे कहते हैं ?
कर्म करके उसके फल श्रीकृष्ण को अर्पित करना युक्त-वैराग्य कहलाता है ।
समस्त प्रकार के कर्मों का त्याग करके वन को प्रस्थान करना युक्त-वैराग्य कहलाता है ।
अपनी सारी संपत्ति किसी संस्था को दान के रुप में भेंट कर देना युक्त-वैराग्य कहलाता है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
किस प्रकार के कर्मों से हमारे चित्त रूपी दर्पण का मार्जन होता है ?
कृष्णभावनाभावित कर्मों से ।
इंद्रियतृप्ति हेतु कर्मों से ।
परोपकारी कर्मों से ।
नियत कर्मों से ।
निम्न में से वास्तविक सन्यास क्या है ?
केवल भगवान् श्रीकृष्ण की प्रसन्नता एवं सेवा के लिए ही कर्म करना ।
अपने नियत कर्मों का त्याग करके ध्यान-साधना हेतु वन को प्रस्थान कर जाना ।
अपनी समस्त धन-संपदा का किसी संस्था को दान में दे देना ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
श्लोक संख्या 9.28 में भगवान् श्रीकृष्ण ने क्या आश्वासन दिया है ?
यह कि जीवन भर समस्त कर्मों को भगवान् श्रीकृष्ण को अर्पित करने पर व्यक्ति अन्त में भगवद्धाम को प्राप्त होता है ।
यह कि जीवन भर इंद्रियतृप्ति हेतु कर्म करने के उपरांत अंत में व्यक्ति भगवद्धाम को प्राप्त होता है ।
यह कि जीवन भर परिवारजनों की प्रसन्नता के लिए कर्म करने के उपरांत अंत में व्यक्ति भगवद्धाम को प्राप्त होता है ।
यह कि जीवन भर निर्वाह हेतु संघर्ष रूपी कर्म करने के उपरांत अंत में व्यक्ति भगवद्धाम को प्राप्त होता है ।
निम्नलिखित शब्दों में से कौन सा शब्द श्लोक संख्या 9.28 में भगवद्धाम की प्राप्ति रूपी आश्वासन को दर्शाता है ?
मामुपैष्यसि
सन्यासयोग
विमुक्तो
मोक्ष्यसे
निम्नलिखित में से भगवद्धाम की प्राप्ति का वास्तविक सूत्र कौन सा है ?
गुरु का पदाश्रय ग्रहण करना - गुरु के निर्देशन में कृष्णभावनाभावित कर्म - चित्त रूपी दर्पण का मार्जन - आत्मसाक्षात्कार के मार्ग में क्रमशः प्रगति - भगवान् के प्रति क्रमशः पूर्ण समर्पण - मुक्ति - भगवद्धाम की प्राप्ति ।
गुरु का पदाश्रय ग्रहण करना - आत्मसाक्षात्कार के मार्ग में क्रमशः प्रगति - गुरु के निर्देशन में कृष्णभावनाभावित कर्म - चित्त रूपी दर्पण का मार्जन - भगवान् के प्रति क्रमशः पूर्ण समर्पण - मुक्ति - भगवद्धाम की प्राप्ति ।
गुरु का पदाश्रय ग्रहण करना - गुरु के निर्देशन में कृष्णभावनाभावित कर्म - चित्त रूपी दर्पण का मार्जन - आत्मसाक्षात्कार के मार्ग में क्रमशः प्रगति - भगवान् के प्रति क्रमशः पूर्ण समर्पण - ब्रह्मज्योति में विलीन - भगवद्धाम की प्राप्ति ।
यह सभी सूत्र मिथ्या हैं ।
निम्न में से कौन सा वास्तविक सन्यासी है ?
वह व्यक्ति जिसकी भगवत्सेवा में रत रहने के अतिरिक्त कोई अन्य रूचि नहीं होती है वह वास्तविक सन्यासी कहलाता है ।
वह व्यक्ति जो अपना संपूर्ण जीवन अपने परिवारजनों की प्रसन्नता के लिए समर्पित कर देता है वह वास्तविक सन्यासी कहलाता है ।
वह व्यक्ति जो अपना संपूर्ण जीवन समाज एवं राष्ट्र की सेवा में समर्पित कर देता है वह वास्तविक सन्यासी कहलाता है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
वास्तविक सन्यासी के क्या लक्षण होते हैं ?
वह भगवान् की परम इच्छा पर आश्रित रहते हुए स्वयँ को भगवान् का नित्य दास मानता है ।
वह जो भी कर्म करता है वह भगवान् की सेवा एवं प्रसन्नता के लिए करता है ।
सकाम कर्मों तथा वेदवर्णित कर्मों में उसकी कोई रुचि नहीं होती है ।
यह सभी वास्तविक सन्यासी के लक्षण हैं ।
सामान्य मनुष्यों के लिए वेद वर्णित कर्तव्यों को संपन्न करना क्यों अनिवार्य होता है ?
क्योंकि वेद सम्मत जीवन ही सर्वोच्च पूर्णता की ओर मार्ग प्रशस्त करता है ।
क्योंकि वेद सम्मत कर्म करने पर ही व्यक्ति के भीतर "अथातो ब्रह्म जिज्ञासा" उत्पन्न होती है ।
क्योंकि वेद सम्मत जीवन आध्यात्मिक जीवन के प्रारंभ का प्रथम पड़ाव है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
निम्न में से किसका भगवद्धाम जाना ध्रुव है ?
जो व्यक्ति भगवान् की सेवा में रत रहता है या निरंतर भगवान् की सेवा के लिए योजनाएँ बनाता रहता है ।
जो व्यक्ति निरंतर वैष्णवों में दोष दृष्टि या उनकी निंदा करता रहता है ।
जो व्यक्ति अपना सारा समय वैष्णवों द्वारा की जाने वाली भगवान् की सेवा में विघ्न उत्पन्न करने में व्यतीत करता है ।
जो व्यक्ति भगवान् की सेवा हेतु अपनी नवीन गुरु परंपरा स्थापित करता है ।
श्लोक संख्या 9.28 में किसकी महिमा का वर्णन हुआ है ?
भक्तिमयी सेवा की महिमा का ।
गुरु की महिमा का ।
कर्म बंधन की महिमा का ।
योग की महिमा का ।
श्लोक संख्या 9.29 में निम्न में से किसका वर्णन हुआ है ?
भगवान् की दिव्य प्रकृति का ।
भक्तों के साथ भगवान् के दिव्य संबंध का ।
भक्तिपूर्वक सेवा की महिमा का ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
जब भगवान् सब जीवों के प्रति समभाव हैं तो फिर अपने भक्तों में विशेष रूचि क्यों लेते हैं ?
क्योंकि भक्त सदैव भगवान् की भक्तिमयी दिव्य सेवा में संलग्न रहते हैं ।
क्योंकि अन्य सभी जीव भगवान् को केवल मात्र एक कल्पवृक्ष की भांति सभी इच्छाओं की पूर्ति करने वाला मानते हैं ।
क्योंकि हम सभी जीव भगवान् से केवल लेना चाहते हैं, भगवान् को देना कुछ नहीं चाहते ।
क्योंकि हम सभी जीव स्वतंत्रता चाहते हैं भगवान् की दिव्य दासता नहीं चाहते हैं ।
श्रील प्रभुपाद जी ने भगवान् और भक्त के दिव्य संबंध को किस प्रकार वर्णित किया है ?
अत्यंत परोपकारी व्यक्ति की अपनी संतानों में विशेष रूचि के उदाहरण के माध्यम से ।
बादल और वृष्टि के उदाहरण के माध्यम से ।
स्वर्ण और हीरे उदाहरण के माध्यम से ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
बादल और वृष्टि के उदाहरण के माध्यम से श्रील प्रभुपाद जी ने श्लोक संख्या 9.29 की किस विषय वस्तु को स्पष्ट किया है ?
भगवान् की समस्त योनियों में उपस्थित हम सभी जीवों के प्रति समभाव रूपी कृपा ।
भगवान् के द्वारा हम सभी जीवों की आवश्यकताओं की पूर्ति ।
भगवान् का कल्पवृक्ष के रूप में हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु किया जाने वाला कर्म ।
भगवान् और भक्त के मध्य दिव्य आदान-प्रदान ।
जीव चाहे आध्यात्मिक जगत् में हो या भौतिक जगत् में प्रत्येक परिस्थिति में आध्यात्मिक होता है । यदि भक्त सजीव आध्यात्मवादी है तो निर्जीव आध्यात्मवादी कौन है ?
वह जीव जो सदैव भौतिक इंद्रियतृप्ति में निमग्न रहता है ।
वह जीव जो सदैव परोपकारी तथा जन-कल्याणकारी कार्यों में व्यस्त रहता है ।
वह जीव जो सदैव परिवार सेवा समाज सेवा राष्ट्र सेवा इत्यादि कार्य में व्यस्त रहता है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
'मयि ते' शब्द का श्लोक संख्या 9.29 में क्या तात्पर्य है ?
इस शब्द के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण अपने भक्तों के साथ अपने दिव्य संबंध को वर्णित करते हैं ।
इस शब्द के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण अपने दिव्य साम्राज्य को प्रकट करते हैं ।
इस शब्द के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण अपनी स्वायत्तता को प्रकट करते हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
श्रील प्रभुपाद जी के अनुसार निम्न में से किस श्लोक में श्लोक संख्या 4.11 का वर्णन भी हुआ है ?
9.28
9.26
9.29
9.31
हीरा जड़ित सोने की अंगूठी वाले उदाहरण के द्वारा श्रील प्रभुपाद जी हमें क्या समझाते हैं ?
यह कि भगवान् तथा भक्त के मध्य आदान-प्रदान का दिव्य भाव होता है ।
यह कि भगवान् की संगति प्राप्त होते ही जीव शुद्ध हो जाता है ।
यह कि हीरे की संगति से ही सोने की शोभा बढ़ती है ।
यह कि सोना तथा हीरा एक दूसरे के बिना अपूर्ण हैं ।
भगवान् परम शुद्ध तथा शुद्धता के स्रोत हैं । अतः यह स्पष्ट करें कि हम जीवों के लिए शुद्धिकरण का मार्ग क्या है ?
भगवान् की भक्ति ।
भगवान् के शुद्ध भक्तों की दिव्य सेवा ।
भगवान् तथा भगवान् के शुद्ध भक्तों की संगति ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
क्या भगवान् का आदान-प्रदान का भाव कर्म के नियम के अंतर्गत आता है ?
नहीं, क्योंकि यह दिव्य कर्म होता है ।
हाँ, यदि यह भौतिक जगत् में संपन्न होता है तो कर्म के नियम के अंतर्गत आता है ।
नहीं, क्योंकि भौतिक जगत् में आदान-प्रदान के इस भाव का कोई अस्तित्व नहीं होता है ।
हाँ, भगवान् तथा भक्तों के सारे कर्म कर्म नियम के अंतर्गत आते हैं ।
क्या भगवद्भक्ति भौतिक जगत् का कार्य है ?
नहीं, यह आध्यात्मिक जगत् का अंश है ।
हाँ, भक्ति केवल मात्र भौतिक जगत् में ही संभव है ।
नहीं, भक्ति केवल मात्र सेवा है यह न तो आध्यात्मिक जगत् का अंश है और न ही भौतिक जगत् ।
हाँ, भक्ति केवल भौतिक जगत् में ही सुलभ है ।
निम्न में से बद्ध कर्म कौन से हैं ?
शरीर के भरण-पोषण के लिए किए जाने वाले कर्म ।
शरीर की रक्षा के लिए किए जाने वाले कर्म ।
समाज तथा राज्य के नियमों का पालन करने के लिए किए जाने वाले कर्म ।
यह सभी बद्ध कर्म हैं ।
स्वाभाविक कर्म किसे कहते हैं ?
कृष्णभावनाभावित कर्म ।
स्वाभाविक स्थिति की भिज्ञता में किए जाने वाले कर्म ।
सब भक्तों की सेवा में किए जाने वाले कर्म ।
कृष्णभावनामृत के प्रचार-प्रसार के लिए किए जाने वाले कर्म ।
यह सभी कर्म स्वभाविक कर्म कहलाते हैं ।
हम सभी बद्धावस्था में भक्ति कर रहे हैं । हमें भक्ति के अनुकूल परिस्थिति बनाए रखने के लिए कब सतर्क रहना होगा ?
जब भक्ति तथा शरीर की बद्ध सेवा के लिए कर्म एक दूसरे के विपरीत होने लगें ।
जब भक्ति तथा शरीर की बद्ध सेवा के लिए कर्म नियंत्रित हों ।
जब भक्त के जीवन निर्वाह हेतु कर्मों में मनोरंजन की कमी होने लगे ।
जब भक्त के जीवन में परोपकारी तथा जन-कल्याणकारी जैसे पुण्य कर्मों में कमी होने लगे ।
क्या श्लोक संख्या 9.30 हम जीवों को जघन्य से जघन्य ने कर्म करने की अनुमति देता है ?
नहीं, अपितु इस श्लोक के माध्यम से भगवान् श्रीकृष्ण भक्त की प्रबल इच्छा, भौतिक संबंधों की प्रबलता, देववशात् आदि के कारण आकस्मिक पतन को अस्वीकार करते हैं ।
हाँ, भक्ति की आड़ में हम सभी जीव अति निंदनीय कार्य भी कर सकते हैं ।
नहीं, पूर्ण अनुमति नहीं अपितु आंशिक अनुमति प्रदान करता है ।
हाँ, क्योंकि ऐसे कर्मों के बिना अर्थात् इंद्रियतृप्ति की चरम सीमा के बिना भक्ति की प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो सकती है ।
कभी-कभी कृष्णभावनामृत में रत व्यक्ति भी सामाजिक तथा राजनीतिक दृष्टि से निंदनीय कार्य कर बैठता है । ऐसे व्यवहार का कारण भगवद्गीता के किस श्लोक में स्पष्ट किया गया है ?
2.36
3.36
5.36
7.36
भक्तों द्वारा किए गए निंदनीय कर्म के कारण उसके आकस्मिक पतन को क्षणिक क्यों माना गया है ?
क्योंकि भक्ति की शक्ति तथा उसके हृदय में स्थित भगवान् उसे शुद्ध कर देते हैं ।
क्योंकि कृष्णभावनामृत इतना शक्तिशाली होता है कि इस प्रकार का आकस्मिक पतन तुरन्त रुक जाता है ।
क्योंकि भक्तियोग हर परिस्थिति में सफल होता है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
किसी भक्त के आदर्श पद से अकस्मात् च्युत होने पर उसका उपहास क्यों नहीं करना चाहिए ?
क्योंकि ऐसा पतन क्षणिक होता है जो कुछ समय पश्चात् कृष्णभावनामृत के कारण रुक जाता है । वास्तव में ऐसा उपहास वैष्णव अपराध होता है ।
क्योंकि हम सभी जीव अपने जीवन के दौरान ऐसे कई घृणित कर्म अपनी दिनचर्या में करते रहते हैं । अतः उपहास करना उचित नहीं है ।
क्योंकि हम सभी जीव पतितावस्था में हैं । अतः हमें एक दूसरे का उपहास नहीं करना चाहिए ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
श्लोक संख्या 9.30 में 'मंतव्यः' शब्द क्यों अधिक बलशाली है ?
क्योंकि यह शब्द श्लोक संख्या 9.30 में भक्त का उसके पतन के कारण उपहास न करने रूपी भगवान् के आदेश की अवज्ञा को प्रस्तुत करता है ।
क्योंकि यह शब्द भक्त के जघन्य कर्म करने की मानसिकता को प्रदर्शित करता है ।
क्योंकि यह शब्द हम सभी जीवों की भौतिक जीवन के प्रति मानसिकता को प्रदर्शित करता है ।
क्योंकि यह शब्द कृष्णभावनामृत के प्रयोजन को स्थापित करता है ।
नृसिंह पुराण में भगवद्भक्ति में तत्पर व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले आकस्मिक घृणित कार्य की तुलना किससे की गई है ?
चाँद में खरगोश के धब्बे से ।
आकाश में बादलों से ।
खरगोश में धब्बों से ।
सूर्य में ग्रहण से ।
भक्ति किसके विरुद्ध युद्ध की घोषणा है ?
माया ।
जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि के चक्र ।
भौतिक जीवन के ।
शाश्वत अस्तित्व के ।
निम्न में से भक्ति किस पर निर्भर करती है ?
कृष्णभावनामृत की अनुभूति की प्रगति पर ।
भक्त की मुक्ति प्राप्त करने की लालसा पर ।
भक्त की आध्यात्मिक तथा भौतिक सुख को एक साथ भोगने की प्रवृत्ति ।
भक्त की भगवद्धाम प्राप्त करने की लालसा पर ।
श्लोक संख्या 9.31 में भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से क्या वचन दिया है ?
यह कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता है ।
यह कि मैं अपने भक्तों की सभी आवश्यकताएँ पूरी करूंगा ।
यह कि मैं अपने भक्तों को उसके भोगों की आपूर्ति के लिए उसे स्वर्ग लोक में अवसर प्रदान करूँगा ।
यह कि मैं अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं को पूर्ण करूँगा ।
भगवान् श्रीकृष्ण ने श्लोक संख्या 9.31 में वचन को स्वयँ न देकर अपने प्रिय भक्त अर्जुन से क्यों दिलवाया ?
क्योंकि भगवान् अपने भक्तों के द्वारा दिए गए प्रत्येक वचन को पूर्ण करते हैं ।
क्योंकि भगवान् को अपने द्वारा दिए गए वचनों को परिस्थिति अनुसार, भक्तों की रक्षा हेतु तथा भक्तों की प्रसन्नता हेतु तोड़ना पड़ता है ।
भगवान् केवल भक्तों के वश में होते हैं अन्य कोई भी वस्तु उन्हें बंधन उत्पन्न नहीं कर सकती है ।
यह सभी तर्क सत्य हैं ।
निम्न में से कौन भक्तों को आकस्मिक पतन से बचाता है ?
हरे कृष्ण महामंत्र का अनवरत जप ।
स्वयँभू गुरु द्वारा दिया गया बीज मंत्र अथवा गुरु मंत्र ।
अपने धर्म में घोर आस्था अथवा कट्टरता ।
धार्मिक अनुष्ठानों का विधिपूर्वक क्रियान्वयन ।
