WorksheetsCharak chikitsha प्रमेह से अपस्मार
Total questions: 33
Worksheet time: 17mins
कृतास्पद रोग है।
प्रमेह
राज्यक्ष्मा
कुष्ठ
अपस्मार
प्रमेह का पूर्वरूप नहीं है।
घन अंगता
निद्रा तंद्रा सर्व काला
भोजनेसु आयस
शीत प्रियता
किस कुष्ठ हेतु प्रायः उरसी एवम यद रजो घृष्टम विमुचती कथन आया है।
किटीभ
पामा
सिध्म
दद्रु
किस राज यक्ष्मा के एकादश रूप में रक्तवमन लक्षण है।
साहस जन्य
वेग संधारण जन्य
क्षय जन्य
विषमाशन जन्य
सान्निपातिक मद के लक्षण मिलते हैं।
A,अपस्मार से किंतु विभत्स चेष्टा बिना
Bउन्माद से
Cमदात्यय से
A,B,c तीनों
भ्रुव्युदास लक्षण संबंधित है ।
A वातज नानात्मज विकार
B अपस्मार
C उन्माद
A and B
तैल लशून का प्रयोग है।
अपस्मार
अतत्वाभीनिवेश
उन्माद
गुल्म
चरक ने महाव्याधी कहा है।
अपस्मार
हलिमक
राज यक्ष्मा
कुष्ठ
पलंकष आदि तैल का रोगाधिकार है।
उन्माद
अपस्मार
प्रमेह
कुष्ठ
आचार्य सुश्रुत ने फल घृत का निर्देश किया है।
योनि व्यापद
गुल्म
उन्माद
अपस्मार
विषमाम कुरूते बुद्धि नित्यानित्ये हिता अहिते।। यह लक्षण सबंधित है।
बुद्धि भ्रश
अतत्वभिनिवेश
अपस्मार
मद की अंतिम अवस्था
विप्लूताक्ष पाया जाता है।
A व्यपेता हिक्का
B छिन्न श्वास
C यक्ष उन्मत्त
A and B and c all
कुष्ठ की चिकित्सा में संशोधन हेतु विरेचन का प्रयोग कितने दिनों में करने का निर्देश आचार्य सुश्रुत ने दिया है।
प्रति दिन
प्रति 15 दिन
प्रति 30दिन
प्रति 6 माह पर
चाष पक्षी के वर्ण वाला तथा अम्ल रस युक्त मूत्र त्याग करना किस प्रमेह से संबंधित है।
अम्ल मेह
नील मेह
काल मेह
मधु मेह
सप्त धातवा संबंधित है।
कुष्ठ
विसर्प
विद्रधि
कृमि
अंगुली विकलता किस धातु में कुष्ठ के स्थित होने का लक्षण है।
मेद
मांस
अस्थि मज्जा
शुक्र
आचार्य सुश्रुत ने हरिद्रा मेह में किसका क्वाथ प्रयोग करने कहा है।
हरिद्रा एवम दरुहरिद्रा का
त्रिफला का
अमलतास का
गुडुची का
शालाशार आदि गण का
आचार्य काश्यप ने महाअभयारिष्ट का निर्देश किया है।
अर्श
अपस्मार
कुष्ठ
राजयक्ष्मा
स्वप्ने कलुष भोजन किसके पूर्व रूप में है।
राज यक्ष्मा
कुष्ठ
उन्माद
अपस्मार
आचार्य सुश्रुत ने एकादश शत वर्ष उत्तर घृत को कहा है।
पुराण
प्रपुराण
कुंभ
महा
आकाश में दिन में तारे ,नक्षत्र दिखना किस रोग का लक्षण है।
वात उन्माद
पित्त उन्माद
पित्त कास
पित्त अपस्मार
आपके पास एक कुष्ठ का रोगी नसाभंग एवम स्वरभंग की स्थिति में आता है तो उसके लिए चिकित्सा निर्देश होगा।
भग्न चिकित्सा कुष्ठ चिकित्सा के साथ
लाक्षादी गुगुल कल्प
असाध्य मानकर चिकित्सा
अस्थि श्रृंखला के योग
आचार्य सुश्रुत ने विचर्चीका कुष्ठ में दोष की स्थिति मानी है।
वात
पित्त
वात पित्त
पित्त कफ
आचार्य सुश्रुत ने विचर्चीका कुष्ठ में दोष की स्थिति मानी है।
वात
पित्त
वात पित्त
पित्त कफ
A वारुणी मद्य का प्रतिदिन सेवन से राज यक्ष्मा नहीं होता।
B मद्य तीक्ष्ण , उष्ण, विशद, सूक्ष्म गुण से युक्त होने से स्रोतो मुख को खोलकर धातु पुष्ट करते है।
A एवम b सत्य है किंतु कथन b कथन a का कारण नहीं है।
A सत्य किंतु b असत्य है।
A असत्य किंतु b सत्य है
A एवम b सत्य है तथा कथन b कथन a का कारण भी है।
आचार्य चरक अनुसार भूतोन्मांद का आक्रमण समय है।
अनियत
प्रायः अमावस्या
प्रायः पूर्णिमा
त्रयोदशी
सितोपलादी चूर्ण में द्रव्यों के प्रमाण का क्रम हेतु निर्देश है।
अंत से ऊर्ध्व एक एक भाग अधिक
अंत से ऊर्ध्व दो दो गुना अधिक
उत्तरोत्तर एक एक भाग अधिक
उत्तरोतर दो गुना अधिक
आचार्य चरक अनुसार स्वर भेद के 6 भेद में से नहीं है।
क्षयज स्वर भेद
रक्तज स्वरभद
कास जन्य स्वर भेद
पीनस जन्य स्वर भेद
न वायस लौह का वर्णन कश्यप ने किया है।
पाण्डु
प्रमेह
शोथ
गुल्म
यव प्रयोग से कौन से रोग नहीं होते।
प्रमेह, कुष्ठ ,राजयक्ष्मा
प्रमेह कफज कुष्ठ एवम अतिसार
प्रमेह ,कुष्ठ,कफज ,मूत्रकृच्छ
प्रमेह,कुष्ठ, अर्श
फल त्रिकादी क्वाथ का सेवन करना चाहिए।
उष्ण जल से
मधु से
नीबू डालकर
घृत से
आचार्य चरक ने प्रमेह पीडिका की संख्या मानी है।
7
9
10
8
वेग संधारण को अग्र कहा है।
प्राण रोधिनाम
अनारोग्यकराणाम
शोषकराणाम
निंदितव्याधिकराणाम
