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WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-37 (9.24-33)
Total questions: 30
Worksheet time: 3hrs 36mins
भगवान् कृष्ण ऐसा क्यों कहते हैं कि मैं समस्त यज्ञों का भोक्ता हूँ? (9.24)
क्योंकि वे ही परम प्रभु व स्वामी हैं (प्रभुरेव च)
क्योंकि वे सारे यज्ञों के फल स्वयं भोगना चाहते हैं
क्योंकि वे सबको अपना सेवक बना कर रखना चाहते हैं
जो कृष्ण के वास्तविक दिव्य स्वभाव को नहीं पहचान पाते कि वे ही एकमात्र भोक्ता तथा स्वामी हैं, इस अल्पग्यता के कारण उनका क्या होता है? (9.24)
वे क्षणिक लाभ के लिए देवताओं को पूजते हैं
वे इस संसार में आ गिरते हैं
उन्हें जीवन का लक्ष्य प्राप्त नहीं हो पाता
स्वयं भोक्ता व स्वामी बनकर आनंद में रहते हैं
मानवीय सभ्यता का समग्ररूप वर्णाश्रम धर्म और वेदों में वर्णित यज्ञ-अनुष्ठानों का क्या उद्देश्य है? (9.24)
सुख-संपत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का
भगवान् विष्णु की प्रसन्नता
यदि किसी को अपनी भौतिक इच्छा पूर्ति करनी हो तो कैसे वांछित फल प्राप्त हो सकेगा? (9.24)
विशिष्ट देवताओं की पूजा करे
तंत्र-मंत्र विद्या का सहारा ले
परम भगवान् श्रीकृष्ण से प्रार्थना करे
केवल स्वयं के पुरुषार्थ पर भरोसा करे
इनमें से क्या सही नहीं है? (9.25)
जो देवताओं को पूजते हैं, वे भगवान् के धाम में जन्म लेंगे
जो पितरों को पूजते हैं, वे भगवान् के पास जाते हैं
जो भूत-प्रेतों के उपासक हैं, वे उन्हीं के बीच जन्म लेते हैं
जो भगवान् को पूजते हैं वे देवताओं के साथ निवास करते हैं
कृष्णभावनामृत आन्दोलन किस दिव्य सूचना को समूचे मानव समाज में वितरित करता है? (9.25)
केवल हरे कृष्ण मन्त्र के जाप से ही मनुष्य सिद्ध हो सकता है
हरे कृष्ण मन्त्र से ही मनुष्य भगवद्धाम वापस जा सकता है
वेदों के कर्मकाण्ड (दर्शपौर्णमासी) में वर्णित देवपूजा विधान
नितांत भौतिक, पिशाच पूजा के काले जादू का अभ्यास
निर्विशेष ब्रह्मज्योति तक जाने व नीचे गिरने की विधि
प्रेम तथा भक्ति के साथ प्रदान करने पर भगवान् ने क्या-क्या स्वीकार करना स्वीकार किया है? (9.26)
मांस, मछली या अण्डे
पत्र, पुष्प, जल तथा फल
शाक, अन्न, फल, दूध तथा जल
कृष्ण तो आत्मतुष्ट हैं, उन्हें किसी से भी कुछ नहीं चाहिए, फिर भी वे किससे व कैसी भेंट स्वीकार करते हैं? (9.26)
विद्वान, ब्राह्मण, धनी या महान विचारक होने से
एक अभक्त से ऐसी वस्तु, जिसकी उन्हें इच्छा न हो, या उन्होंने न माँगी हो
कृष्ण को केवल प्रेमाभक्ति चाहिए और कुछ भी नहीं
मनुष्यों के लिए क्या उचित भोजन है जिसके लिए भगवान् कृष्ण ने भी आदेश दिया है? (9.26)
मांस, मछली या अण्डे
बासी दुर्गन्धयुक्त मांसाहारी भोजन
शाक, अन्न, फल, दूध तथा जल
अच्छा सरल शाकाहारी भोजन बनाकर उसे भगवान् कृष्ण के चित्र या अर्चाविग्रह के समक्ष अर्पित करके तथा नतमस्तक होकर इस तुच्छ भेंट को स्वीकार करने की प्रार्थना करने से मनुष्य को क्या लाभ होता है? (9.26)
जीवन में निरन्तर प्रगति करता है
शरीर शुद्ध होता है
मस्तिष्क के श्रेष्ठ तन्तु उत्पन्न होते हैं
शुद्ध चिन्तन हो पाता है
जो लोग अपने भोजन को भगवान् कृष्ण को अर्पित नहीं करते, उसका क्या परिणाम होता है? (9.26)
वे असीमित पुण्य लाभ करते हैं और भगवद्धाम जाते हैं
उनका प्रत्येक कौर इस संसार की जटिलताओं में उन्हें बाँधने वाला है
भक्त बिना तर्क के यह कैसे समझता है कि परब्रह्म भोजन कर सकते हैं और उसका स्वाद ले सकते हैं? (9.26)
कृष्ण की इन्द्रियाँ परस्पर परिवर्तनशील हैं, एक इन्द्रिय दूसरी इन्द्रिय का कार्य कर सकती है
वे प्रकृति पर दृष्टिपात करके प्रकृति के गर्भ मे जीवों को स्थापित करते हैं
भोजन अर्पित करते हुए भक्तों के प्रेमपूर्ण शब्द सुनना कृष्ण के द्वारा भोजन करने तथा उसके स्वाद लेने के ही समरूप है
भगवान् ने क्या-क्या उन्हें अर्पित करते हुए करने के लिए कहा है? (9.27)
यत्करोषि - जो कुछ करते हो
यदश्नासि - जो कुछ खाते हो
यज्जुहोषि - जो कुछ अर्पित करते हो
ददासि यत् - जो दान देते हो
यत्तपस्यसि - जो भी तपस्या करते हो
सब कुछ भगवान् को अर्पित करते हुए करने का क्या लाभ है? (9.28)
कर्म के बन्धन से बंधना होगा
शुभाशुभ फलों के जाल में फंस जाएंगे
चित्त अस्थिर हो जाएगा
भगवद्धाम में भगवान् के पास जा सकेंगे
वास्तविक संन्यासी के क्या लक्षण हैं? (9.28)
जिसमें भगवत्सेवा के अतिरिक्त अन्य कोई रूचि नहीं होती
जिसके पास करने के लिए कोई काम नहीं होता
वह सकामकर्मों या वेदवर्णित कर्तव्यों पर ध्यान नहीं देता
वह जो कुछ करता है, भगवान् के लाभ के लिए करता है
वर्तमान में पूर्णतया मुक्त शुद्ध भक्त को कैसे पहचानना चाहिए? (9.28)
जिसने सब कर्म करना बन्द कर दिया है
जो निरन्तर भगवान् की सेवा के लिए योजना बनाता रहता है
शुद्धभक्त की योजनाओं, कार्यों को कोई नहीं समझ सकता
जो व्यक्ति भगवान् की सेवा में रत है
यदि कर्म करके उसके फल कृष्ण को अर्पित कर दिये जायँ तो वह _____ वैराग्य कहलाता है | (9.28)
नकली
आंशिक
फल्गु
युक्त
मुक्ति की कितनी विभिन्न अवस्थाएँ हैं? (9.28)
3
4
5
6
भगवान् किस प्रकार सबके लिए समभाव हैं? (9.29)
भगवान् का कहना है कि प्रत्येक जीव, चाहे वह जिस योनी का हो, उनका पुत्र है, अतः वे हर एक को जीवन की आवश्यक वस्तुएँ प्रदान करते हैं
वे उस बादल के सदृश हैं जो सबों के ऊपर जलवृष्टि करता है, चाहे यह वृष्टि चट्टान पर हो या स्थल पर, या जल में हो
जब हीरे को सोने की अँगूठी में जड़ दिया जाता है तो वह अत्यन्त सुन्दर लगता है - इसमें हीरे की उपमा किसके लिए दी गयी है? (9.29)
जीव
भगवान्
इनमें से क्या सही नहीं है? (9.29)
भगवान् अपने भक्तों का विशेष ध्यान रखते हैं
शुद्ध अवस्था में जीव भक्त कहलाते हैं
परमेश्वर अपने भक्तों के भी भक्त बन जाते हैं
भगवान् का भक्तों से आदान-प्रदान कर्म के नियम के अन्तर्गत है
यदि कृष्णभावनामृत में रत व्यक्ति सामाजिक या राजनीतिक दृष्टि से निन्दनीय कार्य कर बैठता है तो ऐसे आकस्मिक पतन के लिए उसके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए? (9.30)
वह कुछ भी कर ले पर भगवान् भी उसे शुद्ध नहीं कर सकते और उसे निन्दनीय कार्य के लिए क्षमा नहीं करते
पतन होने के बाद यदि वह अनन्य भाव से हरे कृष्ण का जप भी कर ले, तो भी कोई लाभ नहीं, उसे जूते मारने चाहियें
आकस्मिक पतन के कारण भक्त का उपहास नहीं किया जाना चाहिए, उसे तब भी साधु ही मानना चाहिए
क्या दिव्य भक्ति करने वाला भक्त सभी प्रकार के निन्दनीय कर्म कर सकता है? (9.30)
हाँ बिलकुल, भगवान् ने स्वयं ही बोला है कि उसे साधू ही मानना चाहिए, चाहे वो कितनी बार भी निंदनीय कर्म करता रहे
मनुष्य को इस श्लोक का दुरूपयोग करते हुए अशोभनीय कर्म नहीं करना चाहिए, भक्ति के द्वारा अपना चरित्र सुधारने पर ही उसे उच्चकोटि का भक्त मानना चाहिए
भक्त अपने हृदय को भौतिक कल्मष से कैसे शुद्ध कर पाता/सकता है? (9.31)
अशुद्ध हृदय को कोई शुद्ध नहीं कर सकता
नौ प्रकार के भक्ति-कार्यों में युक्त रहने से
निरन्तर भगवान् का चिन्तन करने से
हरे कृष्ण मन्त्र का अनवरत जप करने से
एक दुष्कृती या दुष्टात्मा और आकस्मिक पतन हुए भक्त में क्या अंतर है? (9.31)
कोई अंतर नहीं है, दोनों एक ही हैं
जो दुष्कृती है, वह भगवद्भक्त नहीं हो सकता
दुष्टात्मा कभी भक्ति के पास नहीं फटकता
भगवान् का निरन्तर स्मरण भक्त को बचा लेता है
क्या प्रमाण है कि निंदनीय कार्य करने वाला भक्त शुद्ध होकर धर्मात्मा बन सकता है? (9.31)
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा - भक्ति में लगे रहने से वह शीघ्र ही धर्मात्मा बन जाता है
न मे भक्तः प्रणश्यति - भगवान् कहते हैं कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता है
भौतिक जीवन का ऊंच-नीच का विभाजन क्या भगवान् की दिव्य भक्ति में लगे व्यक्ति पर भी लागू होता है? (9.32)
श्रीमद्भागवत में (2.4.18) कथन है कि अधम योनी चाण्डाल भी शुद्ध भक्त के संसर्ग से शुद्ध हो जाते हैं
भक्तियोग इतना प्रबल है कि भगवद्भक्त समस्त निम्नकुल वाले व्यक्तियों को जीवन की परम सिद्धि प्राप्त करा सकते हैं
भक्ति तथा शुद्ध भक्त द्वारा पथप्रदर्शन इतने प्रबल हैं कि वहाँ ऊँचनीच का भेद नहीं रह जाता
भगवान् इस लोक के विषय में क्या घोषित कर रहे हैं? (9.33)
अनित्यम् असुखं लोकम्– यह जगत् अनित्य तथा दुखमय है
किसी भी भले मनुष्य के रहने लायक नहीं है
यह संसार मिथ्या है
यह संसार नित्य तथा आनन्दमय है
ऋषितुल्य राजकुल में जन्मे अर्जुन को भगवान् क्यों कहते हैं कि मेरी सेवा करो, और शीघ्र ही मेरे धाम को प्राप्त करो? यह तो केवल निम्नकुलीन अभावग्रस्तों के लिए ही होना चाहिए, नहीं? (9.33)
किसी को भी इस अनित्य संसार में नहीं रहना चाहिए, क्योंकि यह दुखमय है
प्रत्येक व्यक्ति को भगवान् के हृदय से लगना चाहिए, जिससे वह सदैव सुखी रह सके
भगवद्भक्ति ही एकमात्र विधि है जिससे सभी वर्गों के लोगों की सारी समस्याएँ सुलझाकर जीवन सफल हो सकता है
क्या आपके साथ किसी भक्त ने अभद्र व्यवहार किया है? आज के श्लोकों के आधार पर आपका उस भक्त के प्रति क्या दृष्टिकोण रहेगा?
