Font size
WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-13 (3.3-12)
Total questions: 26
Worksheet time: 2hrs 20mins
भगवान् श्रीकृष्ण ने आत्मसाक्षात्कार की इन दो योगपद्धतियों - सांख्ययोग (ज्ञानयोग) और कर्मयोग (बुद्धियोग) - का वर्णन इससे पहले किस श्लोक में किया है? (3.3)
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव नभविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ 2.12 ॥
एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु ।
बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ॥ 2.39 ॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥ 2.47 ॥
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः ।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥ 2.61 ॥
सांख्ययोग (ज्ञानयोग) पद्धति क्या है? (3.3)
आत्मा तथा पदार्थ की प्रकृति का वैश्लेषिक अध्ययन - उन लोगों के लिए, जो व्यावहारिक ज्ञान तथा दर्शन द्वारा वस्तुओं का चिन्तन एवं मनन करना चाहते हैं (दर्शन)
कृष्णभावनामृत के सिद्धान्तों पर चलते व कार्य करते हुए मनुष्य कर्म के बन्धनों से छूट सकता है, यह पूर्णतया परब्रह्म (विशेषतया कृष्ण) पर आश्रित है और ऐसे समस्त इन्द्रियों को सरलता से वश में किया जा सकता है (धर्म)
आत्मसाक्षात्कार की दोनों योगपद्धतियों-धर्म व दर्शन के रूप में- के विषय में क्या सही है? (3.3)
दोनों एक दूसरे पर आश्रित हैं
दर्शनविहीन धर्म मात्र भावुकता या कभी-कभी धर्मान्धता है और धर्मविहीन दर्शन मानसिक ऊहापोह है
सम्पूर्ण पद्धति का उद्देश्य परमात्मा के सम्बन्ध में अपनी वास्तविक स्थिति को समझ लेना है
भगवान् द्वारा बतायी गई दोनों पद्धतियों में से कृष्णभावनामृत का मार्ग श्रेष्ठ क्यों है? (3.3)
इसमें दार्शनिक पद्धति द्वारा इन्द्रियों को शुद्ध नहीं करना होता
कृष्णभावनामृत प्रत्यक्ष पद्धति है
दार्शनिक चिन्तन अप्रत्यक्ष पद्धति है
कृष्णभावनामृत स्वयं ही शुद्ध करने वाली प्रक्रिया है
भक्ति की प्रत्यक्ष विधि सरल तथा दिव्य होती है
कौन से श्लोक में कहा गया है कि यज्ञ में अर्पित किये बिना भोगने वाला निश्चित रूप से चोर है?
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् |
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते || 3.6 ||
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः |
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्धयेदकर्मणः || 3.8 ||
यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः |
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङगः समाचर || 3.9 ||
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः |
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङक्ते स्तेन एव सः || 3.12 ||
इनमें से क्या सही है? (3.4)
कर्मविमुख होकर व्यक्ति कर्मफल से छुटकारा पा सकता है
केवल संन्यास से सिद्धि प्राप्त की जा सकती है
शुद्धि के बिना भी संन्यास ग्रहण करने से सफलता मिलती है
नियत कर्मों को न करके भगवान् की दिव्य सेवा को वे स्वीकार कर लेते हैं
सदैव सक्रिय रहने का स्वभाव किसका है? (3.5)
देहधारी जीवन
आत्मा
माया के संसर्ग में आए आत्मा को भौतिक आकर्षण से शुद्ध करने के लिए क्या करना आवश्यक है और इस शुद्धिकरण का क्या उद्देश्य है? (3.5)
इसे कृष्णभावनामृत के सत्कर्म में प्रवृत्त रखना चाहिए
शास्त्रों द्वारा आदिष्ट कर्मों में इसे संलग्न रखा जाय
शुद्धिकारी पद्धति कृष्णभावनामृत के चरमलक्ष्य तक पहुँचने के लिए है
शास्त्रानुमोदित कार्य करे पर कृष्णभावनाभावित न हो तो क्या लाभ?
जो कर्मेन्द्रियों को वश में तो करता है, किन्तु जिसका मन इन्द्रियविषयों का चिन्तन करता रहता है, वह __________ कहलाता है | (3.6)
गधा
कर्मचारी
खिलाड़ी
मिथ्याचारी
जो कृष्णभावनामृत में कार्य तो नहीं करते, किन्तु ध्यान का दिखावा करते हैं, व मन ही मन में इन्द्रियभोग का चिन्तन करते रहते हैं और कई बार शुष्क दर्शन के विषय में व्याख्यान भी देते हैं, ऐसे धूर्तों का क्या होता है? (3.6)
उसका ज्ञान व्यर्थ है
ऐसे धूर्त का चित्त सदैव अशुद्ध रहता है
उसके ज्ञान के सारे फल माया द्वारा हर लिये जाते हैं
उसके यौगिक ध्यान का कोई अर्थ नहीं होता
इनमें से कौन श्रेष्ठ है? (3.7)
लम्पट जीवन और इन्द्रियसुख के लिए छद्म योगी का मिथ्या वेश धारण करने वाला
अपने कर्म में लगे रह कर जीवन-लक्ष्य को, जो भवबन्धन से मुक्त होकर भगवद्धाम को जाना है, प्राप्त करने के लिए कर्म करते रहने वाला
सभी के लिए प्रमुख स्वार्थ-गति, सम्पूर्ण वर्णाश्रम-धर्म का उद्देश्य, जीवन-लक्ष्य क्या है? (3.7)
मृत्योपरान्त स्वर्ग
जीवन में स्वर्गिक आनंद
विष्णु (कृष्ण) के पास जाना
दिखावटी अध्यात्मिकता का जामा धारण करके पाखंडी (धूर्त) बनने की अपेक्षा निष्ठावान बनने के लिए क्या करना होगा? (3.7)
आत्म-साक्षात्कार के लिए मनुष्य शास्त्रानुमोदित संयमित जीवन बिता सकता है, अनासक्त भाव से अपना कार्य करता रह सकता है
जीविका के लिए ध्यान धरने वाले ध्यानी की अपेक्षा सड़क पर झाड़ू लगाने वाला निष्ठावान व्यक्ति कहीं अच्छा है
एक गृहस्थ भी कृष्णभावनामृत में नियमित सेवा करके लक्ष्य तक पहुँच सकता है
भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से कैसा कर्म करने की अपेक्षा करते हैं? (3.8)
श्रीकृष्ण यह चाहते हैं कि अर्जुन मिथ्याचारी बने
गृहस्थ क्षत्रिय के लिए निर्दिष्ट धार्मिक कर्तव्यों का पालन करे
भौतिकतावादी वासनाओं की शुद्धि के बिना कर्म का मनमाने ढंग से त्याग करना ठीक नहीं
व्यक्ति को कैसे कर्म करने चाहिए ताकि वह कर्मबन्धनों से बच सके? (3.9)
अच्छे
बुरे
केवल कृष्ण की प्रसन्नता (तुष्टि) के लिए
कृष्ण की प्रसन्नता (तुष्टि) के लिए कर्म करने की विधि क्या है? (3.9)
भगवद्भक्त के निर्देशन में
साक्षात् भगवान् कृष्ण के प्रत्यक्ष आदेश के अन्तर्गत
इन्द्रियतृप्ति के लिए कुछ भी नहीं किया जाना चाहिए
क्रमशः भगवद्धाम ले जाने वाली प्रेमभक्ति प्राप्त हो सकेगी
भगवान् द्वारा भौतिक सृष्टि की रचना का क्या उद्देश्य है? (3.10)
बद्धजीव यह सीख सकें कि वे विष्णु को प्रसन्न करने के लिए किस प्रकार यज्ञ करें
ताकि यज्ञ के द्वारा वे इस जगत् में चिन्तारहित होकर सुखपूर्वक रह सकें
ताकि वे इस भौतिक देह का अन्त होने पर भगवद्धाम को जा सकें
कलियुग में वैदिक शास्त्रों ने किस यज्ञ का विधान किया है? (3.10)
अश्वमेध यज्ञ
गोमेध यज्ञ
सौत्रमणि यज्ञ
विवाह यज्ञ
संकीर्तन यज्ञ
संकीर्तन-यज्ञ व उसके प्रसंग में भगवान् कृष्ण का अपने भक्तरूप, चैतन्य महाप्रभु रूप में वैदिक शास्त्रों में कहाँ वर्णन हुआ है? (3.10)
श्रीमद्भागवत (2.4.20)
श्रीमद्भागवत (11.5.32)
भगवद्गीता (9.14)
देवतागणों की संसार में क्या स्थिति है? (3.11)
सांसारिक कार्यों के लिए अधिकारप्राप्त प्रशासक हैं
सभी वैदिक यज्ञों के प्रमुख भोक्ता हैं
भगवान् के शरीर के विभिन्न भागों में असंख्य सहायकों के रूप में स्थित हैं
यज्ञ करने का क्या लाभ है? (3.11)
आहारशुद्धौ - यज्ञ से मनुष्य के खाद्यपदार्थ शुद्ध होते हैं
सत्त्वशुद्धिः - शुद्ध भोजन करने से मनुष्य-जीवन शुद्ध हो जाता है
सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः - जीवन शुद्ध होने से स्मृति के सूक्ष्म-तन्तु शुद्ध होते हैं
स्मृतिलम्भे सर्वग्रंथीनां विप्रमोक्षः - स्मृति-तन्तुओं के शुद्ध होने पर मनुष्य मुक्तिमार्ग का चिन्तन कर सकता है
वेदों में विभिन्न देवताओं के लिए संस्तुत भिन्न-भिन्न प्रकार के यज्ञ अंततः किसको अर्पित किये जाते हैं? (3.12)
उन्हीं देवी-देवताओं को
सभी देवताओं को बराबर-बराबर
परम भगवान् श्रीकृष्ण (विष्णु) को
केवल देवताओं के राजा को
जब परम भगवान् श्रीकृष्ण हैं, तो अलग-अलग प्रकार के यज्ञ विधि क्यों हैं? (3.12)
जो यह नहीं समझ सकता है कि भगवान् क्या हैं, उसके लिए देवयज्ञ का विधान है
अनुष्ठानकर्ता के भौतिक गुणों के अनुसार वेदों में विभिन्न प्रकार के यज्ञों का विधान है
विभिन्न देवताओं की पूजा भी गुणों के अनुसार की जाती है
जो भगवान् द्वारा प्रदत्त विभिन्न उपहारों को यज्ञ में अर्पित किये बिना भोगता है, वह निश्चित रूप से चोर क्यों है और इसका क्या परिणाम है? (3.12)
जीवन की सारी आवश्यकताएँ भगवान् के देवता प्रतिनिधियों द्वारा ही पूरी की जाती हैं
हमारा जीवन भगवान् द्वारा प्रदत्त वस्तुओं पर आश्रित है कोई कुछ बना नहीं सकता
यदि हम जीवन-उद्देश्य को भूल कर अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए वस्तुएँ लेते रहेंगे तो निश्चय ही हम चोर हैं
चोरों का समाज कभी सुखी नहीं रह सकता क्योंकि उन्हें तो केवल इन्द्रियतृप्ति की चिन्ता रहती है
चोरी करने से व उसके प्रभाव से बचने के लिए क्या करना चाहिए? (3.12)
सभी वस्तुओं का समुचित उपयोग आत्म-साक्षात्कार व भौतिक जीवन-संघर्ष से मुक्ति प्राप्त करने के लिए करें, इन्द्रियतृप्ति के लिए नहीं
यज्ञ सम्पन्न करने से मानव जीवन का चरम लक्ष्य प्राप्त हो जाता है
चैतन्य महाप्रभु ने यज्ञ सम्पन्न करने की सरलतम विधि, संकीर्तन का प्रवर्तन किया, जो संसार के किसी भी व्यक्ति द्वारा किया जा सकता है
आप अब से अपने किन किन दैनिक कार्यों को भगवान् को अर्पित करते हुए करेंगे जो अभी तक नहीं किये थे?
