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Worksheets55.भगवद गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_12.14–13.03
Total questions: 39
Worksheet time: 1hrs 18mins
एक भक्त कभी विचलित नहीं होता क्योंकि वह हमेशा ________ की गतिविधियों में लगा रहता है?
योग
शांति पाने
कृष्ण भावनामृत
वैदिक
एक भक्त आम तौर पर ऐसी गतिविधियों में क्यों संलग्न होता है जो दूसरों को परेशानी में डालती हैं?
यह एक भक्त की जिम्मेदारी है कि वह दूसरों को शुद्ध करे इसलिए वह उन्हें मानसिक रूप से मजबूत बनाने के लिए उन्हें परेशानी में डालता है
माया बलवान है और सभी पर समान रूप से कार्य करती है। इसलिए एक भक्त माया से मुक्त नहीं होता है और खुद को ऐसी गतिविधियों में संलग्न करता है
यह पूरी तरह गलत है। एक भक्त कभी भी ऐसी गतिविधियों में संलग्न नहीं होता है जो दूसरों को परेशानी में डालती हैं
मैंने ऐसा भक्त कभी नहीं देखा लेकिन मैं इस पर टिप्पणी भी नहीं कर सकता
‘’भक्त बाहर तथा भीतर से स्वच्छ रहता है’’. इस कथन का समर्थन करने के लिए प्रभुपाद किन गतिविधियों पर प्रकाश डाल रहे हैं ?
भक्त दिनभर में दो बार स्नान करता है और भक्ति के लिए प्रातःकाल जल्दी उठता है
भक्त प्रतिदिन देवताओ के लिए यज्ञ करता है और साफ वस्त्र धारण करता है
भक्त कीर्तन करता है और प्रतिदिन स्नान करता है
भक्त सेवा करता है और जब जरुरत पाए स्नान करता है
भक्त सदैव दक्ष होता है, कृष्ण ने ऐसा क्यों कहा?
कृष्ण ने कहा क्योंकि एक भक्त भक्ति कर रहा है और भक्ति मूर्ख लोगों के लिए नहीं है
इस कथन का समर्थन करने में क्या गलत है, आखिर एक भक्त कृष्ण को ही लक्ष्य बना रहा है
क्योंकि वह जीवन के समस्त कार्यकलापों के सार को जानता है और प्रामाणिक शास्त्रों में दृढ़विश्वास रखता है और इस भौतिक शरीर को प्राप्त करने के बाद भी वह इसका सर्वोत्तम उपयोग करता है
कृष्ण ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि एक भक्त भौतिक दुनिया के प्रबंधन में विशेषज्ञ होता है
श्लोक 12.16 में, एक शुद्ध भक्त के किस गुण पर प्रभुपाद प्रकाश डाल रहे हैं ताकि साधक सीख सके और भक्ति सेवा में आगे बढ़े?
एक शुद्ध भक्त कभी भी अपना समय किसी भी गतिविधि में बर्बाद नहीं करता है जो भक्ति सेवा के संबंध में नहीं है
शुद्ध भक्त कभी भी ऐसी वास्तु के लिए प्रयास नहीं करता, जो भक्ति के नियमों के प्रतिकूल हो
वह जानता है कि उसका शरीर अस्थायी है, अतएव शारीरिक कष्टों के आने पर वह भक्ति में समर्पित रहता है
उपर्युक्त सभी सही हैं। प्रभुपाद चाहते हैं कि हम भक्ति में आगे बढ़ने के लिए शुद्ध भक्त के बारे में जाने और सीखें
भगवान गीता में "मौनी" की क्या परीभाषा बताते हैं ?
जो किसी भी परिस्थिति में एक भी शब्द नहीं बोलता
जो समस्या का सामना करने पर बोलता नहीं है
जो केवल सकारात्मक कथन बोलता है
कृष्णकथा के अतिरिक्त कुछ भी नहीं बोलता
जो भक्त कहलाना चाहता है, उसे _____________ का विकास करना चाहिए ?
राष्ट्र
सकारात्मकता
शांति
सद्गुणों
किन क्रियाकलापों को अपनाकर भक्त स्वयं में सद्गुणों का विकास कर सकता है?
प्रतिदिन स्वयं का विश्लेषण करके
प्रेरक वक्ताओं के साथ रहकर
कृष्णभावनामृत तथा भक्ति में संलग्न रहने के कारण उसमें ये गुण स्वतः ही विकसित हो जाते हैं
मैं खुद को जानता हूं और मैं इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हूं कि मुझमें ये गुण पहले से ही हैं
12.01 श्लोक में अर्जुन द्वारा पूछे गए परम सत्य के संबंध में कृष्ण की अंतिम राय क्या है?
जो लोग अपने मन को मेरे निराकार रूप में एकाग्र करते हैं, और अत्यन्त श्रद्धापूर्वक मेरी निराकार रूप के ध्यान में सदैव लगे रहते हैं, वे मेरे द्वारा परम सिद्ध माने जाते हैं
जो लोग अपने मन को मेरे साकार रूप में एकाग्र करते हैं, और अत्यन्त श्रद्धापूर्वक मेरी पूजा करने में सदैव लगे रहते हैं, वे मेरे द्वारा परम सिद्ध माने जाते हैं
जो लोग मेरे इस संसार में परोपकारी कार्य मैं लगे रहते हैं वह मेरे द्वारा परम सिद्ध माने जाते हैं
कृष्ण ने स्पष्ट रूप से अपनी राय नहीं दी है क्योंकि वे नहीं चाहते कि लोग धर्म के लिए लड़ें
भक्ति में प्रगति करने हेतु _________ गुरु की शरणगति अनिवर्य है?
ज्ञानी
शास्त्रों में पारंगत
कर्मकांड में पारंगत
प्रमाणिक
क्या वास्तव में कृष्ण को आत्मसमर्पण करने से पहले भगवान की निराकार रूप की आत्म-साक्षात्कार की प्रक्रिया से गुजरना आवश्यक है?
हाँ कृष्ण को समर्पण करने से पहले इस प्रक्रिया से गुजरना एक प्राथमिक आवश्यकता है
यह तभी तक आवश्यक है, जब तक शुद्ध भक्त की संगति प्राप्त न हो और और भक्ति मैं न लगे हो तब कृष्णा इस मार्ग को बताते हैं
सभी पथ समान हैं। कृपया इन बयानों को प्रोत्साहित न करें
हम 21वीं सदी में जी रहे हैं और आधुनिक विज्ञान इतना आगे बढ़ चुका है। मैं आपसे इन विचारों को त्यागने का अनुरोध करता हूं
कृष्णा 13.01 अर्जुन को कहते हैं यह शरीर क्षेत्र कहलाता है और इस क्षेत्र को जानने वाला _____है?
क्षत्रिय
क्षेत्रज्ञ
क्षेत्र जन
क्षेत्राणी
कलियुग में सरलता तथा सुखपूर्वक परम धाम पहुंचने की विधि क्या है?
ध्यान लगाना
गायत्री मंत्र का जाप करें
हरे कृष्ण महामंत्र का जाप करे
पवित्र स्थानों पर जाएँ और गंगा स्नान करें
भगवान के अनुसार कर्म-क्षेत्र ______है?
शरीर
आत्मा
मन
बुद्धि
चूँकि हम भगवत गीता पढ़ रहे हैं, हमें इस बात का ध्यान होना चाहिए कि हम वर्तमान में किस अध्याय का अध्ययन कर रहे हैं। क्या आप कृपया 12वें अध्याय का नाम चुन सकते हैं?
भक्तियोग
प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
विराट रूप
श्रीभगवान् का ऐश्वर्य
क्या भगवत गीता के अनुसार परमात्मा और आत्मा अलग हैं?
हाँ, वे अलग हैं। परमात्मा श्रेष्ठ है और जीवात्माएँ सभी प्रकार से परमात्मा के अधीन हैं
हाँ, वे भिन्न हैं लेकिन परमात्मा की तुलना में जीव गुणवत्ता और मात्रा में समान हैं
नहीं, वे एक हैं। इस शरीर को छोड़ने के बाद जीवात्मा परमात्मा में विलीन हो जाएगी
गीता इस प्रश्न का कोई विशिष्ट उत्तर नहीं देती है
क्या जीवात्मा भौतिक शरीर से भिन्न है?
आधुनिक विज्ञान इस बात का प्रमाण देता है कि यह शरीर विभिन्न पदार्थों का मेल है। तो हम आत्मा के अस्तित्व के बारे में क्यों बात कर रहे हैं?
हाँ, निश्चित रूप से वे अलग हैं। शरीर पदार्थ से बना है और आत्मा विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक है
हाँ, वे अलग हैं लेकिन दोनों रासायनिक प्रतिक्रियाओं का परिणाम हैं
नहीं, दोनों समान हैं। वास्तव में अनेक आध्यात्मिक संगठन आत्मा के अस्तित्व को नहीं मानते हैं
जीव भौतिक संसार में परेशानी और कष्ट से क्यों गुजर रहे हैं?
वे एक नागरिक के रूप में अपने कर्तव्यों के बारे में भूल गए हैं और इसलिए वे पीड़ित हैं
वे पूरी तरह से भूल गए हैं कि वे इस शरीर को छोड़ने के बाद अवैयक्तिक ब्रह्म में लीन हो जाएंगे और इसलिए वे पीड़ित हैं
कृष्णा से अपने संबंध की विस्मृति के कारण वे कष्ट उठा रही हैं
ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अपनी परंपरा और संस्कृति को भूल रहे हैं और इसके अलावा इसे संरक्षित करने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं
भक्त भगवान् के लिए मंदिर का निर्माण करा सकता है और उसके लिए वह सभी प्रकार की चिन्ताएँ उठा सकता है, लेकिन वह अपने परिवार वालों के लिए बड़ा सा मकान नहीं बनाता. इस से प्रभुपाद किस प्रकार की मानसिकता प्रदर्शित करना चाहते हैं ?
एक भक्त कृष्ण की संतुष्टि के लिए सभी समस्याओं को सहन करता है और जीवन की मूलभूत भौतिक आवश्यकताओं का भी ध्यान रखता है
प्रभुपाद स्पष्ट रूप से भौतिक उत्तरदायित्वों को त्याग कर पूर्णकालिक भक्त बनने का निर्देश दे रहे हैं
चूंकि प्रभुपाद इस्कॉन के संस्थापक आचार्य हैं, वे हमें पूरी दुनिया में एक मंदिर बनाने का निर्देश दे रहे हैं
मुझे नहीं लगता, मैं इस पर टिप्पणी कर सकता हूं
भगवान कृष्ण अपने प्रिय भक्तों में सबसे प्रथम गुण कौन सा बताते हैं?
चिंता रहित
सुख दुःख में समभाव
दक्ष
ईर्ष्या रहित
भगवान कृष्ण का प्रिय भक्त कभी भी भक्ति के विरुद्ध झूठे तर्कों से विचलित क्यूँ नहीं होता ?
क्योंकि भक्त का मन सदैव शांत रहता है
क्योंकि ऐसे भक्त को कृष्ण भक्ति करने के करण इस बात का अपने हृदय में अहसास हो जाता है की कृष्ण भक्त के शाश्वत प्रभु हैं
क्योंकि कृष्ण भक्त सच और झूठ में अंतर को भली भाँति जानता है
क्योंकि कृष्ण भक्त शास्त्रों से ज्ञान प्राप्त करता है
कृष्ण के प्रिय भक्त कैसे शत्रुओं के प्रति भी द्वेष की भावना नहीं रखता ?
क्योंकि ऐसा भक्त सोचता है की अपने पूर्व जन्मों के दुष्कर्मों के कारण ही कोई उनका शत्रु बना हुआ है , अतः द्वेष नहीं करना चाहिए
क्योंकि ऐसा भक्त खुद को सबके प्रति सम्भव रहना चाहता है
क्योंकि ऐसा भक्त स्वयं को द्वेष भावना से मुक्त रखना चाहता है
उपरोक्त सभी
कृष्ण का प्रिय भक्त सुख दुःख के प्रति सम्भव कैसे रख लेता है ?
क्योंकि ऐसे भक्त को कभी भी कृष्ण कभी दुःख नहीं देते
क्योंकि कृष्ण ऐसे भक्त को दुःख सहने की शक्ति देते हैं
क्योंकि ऐसा कर सोचता है अपने पूर्व में किए गए पाप के कारण ही मुझे कष्ट मिल रह है, जो कि जितना कष्ट मिलना चाहिए उससे बहुत कम है
उपरोक्त सभी
भगवान कृष्ण 12 अध्याय में उनके प्रिय भक्त के कितने गुणो का वर्णन करते हैं ?
64
108
16
35
भगवान कृष्ण 12 अध्याय में अपने प्रिय भक्त के गुणो का वर्णन करते हैं, क्या इसका अर्थ हुआ की अन्य भक्त जिन में यह गुण नहीं हैं वह उन्हें प्रिय नहीं है ?
निश्चित रूप से, नहीं तो कृष्ण सिर्फ़ इन गुणो वाले भक्तों को ही प्रिय कहते है
कृष्ण सबके प्रति समभाव हैं, जब भक्त कृष्ण के प्रति अत्यधिक आसक्त हो जाता है तो कृष्ण भी उस भक्त के समान ही अपना भाव रखते हैं ,यही वास्तविक समता है
कृष्ण सबसे बराबर व्यवहार करते हैं , क्योंकि वे समभाव हैं
कृष्ण सिर्फ़ अपने भक्तों से ही प्रेम करते हैं
कृष्ण भक्त के अनेक गुणो का वर्णन करते हैं, क्या इन गुणो का विकास भक्ति से भी महत्वपूर्ण है ?
जी हाँ , इन गुणो का विकास होते ही भक्ति भी स्वयं परिपक्व हो जाती है
जी नहीं, भले ही ये गुण ना भी हों पर अगर भक्ति हो तो इन गुणो का कोई महत्व नहीं है
यह सब गुण कृष्ण के प्रति भक्ति का विकास होते ही स्वयं प्रकट होते हैं, और अगर किसी में इन गुणो का विकास नहीं हो रहा तो इसका अर्थ हुआ की साधक में भक्ति अभी परिपक्व नहीं हुई है
साधक को गुण विकसित करने का प्रयास करना चाहिए, इसके लिए योग और ज्ञान मार्ग के साधन भी भक्ति में प्रगति के लिए बहुत उपयोगी हैं
कृष्ण कुछ गुणो की पुनः आवृत्ति क्यों करते हैं ?
क्योंकि कृष्ण को अपने पहले की बोली गयी बात का पूरा स्मरण नहीं रहा
क्योंकि कृष्ण कुछ बातों की आवृत्ति करके उन पर विशेष रूप से बल प्रदान करना चाहते हैं
क्योंकि कृष्ण के पास नवीन बोलने को कुछ नहीं है
क्योंकि पुनः बोले गए गुण कृष्ण को सबसे अधिक प्रिय हैं
भगवान कृष्ण द्वारा बताए गए सभी गुणो में सर्वाधिक महत्वपूर्ण कौन सा गुण है ?
सुख दुःख में समभाव
ईर्ष्याविहीन
मिथ्या अहंकार से मुक्त
मन तथा बुद्धि का कृष्ण में समर्पित होना
श्रील प्रभुपाद जी तात्पर्य में लिखते हैं की भक्त हो धन अर्जित करने में बहुत अधिक संघर्ष नहीं करना चाहिए ।किंतु आज के समाज में बिना मेहनत किए धन कामना सम्भव नहीं है, तो क्या श्रील प्रभुपाद जी का यह उपदेश व्यावहारिक नहीं है ?
जी नहीं, क्योंकि एक भक्त को संसार से विरक्त रहना चाहिए और अपने निर्वाह के लिए कुछ भी अर्जित नहीं करना चाहिए
जी नहीं भक्त को जीवन निर्वाह करने के लिए धन कामना चाहिए, किंतु अगर निर्वाह के लिए धन हो जाए तो फिर समय का अपव्यय अधिक से अधिक धन कमाने में नहीं लगाना चाहिए
जी नहीं, क्योंकि भक्त कि धन के लिए दान पर आश्रित रहना चाहिए
जी हाँ , धन सबसे आवश्यक है भक्ति भी धन के बिना नहीं हो सकती
निम्नलिखित में से कौन सा गुण भगवान कृष्ण द्वारा अपने प्रिय भक्त में नहीं बताया गया है ?
जो किसी को कष्ट नहीं पहुँचता
समस्त कष्टों से रहित
शुभ और अशुभ वस्तुओं का त्याग
जो कभी कुछ नहीं बोलता और चुप रहता है
भगवान अपने प्रिय भक्त के विषय में बताते हैं कि उनका भक्त समस्त कष्टों से मुक्त रहता है , किंतु गीता में ही कृष्ण कहते हैं यह संसार दुखों का घर है ।क्या कृष्ण के इन उपदेशों में विरोधाभास नहीं है ?
नहीं, क्योंकि संसार के लोगों को कष्ट होता है, भक्त को कृष्ण कभी कष्ट नहीं देते इस कारण भक्तों को कष्ट नहीं होता
नहीं , क्योंकि कृष्ण के कहने का आशय है की कृष्ण का भक्त संसार के दुःख पड़ने पर भी व्यथित नहीं होता
नहीं, क्योंकि इसका आशय है कि कृष्ण है की ऐसा भक्त संसार के सुखों के ना मिलने पर कभी व्यथित नहीं होता
2 और 3
क्या भक्त शुभ कर्मों का भी त्याग कर देता है ?
नहीं, क्योंकि शुभ कर्म भक्ति को बढ़ाने में सहायक है
हाँ,क्योंकि शुभ कर्म का फल भोगने के लिए भी इस संसार में आना पड़ता है
नहीं, क्योंकि अम देखते हैं की भक्त अपने जीवन मई अनेक प्रकार के शुभ कर्म करते रहते हैं
शुभ कर्मों का त्याग भक्त इस दृष्टि से करता है की ऐसे कार्य भक्त कभी फल की इच्छा से नहीं करता अपितु कृष्ण के लिए करता है
भगवान कृष्ण क्यूँ कहते हैं की उनका भक्त सदैव मौन रहता है ?
मौन रहने से श्री कृष्ण का आशय है की उनका भक्त संसार के बारे में व्यर्थ बात नहीं करते अपितु कृष्ण कथा करते हैं
क्योंकि मौन रहने से कृष्ण से कृष्ण का ध्यान किया जा सकता है
क्योंकि मौन रहने से संसार की बात मन में नहीं आती
क्योंकि मौन रहने से संसार के भोग की इच्छा समाप्त हो जाती है
गीता के 12 अध्याय के अनुसार भक्ति मार्ग ही आत्म साक्षात्कार के लिए सर्वश्रेष्ठ है। किंतु भक्ति मार्ग एक साधक के जीवन में कब आरम्भ हो पाता है ?
जब साधक कृष्ण के शरणागत हो जाए
जब साधक कृष्ण के प्रति भक्ति भाव रखे
जब किसी साधक को शुद्ध भक्त की संगति प्राप्त हो
उपरोक्त सभी
क्या निराकार ब्रह्म के प्रति आकर्षण साधक को आध्यात्मिक जीवन में लाभप्रद है ?
नहीं, निराकार के प्रति आकर्षण सर्वथा व्यर्थ है
हाँ, निराकार के प्रति आकर्षण भक्ति के समान ही श्रेष्ठ है
निराकार के प्रति आकर्षण तभी तक लाभप्रद है जब तक कोई कृष्ण भक्ति के स्तर तक नहीं आ जाए
निराकार के उच्च स्तर तक पहुँचने के लिए साधक को पहले भक्ति के नियमों का पालन करके फिर स्वयं को निराकार के स्तर तक उठाना होता है
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