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Worksheetsसूरदास के पद
Total questions: 4
Worksheet time: 18mins
ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी।
अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।
ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी।
प्रीति-नदी मैं पाउँ न बोरयौ, दृष्टि न रूप परागी।
‘सूरदास’ अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी।।
1. गुर चाटी ज्यों पागी, में गुर (गुड़) से किसकी तुलना की गई है और चांटी (चींटी)से किसकी?
क ) गुड़ से उद्धव की तुलना की गई है और चींटी से गोपियों की।
ख) गुड से कृष्ण की तुलना हुई है और चींटी से राधा की।
ग ) गुड़ से ब्रज वासियों की तुलना हुई है और चींटी से कृष्ण की।
घ) गुड़ से कृष्ण की तुलना हुई और चींटी से गोपियों की।
क
ख
ग
घ
. पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह ना दागी ,प्रस्तुत पंक्ति में कमल के पत्ते की क्या विशेषता बताई गई है?
क ) पानी के संपर्क में रहने से कमल का पत्ता गल जाता है
ख) कमल के पत्ते पर पानी का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
ग) पानी में रहकर पत्ता गहरे रंग का हो जाता है।
घ) पानी में रहने से पत्ते का आकार छोटा हो जाता है।
क
ख
ग
घ
3.’अपरस’ शब्द का यहां क्या अर्थ है?
क) सूखा
ख)अनासक्त
ग) दुर्भाग्यशाली
घ)निर्विकार
क
ख
ग
घ
4.बिथा शब्द का तत्सम रूप लिखिए।
क)व्यर्थ
ख)व्यथा
ग)बिना
घ) मंथन
क
ख
ग
घ
5.सूरदास के साहित्य में किस भाषा की प्रमुखता है?
क) अवधी भाषा
ख) राजस्थानी भाषा।
ग) ब्रजभाषा
घ) बुंदेली भाषा।
क
ख
ग
घ
हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।
समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।
इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।
बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।
ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।
अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।
ते क्यौं अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।
राज धरम तौ यहै ‘सूर’, जो प्रजा न जाहिं सताए।।
मधुकर’ शब्द का प्रयोग किसके लिए हुआ है ?
(क) गोपियों के लिए
(ख) भौरे के लिए
(ग) कृष्ण के लिए
(घ) उद्धव के लिए
क
ख
ग
घ
हरि है राजनीति पढ़ि आए’……जाहि सताए” पद में किस शब्द शक्ति का प्रयोग हुआ है ?
(क) अभिधा
(ख) लक्षणा
(ग) व्यंजना
(घ) इनमें से कोई नहीं
क
ख
ग
घ
गोपियों के अनुसार सच्चा राजधर्म क्या है ?
(क) प्रजा का पालन
(ख) प्रजा के सुखों का ध्यान रखना
(ग) प्रजा को बिल्कुल न सताना
(घ) उपर्युक्त सभी
क
ख
ग
घ
गोपियों के अनुसार श्रीकृष्ण ने किस मर्यादा का पालन नहीं किया ?
(क) प्रेम की मर्यादा
(ख) लोक-लाज की मर्यादा
(ग) सामाजिक मर्यादा
(घ) उपरोक्त सभी
क
ख
ग
घ
गोपियों ने योग के संदेश को कैसा बताया ?
(क) शास्त्र विरुद्ध
(ख) अग्राह्य
(ग) कृष्ण की स्वार्थवृत्ति का प्रतीक।
(घ) उपर्युक्त सभी
क
ख
ग
घ
हमारैं हरि हारिल की लकरी।
मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी।
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह कान्ह जकरी।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।
सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ ‘सूर’ तिनहिं लै सौंपौ, जिनके मन चकरी।। 1
गोपियों ने योग रूपी व्याधि किसे देने की सलाह दी है?
(क) जो बीमार हो
(ख) जो ईश्वर-भक्त हो
(ग) जो कृष्ण को ही भगवान माने
(घ) जिसका मन चकरी के समान चंचल हो
क
ख
ग
घ
इनमें से किस पक्षी की तुलना गोपियों से की गई है?
(क) कोयल
(ख) मोर
(ग) हारिल
(घ) चकोर
क
ख
ग
घ
गोपियों की दशा ……….. पक्षी की तरह हो गई है?
1(क) बेचारे
(ख) एक
(ग) मारे
(घ) हारिल
क
ख
ग
घ
निम्नलिखित में कौन-सा विकल्प गलत है?
(क) गोपियों को योग का ज्ञान कड़ुवी ककड़ी की तरह लगता है।
(ख) सूरदास ने सगुर्ण भक्ति के उपासक हैं।
(ग) गोपियों ने उद्धव पर व्यंग्य करते हुए अतिबड़भाग कहा।
(घ) उद्धव ने कहा कि श्रीकृष्ण गोपियों से मिलने आएंगे।
क
ख
ग
घ
गोपियों ने कृष्ण को किस प्रकार धारण किया था ?
(क) मन से
(ख) कर्म से
(ग) वचन से
(घ) उपरोक्त सभी तरह से
क
ख
ग
घ
मन की मन ही माँझरही।
कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही।
अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही |
अब इन जोग सँदेसनि सुनि सुनि, बिरहिनि बिरह दही।
चाहति हुतीं गुहारि जितहिं तैं, उत तैं धार बही।
‘सूरदास’ अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही।
1. उद्धव कृष्ण का कौन-सा संदेश लेकर आए थे?
क) प्रेम-संदेश
ख) अनुराग-संदेश
ग) योग-संदेश
घ) इनमें से कोई नहीं
क
ख
ग
घ
. किसने प्रेम की मर्यादा का उल्लंघन किया है?
(क) गोपियों ने
(ख) उद्धव ने
(ग) राजा ने
(घ) कृष्ण ने
क
ख
ग
घ
गोपियाँ किससे गुहार लगाना चाहती थीं ?
(क) राम से
(ख) प्रभु से
(ग) ऊधौ से
(घ) कृष्ण से
क
ख
ग
घ
भ्रमर गीत की विशेषता नहीं है?
(क) श्रृंगार रस के वियोग रस का प्रभावशाली प्रयोग हुआ है।
(ख) कोमल भाषा और सटीक अलंकारो का प्रयोग हुआ है।
(ग) इसमें निराशा, कटाक्ष, व्यंग्य अनेक मनोभावों को सूरदास ने व्यक्ति किया है।
(घ) ये अवधी भाषा में लिखी गई है।
क
ख
ग
घ
.मन की मन ही माँझ रही’ मे कौन सा अलंकार है ?
(क) श्लेष अलंकार
(ख) उपमा अलंकार
(ग) अनुप्रास अलंकार
(घ) अतिशयोक्ति अलंकार
क
ख
ग
घ
