Font size
Worksheets24. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_6.02–6.09
Total questions: 42
Worksheet time: 1hrs 17mins
कृपया यहाँ पर अपना नाम लिखें।
कृपया यहाँ पर अपनी आयु लिखें।
कृपया यहाँ पर अपना मोबाईल नं0 लिखें।
कृपया यहाँ पर अपना पता लिखें।
निम्नलिखित में से परमेश्वर से युक्त होने की विधि क्या कहलाती है ?
योग
दुरुपयोग
उपयोग
सहयोग
श्रीमद्भगवद्गीता श्लोक संख्या 6.3 में श्रील प्रभुपाद जी ने जिस "योग सीढ़ी" के विषय में बताया है निम्न में से उसे पहचानें ।
पाश्विक जीवन - कर्मकाण्ड - सकाम कर्मयोग - निष्काम कर्मयोग - ज्ञानयोग - ध्यानयोग - भक्तियोग ।
पाश्विक जीवन - सकाम कर्मयोग - निष्काम कर्मयोग - कर्मकाण्ड - ज्ञानयोग - ध्यानयोग - भक्तियोग ।
पाश्विक जीवन - कर्मकाण्ड - निष्काम कर्मयोग - सकाम कर्मयोग - ज्ञानयोग - ध्यानयोग - भक्तियोग ।
पाश्विक जीवन - कर्मकाण्ड - सकाम कर्मयोग - निष्काम कर्मयोग - ध्यानयोग - ज्ञानयोग - भक्तियोग ।
योग की "योगारुरुक्षु" अवस्था से आपका क्या अभिप्राय है ?
किसी भी सीढ़ी के प्रारंभिक भाग को योगारुरुक्षु अवस्था कहते हैं ।
योग सीढ़ी के प्रारंभिक भाग को योगारुरुक्षु अवस्था कहते हैं ।
परम सिद्धि प्राप्त व्यक्ति योगारुरुक्षु अवस्था में होता है ।
ये सभी कथन उचित हैं ।
योगारूढ़ किसे कहा जाता है ?
किसी भी सीढ़ी के अंतिम भाग को योगारूढ़ कहते हैं ।
योग की चरम अवस्था में पूर्णतः स्थापित व्यक्ति को योगारूढ़ कहते हैं ।
योग सीढ़ी को चढ़ने वाले व्यक्ति को योगारूढ़ कहते हैं ।
ये सभी कथन उचित हैं ।
अष्टांगयोग के नवसाधक के लिए कर्म साधन कहलाता है । ऐसा क्यों ? स्पष्ट करें ।
क्योंकि यम से प्रत्याहार अवस्था तक योगाभ्यास के लिए किए जाने वाले कर्म ही नवसाधक की योग के प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित करते हैं ।
क्योंकि यम से प्रत्याहार अवस्था तक मन तथा इंद्रियों के निग्रह के लिए योगाभ्यास में कर्म प्रधान होता है ।
क्योंकि यम से प्रत्याहार अवस्था तक मन तथा इंद्रियों के निग्रह के लिए योगाभ्यास नवसाधक के कर्मों पर आश्रित होता है ।
ये सभी कथन यथोचित है ।
"योग सिद्ध पुरुष के लिए समस्त भौतिक कार्यकलापों का परित्याग ही साधन कहा जाता है ।" इस कथन में समस्त भौतिक कार्यकलापों के परित्याग से आपका क्या अभिप्राय है ?
मन के संयमित होकर ध्यान में सिद्धहस्त होने से विचलित करने वाले समस्त मानसिक कार्यों का बंद होना ।
इच्छा शून्यता को प्राप्त होना - अर्थात् समस्त भौतिक इच्छाओं का आध्यात्मिक इच्छाओं में परिवर्तित हो जाना ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति का कृष्ण की प्रसन्नता के लिए ही प्रत्येक कर्म करना, न कि अपनी इंद्रियतृप्ति के लिए कर्म करना ।
ये सभी कथन यथोचित हैं ।
निम्न में से कौन सा व्यक्ति योगारूढ़ कहलाता है ?
जो व्यक्ति समस्त भौतिक इच्छाओं को त्याग करके न तो इंद्रियतृप्ति के लिए कार्य करता है और न ही सकाम कर्मों में प्रवृत्त होता है ।
जो व्यक्ति समस्त भौतिक इच्छाओं को त्याग करके न तो इंद्रियतृप्ति के लिए कार्य करता है और न ही निष्काम कर्मों में प्रवृत्त होता है ।
जो व्यक्ति समस्त भौतिक इच्छाओं को त्याग करके न तो इंद्रियतृप्ति के लिए कार्य करता है और न ही सकाम एवं निष्काम कर्मों में प्रवृत्त होता है ।
ये सभी कथन सत्य हैं ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के इंद्रियतृप्ति से विरक्त होने का मुख्य कारण क्या है ?
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति का केवल कृष्ण की प्रसन्नता के लिए कार्य करना ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति का इंद्रियतृप्ति की चरम सीमा को प्राप्त कर लेना ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति का कृष्ण की प्रसन्नता के लिए अपनी इंद्रियतृप्ति की प्रवृत्ति का बलिदान ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
जीवात्मा कभी भी कर्म किए बिना क्यों नहीं रह सकता है ?
क्योंकि जीवात्मा की वास्तविक या स्वाभाविक स्थिति सदैव कर्म करना है ।
क्योंकि जीवात्मा को इच्छा करने की आंशिक स्वतंत्रता प्राप्त है ।
क्योंकि जीवात्मा भगवान् के चिदानंद का अंश होता है, अतः सदैव सक्रिय रहता है ।
ये सारे कथन सत्य हैं ।
निम्न में से योग पद्धति का केंद्र बिंदु क्या है ?
मन
बुद्धि
आत्मा
इन्द्रियाँ
योगपद्धति का उद्देश्य क्या है ?
योगपद्धति का उद्देश्य मन को संयमित कर उसे इन्द्रियविषयों के प्रति आसक्ति से हटाना है ।
योगपद्धति का उद्देश्य इन्द्रियतृप्ति हेतु भौतिक शरीर की समयावधि को बढ़ाना है ।
योग पद्धति का उद्देश्य भिन्न-भिन्न सिद्धियों की प्राप्ति करना है ।
योग पद्धति का उद्देश्य भौतिक इन्द्रियों के संचालन को सुचारू करना है ।
एक नवसाधक अपने मन को कैसे प्रशिक्षित करता है ?
योग्य गुरु के निर्देशन में योग के नियमों का दृढ़ता से पालन करके ।
अपने मन को इंद्रिय विषयों से हटाने का बारम्बार अभ्यास करके ।
अपने मन को योगाभ्यास के दैनिक कर्मों में व्यस्त रखकर ।
यह सभी कथन सही है ।
शुद्ध जीवात्मा का इस संसार में बंधन का प्रमुख कारण क्या है ?
मन की मिथ्या अहंकार में लगकर प्रकृति के ऊपर प्रभुत्व जताने की प्रवृत्ति ।
मन की इस संसार में व्याप्त इंद्रिय विषयों को भोगने की इच्छा ।
मन का मिथ्या अहंकार के कारण कृष्ण के साथ संबंध को भूल जाना ।
यह सभी कथन सही हैं ।
मन को सांसारिक आसक्तियों से विरत करने का क्या उपाय है ?
मन को सदैव कृष्णभावनामृत में तल्लीन रखा जाए ।
मन को सदैव शुष्क मानसिक चिंतन में तल्लीन रखा जाए ।
मन को सदैव इन्द्रियतृप्ति के लिए विभिन्न प्रस्तावों के सृजन में व्यस्त रखा जाए ।
यह सभी कथन उचित हैं ।
श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 6.05 में "हि" शब्द की प्रयुक्ति का क्या महत्व है ?
यह कि मन को सदैव कृष्णभावनामृत में तल्लीन रखा जाए ।
यह कि मन को सदैव शुष्क मानसिक चिंतन में तल्लीन रखा जाए ।
यह कि मन को सदैव इन्द्रियतृप्ति के लिए विभिन्न प्रस्तावों के सृजन में व्यस्त रखा जाए ।
यह कि मन को सदैव मिथ्या अहंकार के अधीनस्थ होकर कार्य करने में व्यस्त रखा जाए ।
किसी भी मनुष्य के जीवन में मन सबसे महत्वपूर्ण घटक क्यों है ?
क्योंकि मन ही मनुष्य के बंधन तथा मोक्ष का कारण है ।
क्योंकि मन ही मनुष्य का मित्र भी हो सकता है और शत्रु भी ।
क्योंकि किसी भी मनुष्य के जीवन में मन ही भगवान् तथा माया का मुख्य संपर्क सूत्र है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
निम्न में से कौन सा कथन सत्य है ?
जब मन माया के अधीन कार्य करता है तो वह जीवात्मा का शत्रु होता है । जब मन प्रतिक्षण भगवान् के चिंतन में लगा रहता है तो वह जीवात्मा का मित्र होता है ।
जब मन भगवान् के अधीन कार्य करता है तो वह जीवात्मा का शत्रु होता है । जब मन प्रतिक्षण माया की सेवा में लगा रहता है तो वह जीवात्मा का मित्र होता है ।
मन अपनी इच्छाओं के अनुसार इन्द्रियभोग के नए- नए प्रस्तावों का सृजन करता रहता है । जबकि जीवात्मा सदैव निष्क्रिय अवस्था में रहता है ।
मन को वश में करना मुश्किल ही नहीं अपितु नामुमकिन है । अतः जीवात्मा को अपने मन को वश में करने के प्रयासों में अपना समय नष्ट नहीं करना चाहिए ।
अष्टांगयोग का प्रयोजन क्या है ?
मन तथा इंद्रियों को वश में करना ।
बुद्धि तथा विवेक को वश में करना ।
जीवात्मा का शुद्धिकरण करना ।
यह सभी कथन उचित हैं ।
मानवीय लक्ष्य से आपका क्या अभिप्राय है ?
अपनी स्वाभाविक स्थिति को पुनः प्राप्त करना ।
भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य प्रेममयी भक्ति प्राप्त करना ।
भगवद्प्रेम प्राप्त कर अपने वास्तविक घर अर्थात् भगवद्धाम को वापस लौट जाना ।
यह सभी कथन उचित हैं ।
"इस तरह उसका जीवन तथा लक्ष्य दोनों की नष्ट हो जाते हैं ।" इस कथन से आप क्या समझते हो ?, कृपया स्पष्ट करें ।
अर्थात् जिसका मन वश में नहीं होता है, तो उसकी दुर्लभ मनुष्य जीवन के रूप में समयावधि व अवसर तथा भगवत्प्रेम को प्राप्त करने का लक्ष्य नष्ट हो जाते हैं ।
अर्थात् जिसका मन वश में होता है वह इस संसार में इन्द्रिय विषयों की प्रचुर उपलब्धता के बावजूद भी इंद्रिय भोग से चूक जाता है ।
अर्थात् कृष्णभावनाभावित व्यक्ति न तो स्वयं इंद्रिय भोग करते हैं नहीं दूसरों को करने देते हैं जिस कारण जीवन अवधि एवं इन्द्रिय भोग का लक्ष्य दोनों ही नष्ट हो जाते हैं।
यह सभी कथन सत्य हैं।
यदि मन अविजित शत्रु बना रहे तो क्या होता है ?
तो मनुष्य को काम, क्रोध, लोभ, मोह के अधीनस्थ होकर कार्य करना पड़ता है ।
तो मनुष्य इस भवसागर से मुक्त होने के दुर्लभ अवसर को खो देता है ।
तो मनुष्य अपने जीवन यापन के लिए सदैव कड़े संघर्ष तथा पापकर्मों में लिप्त रहता है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
यदि मनुष्य का मन उसके वश में हो तो क्या होता है ?
मनुष्य हृदयस्थित परमात्मास्वरुप भगवान् की आज्ञा का पालन करता है ।
मनुष्य अपने सर्वोच्च लक्ष्य अर्थात् भगवत्प्रेम को सुगमता से प्राप्त कर सकता है ।
मनुष्य अपने अंतःकरण में वास्तविक आनंद एवं शांति को अनुभव करता है ।
यह सभी कथन उचित हैं ।
निम्न में से समभाव के सूत्र को पहचानें ।
संयमित मन + परमात्मा प्राप्ति + वास्तविक शांति = समभाव
संयमित मन + परमात्मा प्राप्ति - वास्तविक शांति = समभाव
संयमित मन - परमात्मा प्राप्ति - वास्तविक शांति = समभाव
परमात्मा प्राप्ति + वास्तविक शांति - कलुषित मन = समभाव
किसी जीवात्मा के मन को बहिरंगा शक्ति (माया) द्वारा विपथ करने का मूल कारण क्या है ?
जीवात्मा द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण के साथ अपने संबंध को भूल जाना ।
मासूम एवं निस्सहाय जीवात्माओं पर बहिरंगा शक्ति (माया) द्वारा शक्ति प्रदर्शन करने की प्रवृत्ति ।
बहिरंगा शक्ति (माया) द्वारा भौतिक जगत पर पूर्ण नियंत्रण करने की प्रवृत्ति ।
यह सभी तथ्य सत्य हैं ।
भौतिक कार्यकलापों में उलझे हुए मन को किस प्रकार चरम लक्ष्य की ओर मोड़ा जा सकता है ?
जैसे ही मन किसी योग पद्धति द्वारा वश में हो जाता है, वैसे ही उसे चरम लक्ष्य पर पहुंचा हुआ मान लिया जाता है ।
मन को कृत्रिम उपायों जैसे कि मनोचिकित्सक द्वारा निर्देशित औषधियों एवं पद्धतियों द्वारा वश में करके उसे चरम लक्ष्य की ओर मोड़ा जा सकता है ।
मन को कृत्रिम विधियों द्वारा निष्क्रिय करके चरम लक्ष्य की ओर मोड़ा जा सकता है ।
यह सभी कथन सत्य है ।
हम समस्त जीवात्माओं का परम कर्तव्य क्या है ?
भगवद्-आज्ञा का पालन करना ।
बहिरंगा शक्ति की आज्ञा का पालन करना ।
मन की आज्ञा का पालन करना ।
परिवारजनों की आज्ञा का पालन करना ।
जब मनुष्य का मन .................. में स्थिर हो जाता है तो जीवात्मा के समक्ष भगवद्-आज्ञा पालन करने के अतिरिक्त कोई .................. नहीं रह जाता है ।
परा-प्रकृति, विकल्प
अपरा-प्रकृति, विकल्प
परा-प्रकृति, सामर्थ्य
अपरा-प्रकृति, सामर्थ्य
मन को वश में करने से स्वतः ही ................. के आदेश का पालन होता है ।
परमात्मा
माया
बुद्धि
आत्मा
व्यावहारिक समाधि से आपका क्या अभिप्राय है ?
मन का वश में होना ।
मन का भगवद्-आज्ञा का पालन करना ।
संसार के समस्त द्वन्द्वों यथा सुख-दुख, सर्दी-गर्मी, मान-अपमान में समभाव रहना ।
यह सभी तर्क व्यवहारिक समाधि का अर्थ स्पष्ट करते हैं ।
अपने अर्जित ज्ञान तथा अनुभूति से पूर्णतया पर संतुष्ट व्यक्ति क्या कहलाता है ?
आत्मसाक्षात्कार को प्राप्त किया हुआ योगी कहलाता है ।
आध्यात्म को प्राप्त किया हुआ जितेंद्रिय कहलाता है ।
यह दोनों कथन सत्य हैं ।
यह दोनों कथन मिथ्या हैं ।
परमसत्य की अनुभूति के बिना कोरा ज्ञान व्यर्थ है । ऐसा क्यों ? स्पष्ट करें ।
यह कि केवल ज्ञान से जीवात्मा को सर्वोच्च सिद्धि अर्थात् भगवत्प्रेम प्राप्ति नहीं हो सकती है ।
यह कि सर्वोच्च सिद्धि की प्राप्ति के लिए ज्ञान के द्वारा परमसत्य की अनुभूति भी नितांत आवश्यक है ।
यह कि सर्वोच्च सिद्धि की प्राप्ति के लिए ज्ञान-विज्ञान दोनों ही अत्यावश्यक हैं।
यह सभी तर्क उचित हैं।
भगवान् श्री कृष्ण के नाम, रूप, गुण तथा लीलाओं की दिव्य प्रकृति को समझने के लिए क्या अत्यावश्यक है ?
भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य सेवा से पूरित होना अति आवश्यक है ।
वैदिक शास्त्रों का स्वाध्ययन अति आवश्यक है ।
अष्टांगयोग के अभ्यास द्वारा समाधि में लीन होना अति आवश्यक है ।
भगवान् श्रीकृष्ण के नाम, रूप, गुण तथा लीलाओं का शुष्क चिंतन अति आवश्यक है ।
श्रीमद्भगवद्गीता कृष्णभावनामृत का ............... है ।
विज्ञान
ज्ञान
संज्ञान
योग
कृष्णभावनाभावित बनने के लिए निम्न में से क्या चाहिए ?
विशुद्ध चेतना वाले व्यक्ति का सानिध्य ।
संसारी विद्वत्ता का शुष्क चिंतन एवं मंथन ।
ज्ञान की वास्तविक अनुभूति ।
अष्टांगयोग द्वारा सिद्ध योगी ही कृष्णभावनाभावित बन सकता है ।
अनुभूत ज्ञान से आप क्या समझते हो ?
अनुभूत ज्ञान अर्थात् योगी का परमसत्य विषयक अनुभव ।
अनुभूत ज्ञान अर्थात् मनुष्य के व्यक्तिगत् सांसारिक द्वैतताओं के अनुभव ।
अनुभूत ज्ञान अर्थात् योगी के अष्टांग योग के अभ्यास के दौरान रमणीय अनुभव ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
"किन्तु मात्र शैक्षिक ज्ञान से वह बाह्य विरोधाभासों द्वारा मोहित और भ्रमित होता रहता है ।" इस कथन में उल्लेखित विरोधाभासों से आप क्या समझते हो ?
यथा सुख-दुख, मान-अपमान, लाभ-हानि इत्यादि सांसारिक विरोधाभास हैं ।
मित्र-संबंधियों द्वारा दी जाने वाली मानसिक प्रताड़ना सांसारिक विरोधाभास है ।
इन्द्रियतृप्ति के लिए भोग-त्याग की प्रवृत्ति सांसारिक विरोधाभास है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति के लिए संसारी विद्वत्ता तथा मनोधर्म कंकड़ों या पत्थरों के समान होता है । ऐसा क्यों ?
क्योंकि कृष्णभावनाभावित व्यक्ति पहले से ही परम गंतव्य अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण की शरण में होता है ।
क्योंकि सांसारिक विद्वत्ता तथा मनोधर्म इस भौतिक जगत् में बंधन के प्रमुख कारण हैं ।
क्योंकि सांसारिक विद्वत्ता तथा मनोधर्म परम सत्य के वास्तविक ज्ञान में बाधक हैं ।
यह सभी तर्क सही हैं ।
निम्न में से एक किन व्यक्तियों को समान भाव से देखने वाला व्यक्ति समभाव नहीं माना जा सकता है ।
निष्कपट हितैषियों तथा प्रिय मित्रों
तटस्थों तथा मध्यस्थों
पुण्यात्माओं तथा पापियों
देवताओं तथा भगवान् श्रीकृष्ण
