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WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-15 (3.23-32)
Total questions: 16
Worksheet time: 2hrs 30mins
भगवान् कृष्ण कहाँ कहते हैं - जीवात्मा अहंकार के प्रभाव से मोहग्रस्त होकर अपने आपको समस्त कर्मों का कर्ता मान बैठता है, जब कि वास्तव में वे प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा सम्पन्न किये जाते हैं |
प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वशः |
अहङकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते || 3.27 ||
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा |
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः || 3.30 ||
प्रत्येक सभ्य व्यक्ति के लिए परम्परागत कुलाचार पालन करने का क्या उद्देश्य है? (3.23)
आध्यात्मिक जीवन की उन्नति
सामाजिक शान्ति में संतुलन
"मेरे पथ का ही अनुगमन करेंगे" - किन शब्दों का अर्थ है? (3.23)
यदि ह्यहं न वर्तेयं
जातु कर्मण्यतन्द्रितः
मम वर्त्मानुवर्तन्ते
मनुष्याः पार्थ सर्वशः
भगवान् कृष्ण सभी नियमों से ऊपर हैं, फिर भी उन्होंने घर में व बाहर गृहस्थोचित निर्दिष्ट नियमों का पालन क्यों किया? (3.23)
क्योंकि वे भी एक बद्धजीव हैं
क्योंकि कृष्ण परम प्रमाण हैं
क्योंकि वे धर्म की स्थापना के लिए अवतरित हुए थे
क्योंकि सामान्य व्यक्ति भी उन्हीं के पदचिन्हों का अनुसरण करते हैं
वर्णसंकर कौन हैं? (3.24)
अवांछित जनसमुदाय
अधिक गुणवत्ता की प्रजाति
जो सामान्य समाज की शान्ति को भंग करता है
अनुसरण और अनुकरण का क्या अर्थ है, उदाहरण सहित बताएं | (3.24)
पदचिन्हों का अनुसरण यानि उपदेशों का पालन
अनुकरण का अर्थ उनके कार्यों की नक़ल
रासलीला का अनुकरण करना चाहते हैं, गोवर्धन धारण नहीं कर सकते
छद्मभक्त शिवजी का अनुकरण करके अपनी मृत्यु को निकट बुलाते हैं
एक कृष्णभावनाभावित मनुष्य तथा कृष्णभावनाभाहीन व्यक्ति में क्या भेद होता है? (3.25)
केवल इच्छाओं का भेद होता है
एक अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए कार्य करता है, जबकि दूसरा कृष्ण की तुष्टि के लिए
सकाम कर्मों तथा वैदिक अनुष्ठानों में लगा, इन्द्रियतृप्ति का इच्छुक बद्धजीव भी कैसे कृष्णभावनामृत को प्राप्त कर सकता है? (3.26)
कभी कर ही नहीं सकता
इन्द्रियतृप्ति के नियमन के माध्यम से धीरे धीरे
कर्मफलों को कृष्ण की सेवा में अर्पित करके
कृष्णभावनाभावित विद्वान व्यक्ति से कार्य करना सीखकर
भौतिक चेतना वाले व्यक्ति में कृष्णभावनाभावित से क्यों आकाश-पाताल का अंतर है जबकि दोनों समान स्तर पर व समान पद पर कार्यरत हैं - जैसे अर्जुन और दुर्योधन? (3.27)
अहंकार के कारण आश्र्वस्त रहता है कि वही कर्ता है
नहीं जानता कि अन्ततोगत्वा वह कृष्ण के अधीन है
भूल जाता है कि भगवान् शरीर की इन्द्रियों के स्वामी हैं
वह कृष्ण के साथ अपने शाश्र्वत सम्बन्ध को भूल जाता है
तत्त्ववित् कौन कहलाता है? (3.28)
जो वित्त (धन) को ही तत्त्व (सार) समझता है
जो परमसत्य को ब्रह्म, परमात्मा तथा श्रीभगवान् – रूपों में जानता है
जो स्वयं को परमेश्वर के समकक्ष जानता है
परमसत्य को जानने वाला अपनी स्थिति के बारे में क्या सोचता है? (3.28)
मैं किसी कारण से देहात्मबुद्धि में फँस चुका हूँ
मेरा स्थान इस भौतिक सृष्टि में नहीं होना चाहिए
शुद्ध अवस्था में सारे कार्य कृष्ण की सेवा में नियोजित होने चाहिए
भौतिक बन्धनों से विचलित न होकर उन्हें भगवत्कृपा मानता है
अज्ञानी पुरुष व मंद का क्या स्वभाव होता है? (3.29)
शारीरिक चेतना में तनिक भी आसक्त नहीं होते
अन्यों के साथ शारीरिक सम्बन्ध को बन्धुत्व मानते हैं
धार्मिक औपचारिकताओं को ही लक्ष्य मानते हैं
उनके लिए आध्यात्मिक बोध सत्य है
वे सदैव भौतिक क्षेत्र में व्यस्त रहते हैं
भगवद्गीता के प्रयोजन को स्पष्टतया इंगित करने वाले श्लोक में भगवान् ने अर्जुन को किस प्रकार कर्म करने के लिए कहा है? (3.30)
सारे कार्यों को मुझमें समर्पित करके - मयि सर्वाणि कर्माणि
मेरे पूर्ण ज्ञान से युक्त होकर - संन्यस्याध्यात्मचेतसा
लाभ की आकांशा से रहित - निराशी
स्वामित्व के किसी दावे के बिना - र्निर्ममो
आलस्य से रहित होकर - विगतज्वरः
कौन सकाम कर्मों के बन्धन से मुक्त हो जाते हैं? (3.31)
जो भगवान् कृष्ण के आदेशों के अनुसार अपना कर्तव्य करते रहते हैं
जो भगवद्गीता पर टीका रचते हैं, किन्तु कृष्ण में कोई श्रद्धा नहीं रखते
जो भगवान् श्रीकृष्ण से ईर्ष्या करते हैं
जो ईर्ष्यावश भगवान् के उपदेशों की अपेक्षा करते हैं, उन्हें कैसा समझना चाहिए? (3.32)
समस्त ज्ञान से रहित
दिग्भ्रमित
सिद्धि के प्रयासों में नष्ट-भ्रष्ट
जो सकाम कर्मों में आसक्त है, उसे आप उसके क्रमिक विकास के लिए कैसे कृष्णभावनामृत के लिए प्रेरित करेंगे?
