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WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-27 (6.29-38)
Total questions: 26
Worksheet time: 2hrs 20mins
आत्मा तथा परमात्मा में क्या अन्तर है? (6.29)
परमात्मा हर प्राणी के हृदय में एकसाथ स्थित (सर्वव्यापी) हैं
परमात्मा भौतिक रूप से प्रभावित हो जाते हैं पर जीवात्मा नहीं होता
जीवात्मा भी एक-एक हृदय में विद्यमान है व एकसाथ समस्त हृदयों में सर्वव्यापी है
भगवान् की दो मुख्य शक्तियों – परा तथा अपरा - से जीव किस प्रकार सम्बंधित है? (6.29)
जीव अपराशक्ति का अंश है
जीव पराशक्ति से बद्ध है
अपराशक्ति में वह भौतिक इन्द्रियों का दास रहता है
पराशक्ति में वह साक्षात् परमेश्वर का दास रहता है
प्रत्येक अवस्था में जीव ईश्वर का दास है
आत्मसाक्षात्कार से ऊपर कृष्णभावनामृत की अवस्था में भक्त का कृष्ण से एकरूप हो जाने का क्या अर्थ है? (6.30)
उसके लिए कृष्ण ही सब कुछ हो जाते हैं
भक्त प्रेममय कृष्ण से पूरित हो उठता है
भगवान् तथा भक्त के बीच अन्तरंग सम्बन्ध हो जाता है
भगवान् भक्त की दृष्टि से ओझल नहीं होते हैं
कृष्ण में तादात्म्य होना
भक्त अपने हृदय में स्थित भगवान् को श्यामसुंदर रूप में किस प्रकार देख पाते हैं? (6.30)
प्रेमरूपी अंजन लगे नेत्रों से
कुण्डलिनी जागरण द्वारा
निराकार ब्रह्म का तादात्म्य करके
अष्टांग योग का दृढ़ता से पालन करके
योगी अपने अन्तःकरण में चतुर्भुज विष्णु का दर्शन कृष्ण के पूर्णरूप में करता है जो हाथ में ______ धारण किये रहते हैं | (6.31)
शंख
चक्र
गदा
कमलपुष्प
धनुष
इनमें से क्या सही नहीं है? (6.31)
असंख्य जीवों के हृदयों में स्थित असंख्य परमात्माओं में थोड़ा-थोड़ा अन्तर है जैसे एक भक्त और योगी के मध्य है
कृष्णभावनामृत योगी सदैव कृष्ण में ही स्थित रहता है भले ही भौतिक जगत् में वह विभिन्न कार्यों में व्यस्त क्यों न हो
भगवान् एक होते हुए भी अपनी अचिन्त्य शक्ति से सर्वत्र रहते हैं, जैसे सूर्य एक ही समय अनेक स्थानों में दिखता है
जीव के दुख का कारण क्या है? (6.32)
सदा कृष्ण का स्मरण करना
ईश्र्वर से अपने सम्बन्ध का विस्मरण होना
प्रत्येक व्यक्ति को कृष्णभावनाभावित बनाने का प्रयास करना
भौतिक प्रकृति के गुणों से प्रभावित बद्धजीव कृष्ण से अपने सम्बन्ध को भूल जाने के कारण ____ प्रकार के तापों(दुखों) को भोगता है | (6.32)
2
3
5
10
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को पूर्णयोगी व विश्व का सर्वश्रेष्ठ उपकारी एवं भगवान् का प्रियतम सेवक क्यों कहा गया है? (6.32)
वह कृष्णज्ञान को सर्वत्र वितरित कर देना चाहता है
भगवद्भक्त सदैव जीवों के कल्याण को देखता है
वह प्रत्येक प्राणी का सखा होता है
वह अपने मित्र जीवों से द्वेष नहीं करता
पूर्णरूप से ध्यान के लिए एकान्त स्थान में चला जाता है
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति क्यों सुखी होता है? (6.32)
वह कृष्ण को मनुष्यों के समस्त कार्यों का परम भोक्ता मानता है
वह कृष्ण को ही समस्त भूमि तथा लोकों का स्वामी स्वीकारता है
वह कृष्ण को समस्त जीवों का परम हितैषी मित्र जानता है
भगवान् कृष्ण द्वारा बताई गयी योगपद्धति को अर्जुन ने क्यों अस्वीकार कर दिया? (6.33)
क्योंकि यह कुछ ज्यादा ही सरल विधि है
क्योंकि यह अव्यावहारिक तथा असहनीय है
क्योंकि मन चंचल तथा अस्थिर है
क्योंकि 5000 वर्ष पूर्व उसे इतनी सुविधाएँ प्राप्त नहीं थीं
मन के किन लक्षणों के कारण अर्जुन इसे वायु को वश में करने से भी अधिक कठिन बताते हैं? (6.34)
चंचल (अस्थिर) - चञ्चलं
उच्छृंखल - प्रमाथि
हठीला - दृढं
अत्यन्त बलवान - बलवत
सर्वश्रेष्ठ मित्र - बन्धु
किस उपनिषद से उद्धृत किया गया है - मन तथा इन्द्रियों की संगती से यह आत्मा सुख तथा दुख का भोक्ता है? (6.34)
श्वेताश्वतरोपनिषद
कठोपनिषद
मुण्डक उपनिषद
ईशोपनिषद
वैदिक साहित्य के अनुसार इस भौतिक शरीर रूपी रथ का सारथी कौन है? (6.34)
आत्मा
बुद्धि
मन
इन्द्रियाँ
मन को वश में रखने का सरलतम उपाय क्या है? (6.34)
“हरे कृष्ण” महामन्त्र का कीर्तन किया जाय
अपने मन को पूर्णतया कृष्ण में लगाए
मन को विचलित करने वाली अन्य व्यस्तताएँ शेष न रह जाएँ
भगवान् ने अर्जुन की समस्या को समझते हुए हठी मन को वश में करने के लिए क्या उपाय बताये? (6.35)
उपयुक्त अभ्यास
विरक्ति
जो मन कहे वो करो
सम्भोग से समाधि
उन्मत्त मन का कुशल क्या उपचार है? (6.35)
भगवान् कृष्ण के कार्यकलापों का श्रवण
तीर्थवास, परमात्मा का ध्यान, मन तथा इन्द्रियों का निग्रह
ब्रह्म्चर्यपालन, एकान्त-वास
कठोर विधि-विधानों का पालन
वैराग्य का क्या अर्थ है? (6.35)
उन वस्तुओं के प्रति अनासक्त होना जो मन को कृष्ण से दूर ले जाने वाली हैं
कृष्ण के विषय में श्रवण करने से स्वतः परमात्मा के प्रति आसक्त होना
भगवान् श्रीकृष्ण के मतानुसार किसके लिए आत्म-साक्षात्कार कठिन कार्य होता है? (6.36)
जिसका मन उच्छृंखल है
जिसका मन संयमित है
जो मन को संयमित करने का समुचित उपाय करता है
जो मन को भौतिकता से हटाने का समुचित उपचार नहीं करता
कौन सरलता से सफलता प्राप्त कर लेता है? (6.36)
कृष्णभावनाभावित व्यक्ति बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के
योगाभ्यास करने वाला कृष्णभावनाभावित हुए बिना
भौतिक भोग में मन लगाकर योग का अभ्यास करना कैसा है? (6.36)
अग्नि में जल डाल कर उसे प्रज्ज्वलित करने का प्रयास
समय का सदुपयोग
भौतिक व आध्यात्मिक दृष्टि, दोनों से लाभप्रद
इस युग के लिए विशेष रूप से उपयुक्त, ईश-साक्षात्कार की श्रेष्ठतम प्रत्यक्ष, विधि कौन सी है? (6.37)
अष्टांगयोग का अभ्यास
ज्ञान की अनुशीलन विधि
भक्तियोग का दिव्यमार्ग
आत्मसाक्षात्कार के दिव्य मार्ग पर निरन्तर प्रयास होने पर भी मनुष्य किन कारणों से असफल हो सकता है? (6.37)
मनुष्य विधि का पालन करने में पर्याप्त सतर्क न रह पाये
माया विविध प्रलोभनों के द्वारा अभ्यासकर्ता को पराजित करना चाहती है
दिव्य अनुशासनों का पालन करते समय भी पुनः मोहित होने की सम्भावना बनी रहती है
इनमें से क्या सही नहीं है? (6.37)
दिव्यमार्ग में थोड़े से प्रयास से भी मोक्ष की महती आशा है
आत्म-साक्षात्कार का मूलभूत नियम है कि जीवात्मा यह भौतिक शरीर है
दिव्यमार्ग का अनुसरण बहुत कुछ माया के ऊपर धावा बोलना जैसा है
ब्रह्म-प्राप्ति के मार्ग से भ्रष्ट व्यक्ति - जो न तो भौतिक सुख भोग पाता है, न आध्यात्मिक सफलता ही प्राप्त कर सकता है - की तुलना अर्जुन किससे करते हैं? (6.38)
धोभी का कुत्ता
छिन्नभिन्न बादल
घर का भेदी
मुंह में राम
हाथी के दांत
माला करते, श्रवण-कीर्तन करते, भगवान् की लीलाओं को स्मरण करते एक अरसा बीत गया, फिर भी मेरा तो मन वैसा का वैसा ही है - भौतिक इच्छाओं से लबालब, सराबोर | श्री कृष्ण के उपदेशानुसार मेरे लिए क्या सुझाव देंगे? कोई सम्भावना है क्या?
