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WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-39 (10.10-19)
Total questions: 20
Worksheet time: 2hrs 50mins
भगवान् ने किस श्लोक में कहा है कि मैं हृदय से अज्ञानजन्य अंधकार को दूर करता हूँ?
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥ 10.10 ॥
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तम: ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥ 10.11 ॥
बुद्धियोग क्या है? (10.10)
कृष्णभावनामृत में रहकर कार्य करना
जिससे मनुष्य भवबन्धन से छूटना चाहता है
जब कोई भगवद्धाम को जाना चाहता है
बुद्धि के द्वारा धनोपार्जन करना
इनमें से क्या सही है? (10.10)
जब मनुष्य लक्ष्य तो जानता है, किन्तु कर्मफल में लिप्त रहता है, तो वह कर्मयोगी होता है
जब कोई लक्ष्य (कृष्ण) को समझने के लिए मानसिक चिन्तन का सहारा लेता है, तो वह ज्ञानयोग में होता है
जो लक्ष्य को जानकर कृष्णभावनामृत तथा भक्ति में कृष्ण की खोज करता है, तो वह भक्तियोगी या बुद्धियोगी होता है
प्रामाणिक गुरु के होते हुए तथा आध्यात्मिक संघ से सम्बद्ध रहकर भी प्रगति नहीं कर पाने वाले कम बुद्धिमान भक्त के पास क्या उपाय है? (10.10)
कृष्ण उसके अन्तर से उपदेश देते हैं, जिससे वह सरलता से उन तक पहुँच सके
आवश्यकता यह है कि वह कृष्णभावनामृत में निरन्तर रहकर प्रेम तथा भक्ति के साथ सभी प्रकार की सेवा करे
एकनिष्ठता से भक्तिकार्यों में रत रहने से भगवान् उसे अवसर देते हैं कि वह उन्नति करके अन्त में उनके पास पहुँचे
भक्तों तथा प्रामाणिक गुरु की संगति क्यों आवश्यक है? (10.10)
यह जानने के लिए कि उन्नति करने का चरम लक्ष्य कृष्णप्राप्ति है
उनके दिखाए पथ पर मन्दगति से प्रगति करने पर भी अन्तिम लक्ष्य प्राप्त हो जाता है
तत्कालीन बनारस के किस अत्यन्त प्रभावशाली विद्वान ने भगवान् चैतन्य को दार्शनिक दृष्टि से भोले भाले भावुक समझकर उपहास किया था? (10.11)
प्रबोधानन्द सरस्वती
निश्चलानन्द सरस्वती
दयानन्द सरस्वती
प्रकाशानन्द सरस्वती
यदि कोई भक्त भक्ति दर्शन के साहित्य का या अपने गुरु का लाभ न भी उठाये तो भी कृष्णभावनामृत में रत यह एकनिष्ठ भक्त कैसे ज्ञानरहित नहीं हो सकता? (10.11)
यदि वह पूर्ण कृष्णभावनामृत में रहकर भक्ति सम्पन्न करता रहे, तो उसके अन्तर से कृष्ण स्वयं उसकी सहायता करते हैं
जो लोग शुद्धभक्ति में रत हैं, भले ही वे पर्याप्त शिक्षित न हों तथा वैदिक नियमों से पूर्णतया अवगत न हो, किन्तु भगवान् उनकी सहायता करते ही हैं
इनमें से क्या सही नहीं है? (10.11)
मात्र चिन्तन से भगवान् को समझना सम्भव है, क्योंकि वे इतने सस्ते हैं कि कोरे मानसिक प्रयास से ही उन्हें जाना और प्राप्त किया जा सकता है
परम सत्य, कृष्ण, केवल भक्ति से प्रसन्न होते हैं और अपनी अचिन्त्य शक्ति से वे शुद्ध भक्त के हृदय में स्वयं प्रकट हो सकते हैं
शुद्धभक्त के हृदय में तो कृष्ण निरन्तर रहते हैं और कृष्ण की उपस्थिति सूर्य के समान है, जिसके द्वारा अज्ञान का अंधकार तुरन्त दूर हो जाता है
करोड़ो जन्मों के भौतिक संसर्ग के कल्मष के कारण भौतिकता के मल (धूलि) से आच्छादित, मनुष्य का हृदय किस प्रकार शुद्ध हो सकता है? (10.11)
यदि कोई लाखों वर्षों तक चिन्तन करता रहे
मनोधर्म या तर्क द्वारा
जब मनुष्य भक्ति में लगता है और निरन्तर हरे कृष्ण का जप करता है
शुद्ध भक्त जीवन की भौतिक आवश्यकताओं के लिए चिन्ता क्यों नहीं करता है, न ही उसे कोई और चिन्ता करने की आवश्यकता है? (10.11)
भक्त की प्रेमाभक्ति से प्रसन्न होकर भगवान् स्वतः सब कुछ प्रदान करते हैं
शुद्धभक्त के लिए भगवान् अपने ऊपर भार ले लेते हैं, और वह सारे भौतिक प्रयासों से मुक्त हो जाता है
परमेश्वर जीवात्मा से भिन्न हैं, इसकी पुष्टि के लिए अर्जुन ने भगवान् को कैसे सम्बोधित किया है? (10.12-13)
परम भगवान्
परमधाम
परमपवित्र
परमसत्य
क्या प्रमाण है कि परम सखा होने के कारण अर्जुन कृष्ण की चाटुकारी करते हुए उन्हें परमसत्य भगवान् नहीं कह रहा है? (10.12-13)
वैदिक आदेश इसकी पुष्टि करते हैं
नारद, असित, देवल तथा व्यास जैसे ऋषि पुष्टि करते हैं
स्वयं भगवान् कृष्ण भी प्रकट रूप से कह रहे हैं
इनमें से क्या सही नहीं है? (10.12-13)
जो परमेश्वर की भक्ति करता है, वही उन्हें समझ सकता है
भगवान् की शरण लिए बिना पापकर्मों से शुद्धि नहीं हो पाती
परम्परा-प्रणाली के बिना भगवद्गीता को नहीं समझ सकते
वैदिक प्रमाणों के होते हुए भी असल में कृष्ण सामान्य ही है
भगवद्गीता का ज्ञान कैसे प्राप्त करना चाहिए? (10.14)
परम्परा-विधि से
अर्जुन के पथ का अनुसरण करना चाहिए
कृष्ण के कथनों को पूर्णतया सत्य मानकर
700 भिन्न-भिन्न टीकाओं के अभक्त भाष्यकारों द्वारा
परमसत्य का अनुभव किन तीन प्रकार से किया जाता है? (10.15)
ब्रह्मा, विष्णु, महेश
सत्त्व, रजस, तमस
भूः, भुवः, स्वः
निराकार ब्रह्म, अन्तर्यामी परमात्मा, भगवान्
कारणोदकशायी, गर्भोदकशायी, क्षीरोदकशायी
अर्जुन ने भगवान् को कैसे सम्बोधित किया है? (10.15)
हे परमपुरुष
हे सबके उद्गम
हे समस्त प्राणियों के स्वामी
हे देवों के देव
हे ब्रह्माण्ड के प्रभु
अर्जुन श्रीकृष्ण से क्यों पूछता है कि वे अपनी विभिन्न शक्तियों के द्वारा किस प्रकार सर्वव्यापी रूप में विद्यमान रहते हैं? (10.16)
अर्जुन भगवान् सम्बन्धी अपने ज्ञान से सन्तुष्ट नहीं है
अर्जुन कृष्ण को भगवान् के रूप में नहीं समझ पा रहा है
अर्जुन को कृष्ण की सर्वव्यापकता पर संशय है
अर्जुन सामान्य लोगों के हित के लिए यह पूछ रहा है
कृष्ण को कौन जान व देख सकते हैं? (10.17)
सामान्यजन
शरणागत भक्तजन
असुर
नास्तिक
भगवान् के विषय में सुनने के बारे में अर्जुन क्या कहता है? (10.18)
मैं आपके विषय में सुनकर कभी तृप्त नहीं होता हूँ
जितना सुनता हूँ, उतना आपके शब्द-अमृत को चखना चाहता हूँ
मैं वही लीलाएं सुन-पढ़कर थक चुका हूँ
अपना कोई अनुभव बताएं जब भगवान् ने आपको अंतर से प्रेरणा दी और उसका पालन करके आपका लाभ हुआ|
