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WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-67 (18.39-48)
Total questions: 25
Worksheet time: 2hrs 11mins
तमोगुणी सुख के विषय में क्या सही है? (18.39)
न तो प्रारम्भ में सुख मिलता है, न अन्त में
प्रारम्भ में कुछ क्षणिक सुख और अन्त में दुख
प्रारम्भ में तथा अन्त में दुख ही दुख
प्रारम्भ में तथा अन्त में सुख ही सुख
प्रारम्भ में कुछ क्षणिक दुख और अन्त में सुख
तामसी सुख के क्या लक्षण हैं? (18.39)
आत्म-साक्षात्कार के प्रति सजग है
आलस्य तथा निद्रा में ही सुखी रहता है
प्रारम्भ से लेकर अन्त तक मोहकारक है
जानता है कि कर्म कैसे करें, कैसे नहीं
कौन व्यक्ति या स्थान प्रकृति के तीन गुणों के प्रभाव से मुक्त हैं? (18.40)
पृथ्वी लोक
स्वर्ग लोक
वैकुण्ठ लोक
देवता
असुर
विशां - शब्द किसके लिए प्रयुक्त हुआ है? (18.41)
ब्राह्मण
क्षत्रिय
वैष्णव
शूद्र
वैश्य
परन्तप - शब्द किसके लिए प्रयुक्त हुआ है? (18.41)
भगवान् श्रीकृष्ण
अर्जुन
समस्त वैष्णव भक्त
धृतराष्ट्र
ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों में __________ के द्वारा भेद किया जाता है|(18.41)
प्रकृति के गुणों के अनुसार उनके स्वभाव द्वारा उत्पन्न गुणों
जन्म
इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण के कितने स्वाभाविक गुण बताये हैं? (18.42)
4
9
20
26
इनमें से ब्राह्मण के कौन से गुण अपने सही अर्थ सहित लिखे गए हैं? (18.42)
शमः - आत्मसंयम
दमः - शान्तिप्रियता
क्षान्तिः - सहिष्णुता
आर्जवं - सत्यनिष्ठा
शौचं - पवित्रता
क्षत्रियों के कितने गुणों का उल्लेख किया गया है? (18.43)
4
7
18
25
इनमें से क्या क्षत्रिय के स्वाभाविक गुणों के रूप में सूचीबद्ध नहीं किया गया है? (18.43)
शौर्यं
शौचं
तेजः
धृतिः
दाक्ष्यं
शूद्रों का स्वाभाविक कर्म क्या है? (18.44)
कृषि - कृषि करना
गोरक्ष्य - गो रक्षा
वाणिज्यं - व्यापार
परिचर्या - श्रम तथा अन्यों की सेवा करना
भगवान् के कथनानुसार इनमें से क्या सही है? (18.45)
अपने अपने कर्म के गुणों का पालन करते हुए प्रत्येक व्यक्ति सिद्ध हो सकता है
दूसरे के कर्म के गुणों का पालन करते हुए प्रत्येक व्यक्ति सिद्ध हो सकता है
यह कहाँ बताया गया है - भगवान् सब जीवों का उद्गम हैं, आदि हैं और सभी जीव उन्हीं के भिन्नांश हैं? (18.46)
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां (गीता 18.46)
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः (गीता 15.7)
वेदान्त सूत्र में इसकी पुष्टि हुई है-जन्माद्यस्य यतः
किन शब्दों में बताया गया हैं कि भगवान् सर्वव्यापी हैं? (18.46)
यत: प्रवृत्तिर्भूतानां
येन सर्वमिदं ततम्
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य
सिद्धिं विन्दति मानवः
सामान्यता वैष्णव जन भगवान् की पूजा उनकी किन शक्ति के साथ करते हैं? (18.46)
परा
अपरा
अन्तरंगा
बहिरंगा
जीवन की सर्वोच्च सिद्धि - तेषामहं समुद्धर्ता भगवान् द्वारा स्वयं भक्त का उद्धार - प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को क्या सोचना और करना चाहिए? (18.46)
इन्द्रियों के स्वामी हृषिकेश द्वारा विशेष कर्म में प्रवृत्त किया गया है
कर्म के फल के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण को पूजना चाहिए
कृष्णभावनामय हो कर भगवत्कृपा से पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है
मनुष्य अपना कर्म करते हुए पूर्णता प्राप्त कर सकता है - इसका क्या अर्थ है? (18.46)
बस अपना कर्म करते रहो क्योंकि कर्म ही पूजा है, अलग से कोई भक्ति-वक्ति की आवश्यकता नहीं है, ऐसा करने से अंततः स्वतः सिद्धि प्राप्त हो जाती है
कोई चाहे जिस वृत्ति परक कार्य में लगा हो, यदि वह परमेश्वर की सेवा करता है, तो उसे सर्वोच्च सिद्धि प्राप्त होती है
बहिरंगा शक्ति के विषय में क्या सही है? (18.46)
सामान्यतया वैष्णव जन परमेश्वर की पूजा उनकी बहिरंगा शक्ति समेत करते हैं
भगवान् की अंतरंगा शक्ति उनकी बहिरंगा शक्ति का विकृत प्रतिबिम्ब है
बहिरंगा शक्ति पृष्ठ भूमि है, लेकिन परमेश्वर परमात्मा रूप में पूर्णांश का विस्तार करके सर्वत्र स्थित हैं
अपने वृत्तिपरक कार्य को करना, चाहे वह कितना ही त्रुटिपूर्ण ढंग से क्यों न किया जाय, अन्य किसी के कार्य को स्वीकार करने और अच्छी प्रकार करने की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ है - इसके लिए क्या उदाहरण दिए गए हैं? (18.47)
जो व्यक्ति स्वभाव से शुद्रकर्म के प्रति आकृष्ट हो, उसे अपने आपको झूठे ही ब्राह्मण नहीं कहना चाहिए, भले ही वह ब्राह्मण कुल का क्यों न हो
क्षत्रिय को शत्रुओं का वध करने के लिए हिंसक होना पड़ता है और कूटनीति में झूठ भी बोलना पड़ता है, लेकिन ऐसा नहीं कि वह अपने वृत्तिपरक कर्तव्य त्याग कर ब्राह्मण के कार्य करने लगे
यदि व्यापारी कहता है कि वह कोई लाभ नहीं ले रहा है तो इसे एक सरल झूठ समझना चाहिए | लेकिन ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि इस व्यवसाय (वैश्यकर्म) को त्यागकर ब्राहमणवृत्ति ग्रहण कर ले
अपने स्वभाव के अनुसार निर्दिष्ट कर्म कभी भी पाप से प्रभावित नहीं होते - तो फिर किस प्रकार कार्य करना चाहिए? (18.47)
स्वभाव के अनुसार निजी इन्द्रियतृप्ति के लिए जो चाहे करो, अब तो भगवान् ने भी कह दिया है
अर्जित विशेष गुण के अनुसार कार्य में प्रवृत्त हो और परमेश्वर की सेवा के लिए ही कार्य करने का निश्चय करे
हर मनुष्य को यज्ञ के लिए अथवा भगवान् विष्णु के लिए कार्य करना चाहिए
इनमें से क्या सही है? (18.47)
कोई भी कर्म निकृष्ट (गर्हित) नहीं है, यदि वह परमेश्वर की सेवा के लिए किया जाय
मनुष्य को चाहिए कि परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए कार्य करे
यदि युद्ध भगवान् कृष्ण के लिए भी करना पड़े, तो भी पतन से घबराने की आवश्यकता है
स्वभाव से उत्पन्न दोषपूर्ण कर्म को भी न त्यागने के लिए भगवान् ने क्या उदाहरण दिया है? (18.48)
अग्नि में धुआँ होने पर भी अग्नि समस्त तत्त्वों में शुद्धतम मानी जाती है
मल में गिरे स्वर्ण खंड के मूल्य में गिरावट नहीं आती
कमल का फूल कीचड़ में रहकर भी उससे प्रभावित नहीं होता
बद्ध जीवन में सारा कर्म भौतिक गुणों से दूषित रहता है, अतः सब दोषों के होते हुए भी, मनुष्य को अपने निर्दिष्ट कर्तव्य करते रहना चाहिए, क्योंकि वे स्वभावगत हैं - यह समझाने के लिए क्या तर्क दिए गए हैं? (18.48)
ब्राह्मण तक को पशुहत्या वाले यज्ञ करने पड़ते हैं
पवित्र क्षत्रिय को भी शत्रुओं से युद्ध करना पड़ता है
व्यापारी को लाभ छिपाना या कालाबाजार आवश्यक है
शूद्र को बुरे स्वामी की आज्ञा का पालन करना होता है
वृत्तिपरक कार्य किस प्रकार शुद्ध होकर सिद्धि की अवस्था तक अग्रसर करता है? (18.48)
मनुष्य को चाहिए कि कृष्णभावनामृत में रहकर अपने वृत्तिपरक कार्य से परमेश्वर की सेवा करने का संकल्प ले
जब कोई भी वृत्तिपरक कार्य भगवान् को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है, तो उस कार्य के सारे दोष शुद्ध हो जाते हैं
जब भक्ति से सम्बन्धित कर्मफल शुद्ध हो जाते हैं, तो मनुष्य अपने अन्तर में स्वयं का दर्शन कर सकता है
अपने स्वाभाविक गुणों के अनुसार आप अपने को किस वर्ण में पाते हैं और किस प्रकार अपने वृत्तिपरक कार्यों को भगवान् की प्रसन्नता के निमित्त करके आध्यात्मिक पथ पर प्रगति कर सकते हैं?
