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Worksheets40. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_9.09–9.12
Total questions: 43
Worksheet time: 1hrs 16mins
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श्रील प्रभुपाद जी ने हमें श्लोक संख्या 9.9 के तात्त्पर्य में क्या निर्देश दिया है ?
यह कि हमें यह कदापि नहीं सोचना चाहिए कि भगवान् के पास कोई काम नहीं है ।
यह कि हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि भगवान् केवल वैकुण्ठ लोक में ही रहते हैं ।
यह कि हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि भगवान् हमारे हितैषी नहीं अपितु शत्रु हैं ।
यह कि हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि भगवान् हमारे सेवक हैं और हम इस जगत के स्वामी हैं ।
भगवान् सदैव कहाँ और कैसे कार्यकलापों व्यस्त रहते हैं ?
भगवान् अपने वैकुण्ठलोक में सतत दिव्य आनन्दमय आध्यात्मिक कार्यों में व्यस्त रहते हैं ।
भगवान् भौतिक जगत् में रहकर यहाँ के जीवों की इच्छाओं की पूर्ति हेतु व्यवस्था में निमग्न रहते हैं ।
भगवान् अपने वैकुण्ठलोक में रहकर,अधिकाधिक शक्तियाँ अर्जित करने के लिए सदैव तपस्या में लीन रहते हैं ।
भगवान् अपने वैकुण्ठलोक में रहकर, प्रतिक्षण अपनी शक्तियों को व्यवस्थित करने में ही व्यस्त रहते हैं ।
श्लोक संख्या 9.9 में भगवान् श्रीकृष्ण भौतिक कार्यों के प्रति अपना क्या सम्बन्ध उद्घाटित करते हैं ?
यह कि भगवान् को भौतिक कार्यों से कोई सरोकार नहीं रहता है ।
यह कि भौतिक जगत् के समस्त कार्य भगवान् की शक्तियों के द्वारा किये जाते हैं ।
यह कि भगवान् भौतिक जगत् के कार्यों के प्रति सदैव उदासीन रहते हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं क्योंकि भगवान् की भौतिक जगत् के प्रति उदासीनता को प्रकट करते हैं ।
श्रील प्रभुपाद जी के अनुसार निम्न में से कौन सा वैदिक शास्त्र श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक 9.9 के मर्म का समर्थन करता है ?
ब्रह्मसंहिता
पद्म पुराण
भृगु संहिता
विष्णु पुराण
भौतिक जगत् की सृष्टि का मूल कारण क्या है ?
जीवों की अपनी स्वतंत्रता का स्वहित के लिए उपभोग करने की इच्छा ।
भगवान् की अपने अनेक विस्तार करने की परम इच्छा ।
भगवान् की अपनी अपरा शक्ति को कार्यों में संलग्न करने की इच्छा ।
भगवान् की अपनी समस्त शक्तियों का प्रदर्शन करने की इच्छा ।
भगवान् भौतिक कर्मों से उदासीन की भान्ति विरक्त क्यों रहते हैं ?
क्योंकि भगवान् (प्रेमवश) कभी भी हम जीवों को ऐसी कष्टकारी परिस्थितियों में देखना चाहते हैं ।
क्योंकि भगवान् को हम जीवों की भौतिक भोग की इच्छाओं से कोई सरोकार नहीं होता है ।
क्योंकि भौतिक कर्मों से बंधन उत्पन्न होता है, अतः भगवान् इनके प्रति सदैव उदासीन रहते हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
भगवान् को भौतिक कर्म क्यों नहीं बांध पाते हैं ?
क्योंकि भगवान् भौतिक कर्मों के प्रति सदैव उदासीन रहते हैं ।
क्योंकि भौतिक कर्म भौतिक शक्ति के द्वारा क्रियान्वित होते हैं ।
क्योंकि भौतिक कर्म भगवान् की परम इच्छा के अधीन संपन्न होते हैं, अतः यह कर्म उन्हें नहीं बांध पाते हैं ।
यह सभी तर्क सही हैं ।
श्रील प्रभुपाद जी ने श्लोक संख्या 9.9 में न्यायाधीश का उदहारण क्यों दिया है ?
भगवान् की जीवों के भौतिक कर्मों के प्रति उदासीनता को समझाने के लिए ।
भगवान् की कार्यशैली को समझाने के लिए ।
भगवान् की कार्यक्षमता को समझाने के लिए ।
भगवान् की कार्य कुशलता को समझाने के लिए ।
श्लोक संख्या 9.9 के मर्म के सन्दर्भ में वेदांत सूत्र में क्या कहा गया है ?
भगवान् इस जगत् के द्वन्द्वों में स्थित नहीं होते हैं ।
भगवान् इन द्वन्द्वों से सदैव अतीत रहते हैं ।
भगवान् को इस जगत की सृष्टि तथा प्रलय में कोई आसक्ति नहीं रहती है ।
यह सभी कथन वेदान्त सूत्र में कहे गए हैं ।
भगवान् हम जीवों के कर्मों में व्यवधान क्यों नहीं डालते हैं ?
क्योंकि भगवान् हम जीवों की आंशिक स्वतन्त्रता का सम्मान करते हैं ।
क्योंकि भगवान् चाहते हैं कि हम चरमसीमा तक इन्द्रियभोग कर लें ।
ताकि हम जीव स्वेच्छा से भगवान् के सन्मुख मुड़ें ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
भगवान् भौतिक प्रकृति में जीवों को कैसे प्रविष्ट करवाते हैं ?
अपनी चितवन के द्वारा ।
अपने दृष्टिपात के द्वारा ।
अपनी अचिन्त्य शक्ति के द्वारा ।
यह सभी कथन सही हैं ।
भौतिक प्रकृति निम्न में से किसकी अध्यक्षता में कार्य करती है ?
भगवान् श्रीकृष्ण की ।
ब्रह्मा जी की ।
शिव जी की ।
अदृश्य शक्ति की ।
जीवों को विभिन्न योनियाँ तथा रूप कैसे प्राप्त होते हैं ?
उनकी इच्छाओं तथा पूर्व कर्मों के अनुसार ।
भगवान् की परम इच्छा के अनुसार ।
भौतिक जगत् की सृष्टि के समय कालक्रम के अनुसार ।
भौतिक जगत् की सृष्टि के समय ब्रह्मा जी की मन:स्थिति के अनुसार ।
भगवान् श्रीकृष्ण निम्न में से इस भौतिक जगत् के क्या हैं ?
आधारभूमिस्वरूप
आधारजलस्वरूप
आधारवायुस्वरूप
आधारनभस्वरूप
श्रील प्रभुपाद जी ने स्मृति शास्त्र से फूल तथा सुगंध के उदहारण को क्यों उद्धृत किया है ?
हमें भगवान् की भौतिक कार्यों में संलिप्तता तथा पृथकता को समझाने के लिए ।
हमें फूल तथा उसकी सुगंध के सम्बन्ध विज्ञान को समझाने के लिए ।
हमें यह समझाने के लिए कि प्रत्येक फूल की अपनी एक विशिष्ट सुगंध होती है ।
हमें यह समझाने के लिए कि यह भौतिक जगत् भगवान् रूपी फूल की सुगंध मात्र है ।
निम्न में से कौन से व्यक्ति भगवान् को भौतिक देहधारी मनुष्य मानते हैं ?
जो व्यक्ति भगवान् की दिव्य प्रकृति को नहीं जानते हैं ।
जो व्यक्ति भगवान् के ऐश्वर्य के बारे में नहीं जानते हैं ।
जो व्यक्ति भगवान् के दिव्य शरीर की दिव्यता से अनभिज्ञ हैं ।
यह सभी व्यक्ति भगवान् को भौतिक देहधारी मनुष्य मानते हैं ।
निम्न में से किस वैदिक शास्त्र में भगवान् को प्रमाण स्वरूप कहा गया है ?
ब्रह्मसंहिता
गोपाल तापनी उपनिषद्
छान्दोग्य उपनिषद्
बृहद्विष्णुस्मृति
ब्रह्मसंहिता के अनुसार कृष्ण निम्न में से क्या हैं ?
कृष्ण परम नियन्ता हैं और उनका शरीर सच्चिदानन्द रूप है ।
कृष्ण केवल एक भौतिक देहधारी शक्तिशाली पुरुष थे । जो कि महाभारत के युद्ध के लिए उत्तरदायी थे ।
कृष्ण भगवान् विष्णु के दिव्य पुरुषावतार थे। जो धर्म की पुनर्स्थापना हेतु अवतरित हुए थे ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
क्या श्लोक संख्या 9.4 - 9.10 तक वर्णित हुए अद्भुत कार्यकलापों को हम जैसा कोई साधारण मनुष्य कर सकता है ?
नहीं, यह केवल भगवान् श्रीकृष्ण ही कर सकते हैं क्योंकि वे सच्चिदानन्द रूप हैं ।
हाँ, जब कृष्ण जैसा साधारण ग्वाला कर सकता है तो हम क्यों नहीं ।
नहीं, ऐसे कार्य केवल किसी अद्भुत शक्ति द्वारा ही क्रियान्वित हो सकते हैं ।
हाँ, कोई भी साधारण मनुष्य यदि आत्म-साक्षात्कार के माध्यम से अपनी सम्पूर्ण शक्ति प्राप्त कर ले, तो कर सकता है ।
पूर्व पुण्यों के फलस्वरुप असाधारण विद्वान् व्यक्ति भी भगवान् श्रीकृष्ण के मनुष्य रूप का उपहास क्यों करते हैं ?
क्योंकि ऐसे अल्पज्ञों को भगवान् के गुह्य कर्मों एवं शक्तियों का ज्ञान नहीं होता है ।
क्योंकि ऐसे अल्पज्ञों को भगवान् के सच्चिदानंद स्वरूप का ज्ञान नहीं होता है ।
क्योंकि ऐसे अल्पज्ञों को यह ज्ञान नहीं होता है कि इस जगत् में भगवान् का अवतरण उनकी अन्तरंगा शक्ति का प्राकट्य होता है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
प्रामाणिक गुरु-परम्परा, वैदिक साहित्य उपलब्ध होने के बावजूद भी मूर्ख व्यक्तियों का भगवान् श्रीकृष्ण को साधारण भौतिक देहधारी मनुष्य मानने का क्या कारण है ?
भौतिक जगत के परिदृश्य एवं परिपेक्ष्य में भगवान् विषयक शुष्क मानसिक चिंतन ।
मायावादी दर्शन के सिद्धान्तों का अनुपालन करना ।
वैदिक शास्त्रों में तनिक भी श्रद्धा न होना ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
श्रील प्रभुपाद जी ने श्लोक संख्या 9.11 के तात्पर्य में कृष्ण विषयक कौन सी धारणा को मूर्खतापूर्ण कहा है ?
यह कि इस विराट जगत् के सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता, संहारकर्ता तथा मुक्ति प्रदाता भगवान् श्रीकृष्ण का शरीर भौतिक है ।
यह कि भगवान् अपनी अचिन्त्य शक्तियों के द्वारा अपने भौतिक शरीर को आध्यात्मिक बना देते हैं ।
यह कि इस विराट जगत् के सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता, संहारकर्ता तथा मुक्ति प्रदाता भगवान् श्रीकृष्ण का शरीर आध्यात्मिक है ।
यह कि इस विराट जगत् के सृष्टिकर्ता, पालनकर्ता, संहारकर्ता तथा मुक्ति प्रदाता भगवान् श्रीकृष्ण अवतार नहीं अवतारी हैं ।
भगवान् श्रीकृष्ण के योगमैश्वरम् या अचिन्त्य दिव्य शक्ति के विषय में क्या कहा गया है ?
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण एकसाथ ससीम तथा असीम को वश में रख सकते हैं ।
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण असंख्य दिव्य शक्तियों की संयुक्त अभिव्यक्ति हैं ।
यह कि भगवान् श्रीकृष्ण परमसत्य की अचिन्त्य एवं दिव्य अभिव्यक्ति हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
भगवद्भक्त श्रीकृष्ण के योगामैश्वरम् को इतनी आसानी से कैसे स्वीकार कर लेते हैं ?
क्योंकि वे जानते हैं कि श्रीकृष्ण ही भगवान् हैं ।
क्योंकि वे श्रीकृष्ण के जन्म तथा कर्म की दिव्यता को जानते हैं ।
क्योंकि वे जानते हैं कि श्रीकृष्ण ही सम्पूर्ण ऐश्वर्य के स्वामी हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
निम्न में से कौन सगुणवादी है ?
जो भगवान् के साकार रूप में विश्वास करते हैं ।
जो भगवान् के निराकार रूप में विश्वास करते हैं ।
जो भगवान् के अस्तित्व को नहीं मानते हैं ।
जो भगवान् के तुल्य बनने के प्रयास में लगे रहते हैं ।
कृष्णतत्त्व को समझने के लिए हमें क्या करना चाहिए ?
हमें भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवतम् का अनुशीलन करना चाहिए ।
हमें कृष्ण के प्रामाणिक प्रतिनिधियों से उनके विषय में श्रवण करना चाहिए ।
हमें सदैव 'हरे कृष्ण महामंत्र' का जप करना चाहिए ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
"अहं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मावस्थित: सदा" कृष्ण के उपहास हेतु मायावादी दर्शन से प्रभावित व्यक्ति इस श्लोक को क्या सिद्ध करने के लिए उद्धृत करते हैं ?
यह कि कृष्ण एक सामान्य व्यक्ति थे ।
यह कि कृष्ण एक अद्भुत व्यक्ति थे ।
यह कि कृष्ण सदैव सभी जीवों के हृदय में विद्यमान रहते हैं ।
यह कि कृष्ण के जैसा दूसरा नहीं है ।
"अहं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मावस्थित: सदा" श्रील जीव गोस्वामी के अनुसार यह श्लोक क्या उद्घाटित करता है ?
यह कि कृष्ण समस्त चराचरों में अपने अंश विस्तार परमात्मा के रूप में स्थित हैं ।
यह कि कृष्ण ही समस्त जीवों तथा वस्तुओं के स्वामी हैं ।
यह कि समस्त जीव तथा वस्तुएँ केवल कृष्ण की ही अभिव्यक्ति मात्र हैं ।
यह कि परमपिता परमात्मा ही कृष्ण के रूप में समस्त चराचरों में विद्यमान् हैं ।
"नवदीक्षित भक्तों को भगवान् के मंदिर के समान ही अन्य जीवों का भी सम्मान करना चाहिए क्योंकि प्रत्येक जीव के हृदय में भगवान् अपने अंश परमात्मा रूप में एक समान विद्यमान् रहते हैं ।" नवदीक्षित भक्तों यह निर्देश निम्न में से किसने दिया है ?
श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जी ने ।
श्रील जीव गोस्वामी जी ने ।
श्री शंकराचार्य जी ने ।
श्रील सनातन गोस्वामी जी ने ।
एक पूर्ण कृष्णभावनाभावित भक्त निम्न में से क्या जनता है ?
केवल यह जानता है कि कृष्ण भगवान् हैं और वे सर्वव्यापी हैं ।
केवल यह जानता है कि कृष्ण सदैव अपने निजी धाम गोलोक वृन्दावन में रहते हैं ।
केवल यह जानता है कि कृष्ण अपनी शक्तियों की विभिन्न अभिव्यक्तियों तथा अपने स्वांश के द्वारा भौतिक तथा आध्यात्मिक जगत में सर्वत्र विद्यमान रहते हैं ।
एक पूर्ण कृष्णभावनाभावित भक्त को कृष्ण विषयक सम्पूर्ण ज्ञान होता है ।
मोघ का शाब्दिक अर्थ क्या है ?
निष्फल
सफल
सुफल
सबल
श्लोक संख्या 9.12 में विचेतस: (अर्थात् मोहग्रस्त) शब्द किस प्रकार के मोह के लिए प्रयुक्त हुआ है ?
भगवान् विषयक ज्ञान के अभाव से उत्पन्न भ्रम के लिए जिसके कारण व्यक्ति भगवान् श्रीकृष्ण का उपहास करते हैं ।
मुक्ति की मिथ्या आशा से उत्पन्न भ्रम के लिए जिसके कारण व्यक्ति भगवान् श्रीकृष्ण का उपहास करते हैं ।
निष्फल कर्मों के फलस्वरूप घृणा से उत्पन्न भ्रम के लिए जिसके कारण व्यक्ति भगवान् श्रीकृष्ण को साधारण मनुष्य मानते हैं ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
जो व्यक्ति भगवान् श्रीकृष्ण का उपहास करते हैं । उन्हें क्या समझना चाहिए ?
असुर
देवता
ज्ञानी
योगी
श्लोक संख्या 9.12 के अनुसार निम्न में से कौन सा कथन सत्य है ?
श्रीकृष्ण का उपहास करने वाले समस्त व्यक्तियों के मुक्ति के लिए प्रयास निष्फल हो जाते हैं ।
श्रीकृष्ण का उपहास करने वाले समस्त व्यक्तियों के विशेष प्रयोजन हेतु सकाम कर्म (वैदिक अनुष्ठान) निष्फल हो जाते हैं ।
श्रीकृष्ण का उपहास करने वाले समस्त व्यक्तियों का सम्पूर्ण ज्ञान निष्फल हो जाता है ।
यह सभी कथन सत्य हैं ।
श्रीकृष्ण का उपहास करने वाले समस्त व्यक्ति निम्न में से किन विचारों की ओर आकर्षित होते हैं ?
आसुरी तथा नास्तिक विचारों की ओर ।
मायावादी विचारों की ओर ।
अद्वैतवादी विचारों की ओर ।
यह सभी विकल्प सही हैं ।
कतिपय व्यक्तियों द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण का उपहास किये जाने का मूल कारण क्या है ?
भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति उनका ईर्ष्या का भाव ।
भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति उनका मित्रता का भाव ।
भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति उनका प्रेम का भाव ।
भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति उनका समर्पण का भाव ।
"मेरे मामा जी एक आध्यात्मिक संस्था से जुड़े हैं वह उस संस्था के सिद्धांतों, नियमों तथा विचारों का कड़ाई से पालन करते हैं । परन्तु जब भी श्रीकृष्ण या श्रीमद्भगवद्गीता की चर्चा होती है । तो वह भगवान् श्रीकृष्ण की कड़ी निन्दा करते हैं और उनका उपहास करते हुए कहते हैं कि तुम मूर्खों ने एक ग्वाले को भगवान् बना दिया है जबकि भगवान् तो एक निराकार शक्ति है ।" आपके विचार से मेरे मामा जी के आध्यात्मिक प्रयासों, उनसे अर्जित ज्ञान तथा उनके मुक्ति के प्रयोजन का क्या परिणाम होगा ?
सब कुछ निष्फल हो जायेगा और आपके मामा जी को इस अपराध के लिए जन्म-जन्मान्तर निम्न लोकों तथा निम्न आसुरी योनियों में गमन करना पड़ेगा ।
आपके मामा जी को उनके दृढ़आध्यात्मिक प्रयासों के फलस्वरूप सायुज्य मुक्ति प्राप्त तो होगी, परन्तु उन्हें फिर से जन्म-मृत्यु के चक्र में गिरना होगा ।
भगवान् किसी के भी कर्मफलों को प्रभावित नहीं करते अतएव आपके मामा जी को स्वर्ग लोक में स्थान मिलेगा ।
आपके मामा जी के समस्त प्रयोजन सफल होंगे । अतः उन्हें और अधिक गंभीरता से अपनी संस्था का अनुशीलन करना चाहिए ।
यदि कोई व्यक्ति भगवान् श्रीकृष्ण से ईर्ष्या करता है तो क्या होता है ?
ऐसे व्यक्ति के सभी प्रकार के प्रयास तथा प्रयोजन निष्फल हो जाते हैं ।
ऐसा व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत भगवत्ता के द्वारा पृथक साम्राज्य स्थापित कर सकता है ।
ऐसा व्यक्ति इस भौतिक संसार में सर्वाधिक सफल होता है ।
ऐसे व्यक्ति के सभी प्रकार के प्रयास तथा प्रयोजन निश्चित रूप से सफल होते हैं ।
निम्न में से श्लोक संख्या 9.12 का क्या सार है ?
बिना श्रीकृष्ण को भगवान् माने भक्ति हेतु समस्त प्रयास व्यर्थ हैं ।
बिना श्रीकृष्ण के सम्मान के निर्विशेषवाद भी निष्फल है ।
बिना श्रीकृष्ण के सम्मान के समस्त वैदिक अनुष्ठान व्यर्थ हैं ।
बिना श्रीकृष्ण के सम्मान के समस्त वैदिक ज्ञान निरर्थक है ।
यह सभी कथन श्लोक संख्या 9.12 का सार हैं ।
