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11. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_3.01–3.10

Authored by Abhay Ram Das

Religious Studies

University

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11. श्रीमद्भगवद्गीता यथारूप_प्रश्नोत्तरी श्रृंखला_3.01–3.10
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1.

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5.

MULTIPLE CHOICE QUESTION

3 mins • 1 pt

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 3.01 व 3.02 में अर्जुन द्वारा पूछे गये प्रश्न का क्या औचित्य है ? स्पष्ट करें ।

यदि अर्जुन यह प्रश्न नहीं करता तो हमें केवल “गीता का सार” मात्र ही प्राप्त होता, गीता के विस्तृत उपदेश नहीं ।

यदि अर्जुन यह प्रश्न नहीं करता तो सांख्ययोग, बुद्धियोग, बुद्धि द्वारा इन्द्रियनिग्रह, निष्काम कर्मयोग आदि विषयों के ज्ञान से उत्पन्न भ्रामक स्थिति से नहीं उभर पाता ।

यदि अर्जुन यह प्रश्न नहीं करता तो हम भी अर्जुन की तरह भ्रामक स्थिति में ही रह जाते, भगवान् कृष्ण के वास्तविक सन्देश को नहीं समझ पाते ।

यदि अर्जुन यह प्रश्न नहीं करता तो श्रीमद्भगवद्गीता का स्वरुप केवल कुछ छंदों का गीत मात्र होता, वर्तमान दिव्य ग्रन्थ नहीं ।

6.

MULTIPLE CHOICE QUESTION

1 min • 1 pt

श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक संख्या 3.03 के अनुसार आत्म-साक्षात्कार के लिए कितने प्रकार के आध्यात्मवादी प्रयत्नशील रहते हैं ?

दो प्रकार के - ज्ञानयोगी, हठयोगी

दो प्रकार के - हठयोगी, भक्त

दो प्रकार के - ज्ञानयोगी, भक्त

दो प्रकार के - ध्यानयोगी, भक्त

7.

MULTIPLE CHOICE QUESTION

2 mins • 1 pt

ज्ञानयोगियों की भगवद् तत्त्व को जानने व समझने क्या पद्धति होती है ?

ज्ञानयोगी आध्यात्मिक ज्ञान तथा दर्शन द्वारा भगवद् तत्त्व का चिन्तन तथा मनन करते हैं ।

ज्ञानयोगी व्यवहारिक ज्ञान तथा दर्शन द्वारा भगवद् तत्त्व का चिन्तन तथा मनन करते हैं ।

ज्ञानयोगी स्वभाविक ज्ञान तथा दर्शन द्वारा भगवद् तत्त्व का चिन्तन तथा मनन करते हैं ।

ज्ञानयोगी दार्शनिक ज्ञान तथा आध्यात्मिक दर्शन द्वारा भगवद् तत्त्व का चिन्तन तथा मनन करते हैं ।

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