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WorksheetsBhagavad Gita As It Is DAY-54 (14.8-17)
Total questions: 25
Worksheet time: 2hrs 11mins
तमोगुणी व्यक्ति के क्या लक्षण होते हैं? (14.8)
जरूरत से अधिक सोता व अत्यंत आलसी होता है
सदैव निराश प्रतीत होता है
भौतिक द्रव्यों के प्रति व्यसनी बन जाता है
रजोगुणी व्यक्ति से भी अधिक सक्रिय रहता है
पागलपन के कारण अधोगति को प्राप्त होता है
समस्त देहधारी जीवों का मोह, तमोगुण किस से उत्पन्न होता है? (14.8)
अज्ञान
ज्ञान
तमोगुण में लिप्त व्यक्ति के बारे में क्या सही नहीं है? (14.8)
किसी वस्तु को यथारूप में नहीं समझ पाता
आध्यात्मिक ज्ञान में कोई उन्नति नहीं कर पाता
पागल होकर धन संग्रह करता है
आध्यात्मिक ज्ञान के लिए अत्यधिक रूचि दिखाता है
प्रकृति के तीनों गुण मनुष्यों को किस-किस प्रकार बांधते हैं? (14.9)
सतोगुण मनुष्य के ज्ञान को ढक कर उसे पागलपन से बाँधता है
रजोगुण सकाम कर्म से बाँधता है
तमोगुण मनुष्य को सुख से बाँधता है
इनमें से क्या रजोगुणी व्यक्ति के लक्षण हैं? (14.9)
जो भी करता है, वह न तो उसके लिए, न किसी अन्य के लिए हितकर होता है
वह अस्पताल खोलता है और धर्मार्थ संस्थाओं को दान देता है
अपने कर्म या बौद्धिक वृत्ति में निरत रहकर सन्तुष्ट रहता है
किन विशिष्ट कार्यों में प्रकृति के किसी एक गुण की प्रधानता प्रकट होती है जिसे देख कर ही समझा जा सकता है कि कौन व्यक्ति किस गुण में स्थित है? (14.10)
मनुष्य के आचरण में
उसके कार्यकलापों में
उसके खान-पान आदि में
किस गुण में स्थित होकर व्यक्ति ईश्वर के विज्ञान को समझ सकता है? (14.10)
सतोगुण में
रजोगुण में
तमोगुण में
तीनों गुणों को लाँघ कर शुद्ध सतोगुण में
तीनों गुणों से परे शुद्ध सतोगुण की अवस्था को क्या कहा जाता है? (14.10)
वसुदेव अवस्था
शूरसेन अवस्था
उग्रसेन अवस्था
नन्दबाबा अवस्था
शरीर के नौ द्वारों में से कौन से कंधे से ऊपर स्थित हैं? (14.11)
दो आँखें
दो कान
दो नथुने
मुँह
गुदा तथा उपस्थ
किन लक्षणों से समझना चाहिए कि व्यक्ति में सतोगुण विकसित हो चुका है? (14.11)
सारी वस्तुएँ अपनी सही स्थिति में दिखती हैं
सही-सही सुनाई पड़ता है
सही ढंग से वस्तुओं का स्वाद मिलता है
मनुष्य का अन्तः तथा बाह्य शुद्ध हो जाता है
शरीर के प्रत्येक द्वार में सुख के लक्षण दिखते हैं
रजोगुण में वृद्धि होने पर क्या-क्या लक्षण प्रकट होते हैं? (14.12)
व्यक्ति कभी प्राप्त पद से संतुष्ट नहीं होता
सदैव इन्द्रियतृप्ति करते रहना चाहता है
अत्यधिक आसक्ति, सकाम कर्म, गहन उद्यम
अनियन्त्रित इच्छा एवं लालसा
व्यक्ति अत्यंत आलसी हो जाता है
तमोगुण में वृद्धि के 4 प्राक्ट्यों - अप्रकाशः, अप्रवृत्तिः, प्रमादः, मोहः में से मोह किसे कहते हैं? (14.13)
ज्ञान की अनुपस्थित
किसी नियम में बँधकर कार्य नहीं करना
अकारण ही अपनी सनक के अनुसार कार्य करना
कार्य करने की क्षमता होने पर भी परिश्रम न करना
अमलान् - विशुद्ध - जिसका अर्थ है, “रजो तथा तमोगुण से मुक्त” - यह शब्द किसके लिए प्रयोग किया गया है? (14.14)
उन महर्षियों के उच्चतर लोकों के लिए जहां सतोगुणी व्यक्ति मरने के बाद जाता है
उस सतोगुण के लिए जिसमें प्राण छोड़ने वाला महर्षियों के लोक में दैवी सुख भोगता है
कुछ लोगों का विचार है कि एक बार मनुष्य जीवन को प्राप्त करके आत्मा कभी नीचे नहीं गिरता | क्या यह ठीक है? (14.15)
और नहीं तो क्या? आत्मा तो बीज है - अब आम के बीज से खरबूजा तो नहीं उगेगा न, ऐसे ही मनुष्य की आत्मा को हमेशा मनुष्य का ही शरीर प्राप्त होगा
गीता ऐसा नहीं कहती, तमोगुणी व्यक्ति मृत्यु के बाद पशुयोनि को प्राप्त होता है | वहाँ से विकास प्रक्रम द्वारा पुनः मनुष्य जीवन तक आना होगा
जो लोग मनुष्य जीवन के विषय में सचमुच चिन्तित हैं, उन्हें क्या करना चाहिए? (14.15)
उन्हें सतोगुणी बनना चाहिए और अच्छी संगति में रहकर गुणों को लाँघ कर कृष्णभावनामृत में स्थित होना चाहिए
उन्हें रजोगुणी बनना चाहिए, क्योंकि न चाहते हुए भी तमोगुण में पशु शरीर और सतोगुण से दैवी शरीर मिलता है
तमोगुण में किये गये कर्म का क्या फल होता है? (14.16)
शुद्ध
सात्त्विक
दुख
मूर्खता
मानव समाज में यदि कोई किसी मनुष्य का वध कर दे तो उसे राज्य के नियमानुसार प्राणदण्ड मिलता है, इसी प्रकार पशु-वध करने वाले के लिए प्रकृति का क्या नियम है? (14.16)
भविष्य में वह पशु पशु-वधिक का वध करेगा
स्वाद के लिए पशु वध में रत रहना घोर अज्ञान है
एक चींटी तक का मारा जाना सह्य नहीं है
मांसाहारी अपने भविष्य को अंधकारमय बना रहा है
समस्त प्रकार के पशुओं में से गोवध सर्वाधिक उत्तम है
वैदिक साहित्य में कहाँ गोवध की भर्त्स्ना और गायों की सुरक्षा का विशेष उल्लेख है? (14.16)
(ऋग्वेद 9.4.64) गोभिः प्रीणित-मत्सरम् सूचित करता है कि जो व्यक्ति दूध से संतुष्ट होने के उपरांत भी गाय को मारना चाहता है वह सबसे बड़े अज्ञान में रहता है
(विष्णु-पुराण 1.19.5) नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च | जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ||
रजोगुण में किये गये कर्म के लिए क्या उदाहरण दिया गया है? (14.16)
गगनचुम्बी प्रासाद बनवाने के लिए अत्यधिक कष्ट उठाना
पशुओं का वध और बाद में स्वयं पशु जीवन में जाना
तमोगुण से क्या प्राप्त होता है? (14.17)
ज्ञान
लोभ
अज्ञान
प्रमाद
मोह
इनमें से क्या तमोगुणी का लक्षण नहीं है? (14.17)
पशु-तुल्य होते हैं
वस्तुओं को स्पष्ट रूप में नहीं देख पाते
पागल (प्रमत्त) हो जाते हैं
मानसिक रूप से ही अप्रसन्न नहीं रहते
मद्य-सेवन की शरण ग्रहण करते हैं
रजोगुण में स्थित व्यक्ति की क्या स्थिति होती है? (14.17)
वे अनुत्तरदायी बन जाते हैं
लोग लोभी बन जाते हैं
इन्द्रिय-भोग की लालसा की कोई सीमा नहीं होती
सब होने पर भी न तो सुख मिलता है, न मनःशान्ति
वृत्ति तथा व्यवसाय अत्यन्त सुखकारक होते हैं
यदि जनता का कुछ भी अंश कृष्णभावनामृत विकसित कर लेता है और सतोगुणी बन जाता है, तभी ______________ संभव है | (14.17)
सारे विश्व में शान्ति तथा सम्पन्नता
तमोगुणी अज्ञानजनित उच्छृंखलता पर रोक
वस्तुओं को असली रूप में देख सकना
अज्ञान के गर्त में अधिकाधिक गिरकर अंधकारमय भविष्य की और ले जाने वाली प्रतिकूल वर्तमान सभ्यता से बचाव के लिए किस अभ्यास की संस्तुति की जाती है? (14.17)
कृष्णभावनामृत
तमोगुण
रजोगुण
आप अपने आप में किस गन की प्रधानता देखते हैं? आपका वर्तमान स्थिति से ऊपर उठने के लिए पहला - दूसरा कदम अभी तय करें |
